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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2022

लोक गीतों में गाँधी – डॉ. महीपाल सिंह राठौड़

लोक गीतों में गाँधी – डॉ. महीपाल सिंह राठौड़


महात्मा गाँधी का व्यक्तित्व इतना महान् था कि समकालीन जीवन का प्रत्येक पक्ष उनसे किसी न किसी रूप में प्रभावित हुआ है।¹ भारतीय आचार विचार पर कहीं न कहीं गाँधी जी की छाप है। कला और साहित्य भी इससे अछूते नहीं रहे।

शिष्ट साहित्य में तो किसी व्यक्ति या घटना विशेष का वर्णन मिल सकता है परंतु जनमानस किसी व्यक्ति को एकाएक नहीं गाता। गीतों में गाया जाना बड़ा कठिन है। लोक गीतों में वे ही गाये गये हैं जो लोक के बीच रहे। लोक की यह विशेषता है कि वह ऐसे चरित नायको को कभी विस्मृत नहीं करता। गाँधी भी उनमें से एक है। भारत वर्ष के हर कौने में चाहे व नगरीय हो या ग्राम्य जन या आदिवासी। गाँधी के बताये मार्ग के वे अनुयायी हैं। भारत वर्ष के विभिन्न अंचलों में कई बानियाँ और बोलियाँ हैं परंतु गाँधी से प्रेरणा लेने में किसी के मन में शंका नहीं है। फलस्वरूप इन गीतों के माध्यम से हम यह जान सकते हैं कि गाँधी जी के जीवन चरित ने भारतीय जन मानस को कितना प्रभावित किया और संघर्ष करने की प्रेरणा प्रदान की है-

स्वयं गाँधी का मत था कि-

लोक गीत ही लोगों का साहित्य है।²

गाँधी विचारधारा और जीवन दर्शन के प्रमुख तत्व सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, नीति, श्रम, स्वदेशी, असहयोग, गामोद्योग, ट्रस्टीशिप, खादी, राम राज्य, ग्रामीण स्वराज्य का व्यापक असर भारतीय जनमानस पर पड़ा और उनका वर्णन भारत वर्ष के विभिन्न अंचलों और भाषा बोलियों में हमें मिलता है। उन्हीं का यहाँ वर्णन प्रस्तुत किया जा रहा है।

गढवाली लोक गीत में उनके चरित्र त्याग, तपस्या, और भारतीय स्वतंत्रता को प्राप्त किये जाने वाले संघर्ष का उल्लेख मिलता है :-

मातमा गांधी बड़ो भागी छ,

देश सेवा कु अनुरागी छ।

बाखरी कू दूद वो खांदू छ,

खादी कू लांणू वो लांद छ।³

पंजाबी लोक गीत में गाँधी फिरंगी को चुनौती दे रहे हैं

 गांधी कहे फिरंगिया वे

 हुण छड्डु दे हिन्दुस्तान

अर्थ - गांधी कह रहे हैं ओ फिरंगी !

       अब हिन्दुस्तान छोड़ दो।’⁴

पंजाबी लोक गीतों में जनता ने गांधी जी को अपना बेताज बादशाह मान लिया

 चिट्टा रूप्या चांदी दा,

 राज महात्मा गांधी दा।

अपने हाथों से सूत कातकर वस्त्र तैयार करना असमिया समाज की मुख्य विशेषता रही है वहाँ घर-घर में औरतें वस्त्र तैयार करती हैं-

