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सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

सांस्कृतिक शब्दों के अर्थ विस्तार की आवश्यकता – डॉ. महीपाल सिंह राठौड़

 प्रो. जेनिश ने कहा था कि 

जो भाषा राष्ट्र भाषा (और फलतः राजभाषा) का स्थान ग्रहण करना चाहती हो, उसमें सभी प्रकार के विचार प्रकट करने के लिए अवकाश होना चाहिए।


आजकल संसार में जो भाषाएँ आदर्श रूप में समुन्नत तथा समृद्ध मानी जाती है, उन सबकी एक बहुत बड़ी विशेषता यह है कि अनके शब्द-कोशों में प्रत्येक शब्द का बहुत ही वैज्ञानिक और व्यवस्थित रूप से सीमाबद्ध और स्पष्ट निरूपण होता है, ऐसा निरूपण होता है कि उसे एक बार अच्छी तरह देख लेने पर उसके अर्थ तथा प्रयोग के सम्बंध में किसी प्रकार के भ्रम या संदेह के लिए कोई अवकाश ही नहीं रह जाता ।

हम हिन्दी भाषियों का भी यह प्रमुख कŸार्व्य होना चाहिए कि हम हिन्दी शब्दों का ठीक और पूरा अर्थ विवेचन करके उसे भी ऐसे उच्च स्तर तक पहुँचाने का प्रयत्न करें कि वह भी उन्नत भाषाओं के वर्ग में गिनी जाने लगे।¹

कोशों का मुख्य उपयोग शब्दों के ठीक-ठीक अर्थ तथा आशय जानने के लिए ही होता है। अतः अर्थ और विवेचन ऐसे होने चाहिए जो जिज्ञासुओं का पूरी तरह से मनस्तोष कर सकें, उनकी शंकाओं का समाधान कर सके और उन्हें शब्दों की आत्मा से परिचित कराकर यह बतला सकें कि उनका प्रयोग किन अवसरों या स्थलों पर अथवा कैसे होना चाहिए। हिन्दी में सबसे पहला काम ‘हिन्दी शब्द सागर’ में हुआ था।

मानक हिन्दी कोश के सम्पादक ने अपने निवेदन के अंत में लिखा है-

अब इसमें जो त्रुटियाँ रह गई हो उनका संशोधन तथा सुधार आने वाली पीढ़ियाँ करेंगी।

प्रस्तुत शोध पत्र में मानक हिन्दी कोश और राजस्थानी शब्द कोश में राजस्थानी संस्कृति से सम्बंधी किये गये अर्थ का विश्लेषण किया जायेगा।


शब्द- मारवाड़

अर्थः- पु. (सं. मरूवर्त) मेवाड़ प्रदेश 2. मेवाड़ और उसके आस पास के अनेक प्रदेश जो अब राजस्थान के रूप में परिणत हो गये हैं।²

 शब्द - मारवाड़ 

अर्थः-सं. पु. (सं. मरूपाट, प्रा. मरूआड) राजपूताने का वह प्रदेश जहाँ राठौड़ों का राज्य था।³

 

अर्थः जौहर - आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए की जाने वाली आत्म हत्या।⁴

शब्द जौहर

अर्थ - 4 राजपूत स्त्रियों द्वारा अपनी सेना की हार व आततायियों से अपने धर्म की रक्षार्थ किया जाने वाला सामूहिक आत्म-दहन । 5 इस प्रकार के आत्मदहन हेतु बनाई गई चिता। 6 आततायी शासन के विरुद्ध किया जाने वाला आत्म-दहन। 5


शब्द मेवाड़

अर्थ- पु (देश) 1. आधुनिक राजस्थान का एक प्रसिद्ध भू भाग जो मध्य काल में एक स्वतंत्र राज्य था। महाराणा प्रताप यहीं का राजा था।⁶

शब्द मेवाड़

अर्थ - सं. पु. (सं. मेटपाट) 1. राजस्थान में चितौड़, उदयपुर तथा उसके आस पास का प्रदेश।⁷


शब्द मेवात -

अर्थ पु. (सं.) राजस्थान और सिंध के बीच में प्रदेश का पुराना नाम⁸

शब्द मेवात -

अर्थ- सं. पु. - राजस्थान में, अलवर के आस-पास का भू-भाग, जहाँ मेव-मुसलमान बहुतायत से आबाद है। (सभा)⁹

मारवाड़’ शब्द का अर्थ मानक हिन्दी कोश में ‘मेवाड़’ किया गया है जो कि उचित नहीं है। मारवाड़ और मेवाड़ राजस्थान की दो स्वतंत्र रियासतें रही है। जिनके इतिहास को कौन नहीं जानता! मारवाड़ शब्द का अर्थ मानक हिंदी कोश में जो दिया गया हैं। उसे राजस्थानी शब्द कोश में जो अर्थ दिया गया है उसको आधार बनाकर संशोधित किया जाय।

इसी तरह मेवाड़ शब्द का जो अर्थ किया गया है वह अपने आप में अधूरा है इस सम्बंध में राजस्थानी शब्द कोश ने जो अर्थ किया है उसका अनुसरण किया जा सकता हैं। 

