संतों और भक्तों ने अपने त्याग और तपस्या के माध्यम से मानव मात्र के कल्याण के लिए कई सुगम रास्ते बताये । इनमें से भक्ति का मार्ग भी एक है । वेद विज्ञान से सम्पन्न समाज धीरे-धीरे वर्णाश्रम व संकीर्ण जातीयता में फँस गया ।
श्भक्तिश् निज मंदिर में आकर सिमट गयी और आम आदमी अपने अराध्य से दूर होता चला गया । ऐसी परिस्थितयों में गौतम बुद्ध आये जिन्होंने वर्णाश्रम व जातीय बंधनों को शिथिल कर दिया । इसका अनुसरण करते हुए अन्य साधुओं ने भारत में वह अवस्था उत्पन्न की जिसमें निर्गुनिया संतों का मत फल-फूल सका ।1
कई विद्वानों का मानना है कि श्भक्ति द्राविड़ ऊपजी लाये रामानंदश् रामानंद भक्ति का बीज लेकर उत्तरी भारत में आये और उन्हीं की परम्परा में सगुण और निर्गुण शाखाएँ विकसित हुई ।
इतिहास के कालक्रम में यह समय मुगल बादशाहों का समय है जब मुगल काल का स्वर्णिम युग था तभी हिंदी साहित्य के इतिहास का भी स्वर्णिम युग था । हिंदी जगत में वे सभी संत और भक्त हुए जिन्होंने अपनी वाणी से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया और हिंदी को आमजन की भाषा के रूप में स्थापित किया । संतों के विचार किसी भाषा के मोहताज नहीं हुए । उनके वहाँ भावों, विचारों और भाषा का भी सामंजस्य है । समाज की निम्न कही जाने वाली जातियों में² एक से बढ़कर एक महान संत हुए । उनके सम्प्रदाय स्थापित हुए और सदियों से आध्यात्मिक ज्ञान की पिपासा को मिटाने के लिए भक्तों ने समाज में एक नयी चेतना पैदा कर दी ।
दादू पंथ के संस्थापक दादू का जन्म भी ऐसे ही समय में हुआ । हमारे महापुरुषों के जन्म से सम्बन्धित कोई न कोई कथानक रूढ़ि या लोक मान्यता जुड़ी होती है । दादू के जन्म से भी जुड़ी हुई है । दादू किसी ब्राह्मणी के पुत्र थे । और साबरमती नदी किनारे ( अहमदाबाद ) में तैरते हुए निःसंतान पिता को मिले3 उनका लालन-पालन हुआ वे बड़े हुए विवाह हुआ । पिता व्यापारी थे और दादू का हृदय दयालु इसलिए अकाल के समय अनाज लेने जो भी आये उन्हें अनाज तौल दिया । ऐसी कई चामत्कारिक घटनाएँ महापुरुषों के जीवन से जुड़ी होती हैं जो उनके असाधारण जीवन वृत्त पर प्रकाश डालती है ! दादू के शिष्य सुंदरदास अपने गुरु का परिचय देते हुए कहते हैं दृ‘एक पिंजारा ऐसा आया । रूह रुई पींजण कै कारण, आपन राम पठाया ।4
दादू ने अपने कर्मस्थली राजस्थान को बनाया वे अहमदाबाद से किशनगढ़ फिर सांभर , आमेर और अंत में नरेना रहे । दादू की यह उत्कृष्ट इच्छा थी कि विभिन्न धर्मों तथा संप्रदायों की समान बातों पर प्रकाश डालकर समाजगत जातीय भेदभाव को नष्ट किया जाए । इसी उद्धेश्य को लेकर उन्होंने दादू पंथ की स्थापना की ।5
भाई रे ! ऐसा पंथ हमारा
द्वै पख रहित पंथ गह पूरा अवरन एक अधारा ।
बाद बिबाद काहु सौ नाहीं मैं हूं जग थे न्यारा ।।6
कबीर की तरह दादू की बानी में खंडन और वाद विवाद में रुचि नहीं है ! दादू के स्वभाव में विनयमिश्रित मधुरता अधिक है ।7 वे साधना सम्बंधी मिथ्याचारों पर आघात करते समय कभी उग्र नहीं होते ।
दादू की सुदीर्घ शिष्य परम्परा जिसमें हिंदू और मुसलमान दोनों है ने साबित कर दिया कि दादू की वाणी सभी धर्मों को लेकर चलने वाली है ।
दादू ने अपने इस सम्प्रदाय का सूत्रपात अपने साथियों की गोष्ठी के अंतर्गत आध्यात्मिक तत्त्वों की चर्चा द्वारा किया था । उनका मुख्य उद्धेश्य यही था कि किस प्रकार प्रचलित परस्पर विरोधी धर्मों का सम्प्रदायों के बीच समन्वय लाने वाली बातों का निरूपण किया जाये । उनकी यह भी इच्छा थी कि सर्वसाधारण के लिए भी सुलभ तथा उपयोगी सिद्ध होने वाली जीवन पद्धति का निर्माण किया जाय ।8
दादू ने कबीर को बार-बार स्मरण किया है । कबीर की साधना पद्धति से वे प्रभावित थे दादू वाणी में इसका उल्लेख मिलता है ।
दादू रहणि कबीर की, कठिन विषम यहु चाल ।
अधर एक सौ मिलि रह्या जहां न झपै काल ।।9