 गान्धी नामर नौका खनिये,

 जवहर नामर बठा।

 स्वरात आनिबके लागि,

 हाते काटों सूता।’⁶

ब्रज तो कृष्ण की रास भूमि रही है वहाँ गाँधी भारत का भार उतारने वाले अवतारी हैं-

 अवतार महात्मा गाँधी है

           भारत को भार उतारन को।

 सिरी राम ने रावन मारो थौ, 

          कान्हाँ ने कंस पछारो थौ,

 अब गाँधी ने अवतार लियौ 

           इन अंग्रेजन के मारने को⁷

ब्रज के लाँगुरिया गीतों में गांधी का वर्णन मिलता है -

रे लाँगुरिया दिन पंद्रह अगस्त कौ आइ गयौ,

जो दिन देस भयौ आजाद।

रे लांगुरिया सरदार भगतसिंह आजाद और गाँधी सुभाष लाजपत ने दै दिये अपने प्रान⁸

ब्रज की होरी में बापू हरि के आगे होरी खेल रहे हैं-

खेलौ री देस प्रेम की होरी

रंग संगठन कौ मिलि त्याग गगरिया कोरी

खेले भगतसिंह अति प्यारे, राजगुरु सुखदेव सितारे

बापू खेले हरि के आगे, हम खेलत रहे अभागे⁹

अवधी में विवाह के अवसर पर महिलाएँ गारी गाती हैं उसमें चरखा चलाना, सूत कातना और विदेशी कपड़े छोड़कर खद्दर पहनने का आग्रह है-

 हम भारतवासी, पाये सुराज सही रे सही,

 मिले गाँधी जवाहर एकहि बात कही रे कही।

 सब कातउ चरखा, सुखकर मूल यही रे यही,

छोड़ो कपड़ा विदेसी खद्दर लेव गही रे गही।¹⁰

चरखा राष्ट्रीयता बोध और स्वावलम्बन का प्रतीक बन गया अवधी गीत में चरखे का तार न टूटे और निरंतर चलता रहे सृजनशीलता का परिचय देता है-

मोरे चरखे क टूटै न तार,

चरखवा चालू रहै।

मोती जवाहर बने बराती

दुलहिन बनी सरकार

चरखवा चालू रहे।¹¹

गाँधी का नाम बालकों के बीच भी इतना लोक प्रिय हो गया कि उनकी जय बोली जाने लगी।

एक छोटी चवन्नी चाँदी की,

जय बोला महात्मा गाँधी की।¹²

बना तो ‘कामण’ के वश में न होकर गाँधी के वश में है-

 बन्ना हमारो गाँधी के बस माँ

 तिरंगा झण्डा उठा रहा है।’¹³

एक लोक गीत देखिए जिसमें नायिका खद्दर की चुनरिया मंगवा रही है-

 बलम मोहे खद्दर की छपवा दो चुनरिया

चारों कोने गांधी जी के मूरत

बीचा में चरखा के तीर¹⁴

गाँधी जी का मानना था कि ‘मुक्त व्यापार ने तो भारत के किसानों को बरबाद ही कर दिया है। क्योंकि उससे यहाँ के गृह उद्योग बिल्कुल नष्ट ही हो गए हैं। और फिर संरक्षण के बिना कोई भी नया व्यापार विदेशी व्यापार से स्पर्धा में टिक नहीं सकता। इसीलिए उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं पर जोर दिया।15

भोजपुरी लोक गीत में प्रिया अपने प्रिय से आग्रह कर रही है कि तुम अब विदेश मत जाओ हम मिलकर चरखा कातेंगे और सुराज मिलेगा-

अब हम कातबि चरखवा, पिया मति जाहु विदेसवा।

हम कातबि चरखा सजन तुहु लाव,

मिलिहें एही से सुराजवा।।1।।

होइहें सुराज तबे सुख मिलिहें;

कटि जइहें सब के कलेसवा।।2।।

देसवा के लाज रहे चरखा से

गाँधी के मानो सनेसवा।।3।।

कहता रे गाँधी जी कि चरखा चलावहु;

एही से हटिहे कलेसवा।।4।।¹⁶

अर्थ - कोई स्त्री अपने पति से कहती है कि ऐ पति। अब मैं चरखा कातूँगी; अतः तुम परदेश मत जाओ। तुम चरखा बनाकर लाओ मैं उसे कातूँगी इसी से स्वराज मिलेगा।।11।।