अर्थ के अंत में यह लिखना कि ‘महाराणा प्रताप यही’ का शासक था। उचित नहीं है। मध्यकाल के इतिहास में मेवाड़ ही एक मात्र राज्य था जिसने मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की इसलिए स्वतंत्रता के महानायक महाराणा प्रताप के लिए यह लिखना कि महाराणा प्रताप यहीं का राजा था। उनके उदाŸा जीवन मूल्यों का अपमान हैं।

इसी तरह ‘मेवात’ शब्द का जो अर्थ किया गया है वह भी उचित नहीं हैं।  

  मेवात शब्द का अर्थ राजस्थानी शब्द कोश के अनुसार किया जाय तो ठीक हो सकता हैं


इसी प्रकार ज्वलंत शब्द ‘जौहर’ का अर्थ शब्दकोशों में सही नहीं हैं। मानक हिन्दी कोश ने आत्म समान की रक्षा के लिए की जाने वाली आत्म हत्या और राजस्थानी शब्द कोश ने आततायी शासन के विरूद्ध किया जाने वाला आत्म हत्या बताया है ये दोनों ही अर्थ भ्रामक हैं। आत्म हत्या कायरता का कार्य  हैं। इसके लिए आत्मोत्सर्ग - पु. (सं. आत्म-उत्सर्ग, प.त.) दूसरे के हित के लिए अपने आपको पूरी तरह से लगा देना। आत्म बलिदान शब्द लिखा जाता तो उचित रहता।¹⁰

शब्द -  साका  

अर्थः- पु. (सं. शाका) 2 ख्याति ! प्रसिद्धि। 3 कीर्ति। यश 4 बड़ा काम जिससे कर्ता की बहुत कीर्ति हो  11

शब्द-ः साकौ-

अर्थः- पु. 1 महायुद्ध 2 यश, कीर्ति, प्रसिद्धि 3 अवसर, मौका 4 धाक, रौब 6 यश का कार्य करने वाला  12

साका शब्द का अर्थ मानक हिन्दी कोश और राजस्थानी कोश में स्पष्ट नहीं दिया गया हैं। जबकि यह शब्द राजस्थान के इतिहास और संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग हैं। साका का अभिप्राय हैं कि शत्रु सेना से अन्तिम निर्णायक युद्ध जिसमें योद्धा केसरिया बागा पहनकर व कसूमा की मनुहार कर तुलसी, गंगाजल का आचमन कर शत्रु सेना पर टूट पड़ते और महिलाएँ जौहर करती। ऐसे महत्वपूर्ण शब्दों का भी शब्द कोशों में अर्थ विस्तार न देना हमारी संकुचित मानसिकता का प्रदर्शन करता हैं। आवश्यकता इस बात की हैं कि ऐसे महत्वपूर्ण शब्दों की नये सिरे से व्याख्या की जाये और हमारे सांस्कृतिक शब्दों की शब्दावली का निर्माण किया जाय।

समय के साथ शब्दों के अर्थ का विस्तार और व्याख्या आवश्यक है तभी भाषा बहता हुआ नीर बन पायेगी और आम जन के अभिव्यक्ति में सफल होगी।


सन्दर्भ:

  1. मानक हिन्दी कोश पहला खंड प्रधान संम्पादक रामचन्द्र वर्म्मा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सन् 1991 पृ. आरम्भिक निवेदन
  2. मानक हिन्दी कोश सम्पादक रामचन्द्र वर्म्मा चौथा खण्ड हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग िर्द्वतीय संस्करण सन् 1991 ईस्वी पृ. 347 
  3. राजस्थानी सबद कोस संपादक सीताराम लालस चौपासनी शिक्षा समिति जोधपुर  तृतीय खण्ड पृ. 3712
  4. मानक हिन्दी कोश  प्रधान संम्पादक रामचन्द्र वर्म्मा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सन् 1991 दूसरा खण्ड पृ. 391
  5. राजस्थानी हिन्दी संक्षिप्त शब्दकोश सं. पद्मश्री सीताराम लालस प्रथम खण्ड राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर सन् 1986 पृ. 489
  6. मानक हिन्दी कोश चौथा खंड प्रधान संम्पादक रामचन्द्र वर्म्मा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सन् 1991 पृ. 415
  7. राजस्थानी सबद कोस तृतीय खण्ड संपादक सीताराम लालस चौपासनी शिक्षा समिति जोधपुर सन् पृ. 3882
  8. मानक हिन्दी कोश चौथा खंड प्रधान संम्पादक रामचन्द्र वर्म्मा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सन् 1991 पृ.  415
  9. राजस्थानी सबद कोस तृतीय खण्ड पृ. 3712 संपादक सीताराम लालस चौपासनी शिक्षा समिति जोधपुर पृ. 3882
  10. मानक हिन्दी कोश पहला खण्ड पृ. 262
  11. मानक हिन्दी कोश  प्रधान संम्पादक रामचन्द्र वर्म्मा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सन् 1991 पांचवा खण्ड पृ. 330
  12. राजस्थानी हिन्दी संक्षिप्त शब्दकोश सं. पद्मश्री सीताराम लालस द्वितीय खण्ड राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर सन् 1987 पृ. 760


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