जब स्वराज मिलेगा; तभी देशवासियों को सुख मिलेगा और सब लोगों का क्लेश दूर हो जायेगा।।2।।

महात्मा गाँधी के संदेश को मान जाओ। देश की लाज चरखे से ही रहेगी, अर्थात् इसी के द्वारा स्वराज्य की प्राप्ति होगी।।3।। महात्मा गाँधी कहते हैं कि चरखा चलाओ। इसी से सब देशवासियों का कष्ट दूर होगा।¹⁷

सन् सत्तावन की क्रांति के अग्रदूत मेरठ जनपद के लोक गीत में गांधी लाठी लिये हुए बंदूक वाले (अंग्रेज) से सामना कर रहे हैं-

तेरे घर में घुस गये चोर

गाँधी दीवा दिखैयो रे

तेरे तो भाई गांधी टोपी वाले

यह टोप वाला कौन

गांधी दीवा दिखैयो रे

तेरे तो भाई गांधी धोती वाले

यह पतलून वाला कौन

गांधी दीवा दिखैयो रे

तेरे तो भाई गांधी लाठी वाले

यह बन्दूक वाला कौन

गांधी दीवा दिखैयो रे¹⁸

हरियाणवी लोक गीत में गाँधी बिन हथियार लड़ रहे हैं और समूचा भारत वर्ष उनके साथ है। यानि अहिंसा को जनमानस ने अपनाया है-

बिन हथियार गांधी लड़ रह्या ऐकला।

हे, गांधी की माता न्यूं रौवे, रे मेरे आज्या लाड़ले पूत,

या इतनी बड़ी से फौज, तेरे हाथ ना पूंणी सूत

बिन हथियार गांधी लड़ रह्या ऐकला।

री क्यूं रोवै माता बावली, री मेरे साथ से पूरा देश,

बिन हथियार गांधी लड़ रह्या ऐकला।¹⁹

एक अन्य गीत में गाँधी के हाथ में सत्याग्रह का हथियार है और उनके इस हथियार से लंदन भी काँप उठा है-

बाजी नांय पांय या लँगोटी वाले से

हाथ या के सत्याग्रह हथियार

लन्दन कोपा गांधी बाबा²⁰

अर्थ - इस लँगोटी वाले से हम बाजी नहीं लगा सकते। उसके हाथ में सत्याग्रह का हथियार है। गांधी बाबा, लन्दन काँप उठा।

कन्नौजी लोक गीत में सूत की चुनरिया नायिका मंगवा रही है-

चुनरिया मोकउँ अहसी मंगाइ दे मेरे बीर।

सुद्ध हाथ की कती बुनी हो काँगरेस के रंग मई हो।²¹

राजस्थानी लोक गीत में चरखा अंग को ढंकने वाला है और वह घर का मालिक है यानि स्वावलंबन की ओर अग्रसर है हर हाथ को काम मिलने पर वह समर्थ बनता जा रहा है-

भला रे भूं बेली चरखा भूं

म्हारो अंग ढकिदो तूं

म्हारो घर रो मालक तूं²²

भीलों की गांधी जी के प्रति बड़ी श्रद्धा थी गांधी जी के रचनात्मक कार्यों के लिए उनके मन में तीव्र आकर्षण था गांधी ने देश को स्वाधीन कराया है। यह वे जानते थे राजस्थानी लोक गीत में इसका वर्णन मिलता है-

रई ने केवें वाले रे गांधी हंई आवे रे।

धोली ने टोपी रे गांधी हंई आवे रे।

लांबो ने कूरतो पोरियां, गांधी हंई आवे रे।

एक धोतरीयुं पेरियां, गांधी हंई आवे रे।

अंगरेजानु राज गांधी हंई आवे रे।

गुलामी नहीं करवी गांधी हंई आवे रे।

मली करीने रेवुं गांधी हंई आवे रे।

एक के तो आवे गांधी हंई आवे रे।²³

मेवाड़ में यह चरखा गीत विवाहोत्सवों पर गाया जाता था बहुत दिनों बाद गाँधी जी आये और घर-घर चरखा दे गए। वायल और मलमल छोड़ दो और खादी से प्यार कर लो-

घणा दनां में आया गांधीजी

घर-घर चरखा चलाय

गांधी जी चरखो दे गया

रेंट्यो तो है रंग रंगीलो

ताण्यां है लाल गुलाल

गांधी जी दरसण दे गया

वायल मुलमुल छोड़ दो बेन्याजी

करलो खादी सूं प्यार

गांधी जी चरखो दे गया²⁴

हाड़ौती लोक गीत में गाँधी की तकली चल रही है-

 जै बोलो महात्मा गांधी की,

ज्यां एं आजादी दिखलाई।

तकली घर घर में चलवाई,

भाग्या फिरंगी आगा जी।²⁵

गाँधी जी ने हर हाथ को काम दिया। व्यक्ति को परिश्रमी बनाया प्रस्तुत राजस्थानी लोक गीत में चरखे से चलने का आग्रह है कि तूं धीमे धीमे चल -

चाल रे चरखला, हाल रे चरखला

ताकू तेरो सोवणो, लाल गुलाबी माल

चरकूँ-मरकूँ फिरै घेरणी, मधरो मधरो चाल²⁶

अर्थ - चल मेरे चरखे, चल। तेरा तकला सुहावना है। तेरी माल लाल गुलाबी रंग की है! तेरी घेरनी चर चूं चर चूं करती फिरती है। तू धीरे-धीरे चल।

इस चरखे को कातने वाली प्रिया बड़ी सुंदर है-

 चाल रे चरखला हाल रे चरखला

कातण वाळी छैल छबीली बैठी पीढो ढाळ

म्हीं म्हीं पूणी कातैं लाम्बो काढै तार

चाल रे चरखला हाल रे चरखला²⁷

1931 में जब गाँधी जी गोलमेज परिषद् में जा रहे थे तब इन भावनाओं को गुजराती के मेघाणी ने इन शब्दों में व्यक्त किया था-

कटोरा यह अंतिम है विष भरा, पी जाना बापू

समंदर पीने वाले देखना अंजलि न ढुले²⁸

लोक साहित्य में गांधी की उपस्थिति सर्वप्रथम है। गांधी सैंकड़ों वर्षों से मूक बनी जनता का स्वाभिमान है।

छत्तीसगढ़ी लोक गीत में गाँधी सत्य के सहारे अंग्रेजों से संघर्ष कर रहे हैं-

अये है अकासे में पुन्नी के चन्दा

अवतरे दुनिया में हवै गाँधी देवता

अंगरेज मेर हवै फऊद फटाका

बन्दूक भाला के ओरी लगे है

गाँधी मेर नइये फऊद फटाका

बन्दूक भाला कहाँ ले पाही दाई

ओला हवै एक सत के भरोसा²⁹

अर्थ - आज आकाश में पूर्णिमा का चाँद उदित हुआ है। दुनिया में गाँधी जी का अवतार देवता के रूप में हुआ है। अंग्रेजों के पास तो लड़ाई के लिए गोला बारूद व फौज पलटन है पर गाँधी के पास न फौज है न पलटन केवल सत्य का सहारा है।

लोक गीतों ने स्वतंत्रता की आग को सुलगाने का कार्य किया। लोगों में नई चेतना, नई स्फूर्ति राष्ट्र प्रेम और राष्ट्र भक्ति के भाव भरे। प्रेरणादायी गीतों को गाते-गाते आजादी के सिपाहियों ने अंग्रेजों के लाख सितम सहे पर झुके नहीं, टूटे नहीं-छत्तीसगढी फाग गीत में चेतना की झंकार कुछ इस तरह है-

अरे हाँ यारों कपड़ा पहिरो खादी के

जय बोलो महात्मा गाँधी के।³⁰

निमाड़ी लोक गीत में किसान भाइयों से जागने को कहा है यह जागरण की वेला है गाँधी ने सत्याग्रह की धूम मचा दी-

जागो रे किरसाण भाई

ई जागरण की बेला छे

जेका साथ में गांधी जी होय

कुण कयेज ऊ अकेला छे

गांधी बाबा ने अलख जगई दी

सत्याग्रह की धूम मचई दी³¹

संथाली लोक गीत में गाँधी पश्चिम दिशा से आते नजर आ रहे हैं उनके हाथ में कानून की पोथी है-

चेतान दिसम् खुन गांधी बाबाये दराए कान्

तीरे तापे नायोगो कानुन पुथी

बहक् रेताए खद्दर टोपरी

तारिन रेताए नाया गो मोटा गामछा

माहो दिसम् रेन मानवाँ वंचाव

तवोन लगितए है अकाना³²

अर्थ - हे माँ, पश्चिम दिशा से गांधी बाबा आये हैं।

उनके हाथ में कानून की पोथी है।

उनके माथे पर खद्दर की टोपी है।

उनके कन्धे पर मोटा गमछा है।

हे बन्धुगण सुनो।

वे हम लोगों को बचाने के लिए आये हैं।

गोंड जन जाति शिक्षा से दूर रहने पर भी गांधी सम्बंधी गीत गा-गाकर जंगल में मंगल मनाया करते हैं- जिसमें गाँधी के राज की आशा जग गयी है-

अद्दल गरजे बद्दल गरजे

गरजे माल गुजारा हो

फिरंगी राज के हो गरजे सिपाइरा रामा

गांधी क राज होने वाला हाय रे

हो हो हो, गांधी का राज होने वाला हाय रे³³

अर्थ - बादल गरजता है।

मालगुजार गरजता है।

फिरंगी के राज का सिपाही भी गरजता है, हे राम!

गांधी का राज होने वाला है।

हो हो हो ............... गांधी का राज होने वाला है।

गांधी का राज होने वाला है वस्तुतः अन्धकार में प्रकाश-किरण का दृश्य उपस्थित करता है।

यह मध्यप्रदेश की कोरकू जनजाति का लोक गीत है-

जिसमें गाँधी जी का साथ देने को कहा गया है।

जीव उरा सुसुन एटा जेका सिरिंग रे।

बापूयेन खोबोर हेजेबा रे।।

आनंदोटेन कोयोके सुसुंन जा रे।

एटा केण्डे बदड़ायेन डडाल जा रे।।

आले सब्बोकू सड़पेबा रे।

हिम्मटो कामू डायूबा रे।।³⁴

अर्थ - हे भाई। हम सब कोरकुओं का मन नाच उठा है आओ रण भेरी के गीत गाओ। अपने देश को अंग्रेजों से मुक्त कराना है हम सब एक जुट होकर स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेज रूपी काले बादलों को भगाकर ही रहेंगे हमें गाँधी जी का साथ देना है।

बैगा जनजाति का लोक गीत देखिए-

चालो के चालो भाई हमार देश में। 

आली रै मैदान हमार देश में।।

आली रे मैदान में भारी अस पीपर। 

भारी अस पीपर तरे महिलान झार रे।।

महिलान झार तरे गांधी जी के डेरा। 

गांधीजी के डेरा में उलहई करला बांस।

पेड़ बोंगा बोले फूलों की बोंगा बोंगे रे। 

माझे बोंगा न के तकुआ बनाये।।

तकुआ बनाये भैया पौनी बनाये रे। 

ऐसन लगरा बने भाई फटे न फलथ है।³⁵

अर्थ - बैगा युवक कहते हैं कि हे भाई हमारे देश में चलो! हमारे देश में बहुत बड़ा मैदान है उस मैदान में पीपल का पेड़ है उसी के पास महलोन का पेड़ है जहाँ गाँधी जी आकर रुके हैं। गाँधी जी के निवास के पास बाँस का पेड़ कोंपल दे रहा है उसी बाँस से सूत कातने का तकुआ बनाया है और उसी से सूत काता है। उस सूत की साड़ी फाड़ने से भी नहीं फटती।

आन्ध्र प्रदेश के लोक गीत में गांधी के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित किए हैं- गाँधी प्रजा की शोभा है-

राटमु ओड़कारम्मा ओ अम्मालारा

गांधी कि जय अंचु दारामु तीयारे

एकुलु राटमु इन्टिकन्दम्मू

महात्मा गांधी प्रजल कन्दम्मू

अर्थ - चरखा कातो, ओ पुत्रियों,

गांधी की जय कहते हुए सूत के तार निकालो;

पूनी और चरखा घर की शोभा है,

महात्मा गांधी प्रजा की शोभा है।³⁶

तमिल लोक गीत में गाँधी ऋषि तुल्य हैं

गांधी ऋषि ननमें कार्पातुम महाऋषि, गांधी ऋषि!³⁷

अर्थ - गांधी ऋषि, हमारी रक्षा करता हैं, महान् ऋषि, गांधी ऋषि

महात्मा गांधी ने कभी कहा था कि 

लोक गीतों में धरती गाती है, पहाड़ गाते हैं, नदियाँ गाती हैं, फसलें गाती हैं, उत्सव और मेले ऋतुएँ और परम्पराएँ गाती है।

लोक गीत सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तनों से निरन्तर प्रभावित होते रहते हैं। वे अपने युग को पुरातन का संदेश तथा भविष्य की प्रेरणा देते हैं।

लोक में गांधी के प्रभाव की अविरल प्रवाहमान धारा का साक्षात् कर हम अपनी विरासत को नई पीढ़ी को सौंप सकते हैं।


संदर्भ ग्रंथ :

  1. संस्कृति के चार अध्याय : रामधारी सिंह दिनकर लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, नवीन संस्करण 2002, पृ. 531
  2. सम्पूर्ण गांधी वाड्मय खण्ड चौबीस प्रकाशन विभाग सूचना और मन्त्रालय भारत सरकार जुलाई 1975 पृ. 28-29 प्रस्तावना : गुजरात एड इट्स लिटरेचर (2 मई, 1935 से पूर्व) अंग्रेजी से साभार
  3. गढवाली लोक-साहित्य का विवेचनात्मक अध्ययन : मोहनलाल बाबुलकर, हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सन् 1964, ई. पृ.87
  4. बेला फूले आधी रात : देवेन्द्र सत्यार्थी राजहंस प्रकाशन, दिल्ली पहली बार 1948, पृ. 401
  5. सम्मेलन-पत्रिका लोक संस्कृति विशेषांक पंजाबी लोक-गीतों में समय के पद चिह्न अमृता प्रीतम का आलेख, हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, भाग 39, संख्या 2-3, सन् 1995 ई., पृ. 191
  6. भारतीय लोक साहित्य कोश (खण्ड-1) सं. डॉ. सुरेश गौतम संजय प्रकाशन दिल्ली प्र.सं. 2010 में असमिया लोक संस्कृति पर डॉ. हरेराम पाठक का आलेख पृ.418
  7. लोक गीतों का विकासात्मक अध्ययन : डॉ., कुलदीप, प्रगति प्रकाशन आगरा, सन् 1972, पृ.296
  8. भारतीय लोक साहित्य कोश (खण्ड 5) सं. सुरेश गौतम संजय प्रकाशन दिल्ली, प्र.सं. 2010 में ब्रज लोक संस्कृति पर डॉ. रामशरण गौड़ का आलेख, पृ. 2285
  9. भारतीय लोक साहित्य कोश, वही खण्ड, पृ. 2291
  10. अवधी लोक गीत : समीक्षात्मक अध्ययन : डॉ. विद्याविन्दु सिंह, परिमल प्रकाशन इलाहाबाद प्र.सं. 1983 ई. पृ. 388
  11. वही, पृ. 387
  12. वही, पृ. 386
  13. वही, पृ. 386
  14. भारतीय लोक साहित्य कोश खण्ड 2, सं. डॉ. सुरेश गौतम, संजय प्रकाशन दिल्ली प्र.सं. 2010 में अवधी लोक संस्कृति पर डॉ. कृष्ण गोपाल मिश्र का आलेख पृ. 539
  15. सम्पूर्ण गांधी वाड्मय भाग 24 (मई-अगस्त 1924) प्रकाशन विभाग सूचना और प्रसारण मंत्रालय, फरवरी 1968, पृ.44
  16. भोजपुरी लोक-गीत सं. डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, द्वितीय भाग हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सन् 1999, पृ. 336-337
  17. वही पृ. 337
  18. बेला फूले आधी रात, देवेन्द्र सत्यार्थी राजहंस प्रकाशन, दिल्ली, सन् 1948, पृ. 398
  19. साहित्य अमृत अगस्त 2017, हरियाणवी लोक-संस्कृति : एक झलक : विजयदत्त शर्मा का आलेख पृ. 210
  20. बेला फूले आधी रात : देवेन्द्र सत्यार्थी, राजहंस प्रकाशन दिल्ली सन् 1948, पृ. 398-99, पृ. 398
  21. वही लोक साहित्य कोश खण्ड-2 में कन्नौजी लोक संस्कृति पर डॉ. सुरेशचन्द्र त्रिपाठी का आलेख, पृ. 901
  22. लूर पत्रिका : सं. डॉ. जयपाल सिंह राठौड़, श्रम लोकगीत विशेषांक, पृ. 157
  23. भील क्रांति के प्रणेता : मोतीलाल तेजावत : राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर, प्रकाशन 1985 ई., पृ. 110
  24. लोक कलाओं का आजादीकरण : डॉ. महेन्द्र भानावत, मुक्तक प्रकाशन, उदयपुर, प्र.सं. 2002, पृ. 21
  25. हिन्दी साहित्य में गांधी चेतना : डॉ. रमेशचन्द्र शर्मा, साहित्य रत्नालय कानपुर प्रकाशन 1981, पृ. 395
  26. राजस्थान के लोक गीत : सं. ठा. राम सिंह, सूर्यकरण पारीक, नरोŸामदास स्वामी राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर, प्र.सं. 1938, द्वि.सं. 2019, पृ. 321
  27. सांस्कृतिक राजस्थान : रानी लक्ष्मी कुमारी चूण्डावत, राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस (प्रा.) लि. जयपुर, प्र.सं. 1994, पृ. 142
  28. भाषा संपादक डॉ. अर्चना त्रिपाठी, हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना : प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी का आलेख, मार्च-अप्रेल 2017, अंक 271 वर्ष 56, पृ. 75
  29. सुराज स्वतंत्रता संग्राम के आंचलिक गीत और चित्रांकन आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, सन् 2019
  30. मड़ई 2015 सं. डॉ. कालीचरण यादव बिलासपुर (छ.ग.), पृ. 276
  31. भाषा वही पृ. 172
  32. बेला फूले आधी रात : देवेन्द्र सत्यार्थी राजहंस, प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 396
  33. बेला फूले आधी रात वही, पृ. 397
  34. सुराज स्वतंत्रता संग्राम के आंचलिक गीत और चित्रांकन आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, भोपाल, सन् 2019
  35. वही
  36. बेला फूले आधी रात वही, पृ. 405
  37. भाषा वही मार्च-अप्रैल 2017, पृ. 168

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