जहाँ पहुँचने पर काल भी झपट्टा नहीं मार सकता । दादू वाणी को संगृहीत करने का कार्य उनके शिष्य मोहन जी दफ्तरी ने आरंभ किया था । संतों ने साखी के महत्व को समझा और दो पंक्तियों में ही जीवन का सारांश समझाने की चेष्टा की ! श्दादू दयाल ग्रंथावलीश् के अतिरिक्त काया बेली श्ग्रन्थ पहराश् (बणिजारियों) इनके स्वतंत्र ग्रंथ हैं जिनमें साखियाँ संगृहीत हैं ।
दादू ने पोथियों के ज्ञान के बदले प्रेम को अधिक महत्व दिया । प्रेम की पाती बांचने वाले बिरले ही होंगे।
दादू पाती प्रेम की, बिरला बांचौ कोइ ।
वेद पुरांन पुस्तक पढे, प्रेम बिना क्या होइ।।10
दादू अपनी बात कहते समय बहुत नम्र और प्रीत दिखाई देते हैं । मूर्ति पूजा के बारे में उनका विचार था कि यह सब व्यर्थ है । कंकड़ों और पत्थरों की सेवा करने से क्या लाभ है । ऐसा करते - करते हमने अमूल्य जीवन खो दिया । ईश्वर तो हमारे हृदय में निवास करता है उसको दूसरे स्थानों पर ढूँढने की क्या आवश्यकता है।
दादू जिनि कंकर पथर सेविया, सो अपना मूल गंवाई।
अलख देव अंतरि बसै, क्या दूजी जगह जाइ ।।11
दादू वाणी में कहते हैं कि वही साधक श्रेष्ठ है जो ब्रह्म के नाम का स्मरण करते है—
दादू सोई जोगी सोई जंगमां, सोई सोफी सोई सेख ।
सोई संन्यासी सेवड़े जे सुमिरैहि एक अलेख ।।12
निम्न कही जाने वाली जातियों में उत्पन्न महापुरुषों ने अपनी प्रतिभा और भगवन्निष्ठा के बल पर समाज के विरोध का भाव कम कर दिया था ।
दादू दयाल ने धर्म का सार प्रस्तुत करते हुए कहा कि सच्चा मुसलमान वही है जो अपने ईमान पर अडिग रहता है और खुदा के आदेशों की पालना करता है–
दादू मुसलमांन जु राखै मांन, सांई का मांनै फुरमांन ।
सारौ कौ. सुखदाई होइ, मुसलमांन करि जांनूं सोइ ।।13
वे ही काजी, मुल्ला मोमिन अच्छे हैं जो दयालु खुदा की भक्ति में तल्लीन रहते हैं–
दादू सोई काजी सोई मुलां, सो मोमिन मुसलमान ।
सोई सयानें सब भले, जे रते रहिमांन ।।14
जिस प्रकार जीवात्मा तथा परमात्मा तथा जगत् की अभेदमयी मौलिक एकता है और उस मूल तत्त्व का सच्चा स्वरूप सहज , शून्य तथा प्रेममय है , उसी प्रकार उनकी साधना तथा व्यवहार का निष्कर्ष सहज , समर्पण , सुमिरण और सेवा है ! यही दादू दयाल के सिद्धांतों का सार है !
सच्चा साधु वही है जो मध्यम मार्ग पर चलकर सच्ची राह बताता है –
दादू करणीं हिंदू तुरक की, अपणीं अपणीं ठौर ।
दुह बिचि मारग साध का , यहु संतौ की रह और ।।15
दादू की शिष्य परम्परा में हिंदू-मुस्लिम, गृहस्थ-सन्यासी दोनों हुए । श्भक्तन को का सीकरी सो कामश् उसी सीकरी में बादशाह अकबर ने दादू दयाल के साथ चालीस दिन तक सत्संग किया ।
दादू की वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है । सामाजिक सौहार्द्र के लिए संतों की वाणी ही मनुष्य को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है । वाणी का पाठ करने के साथ ही उसे व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है ।
संदर्भ सूची
- संस्कृति के चार अध्याय रू रामधारी सिंह दिनकर, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद नवीन संस्करण 2002 पृ. 156
- हिन्दी साहित्य रू उद्भव और विकास रू हजारी प्रसाद द्विवेदी राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पुनर्मुद्रित 1992, पृ. 86
- मरदुमशुमरी राज मारवाड़ सन् 1891 रू मुंशी हरदयाल सिंह जैन ब्रदर्स रातानाडा, जोधपुर, पुनः प्रकाशन 12 मई 1997, पृ. 290
- दादू समग्र (एक) सम्पादन रू गोविंद रजनीश अमरसत्य प्रकाशन, दिल्ली प्र.सं. 2007, पृ. 62
- स्वामी दादू दयाल रू झमटमल खूबचंद भावनाणी नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, प्र.सं. 1992 भूमिका
- हिन्दी साहित्य का इतिहास रू आचार्य रामचंद्र शुक्ल नागरी प्रचारिणी सभा, काशी संवत् 2056 वि., पृ. 48
- हिन्दी साहित्य रू उद्भव और विकास रू हजारी प्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पुनर्मुद्रित 1992 पृ. 86
- उत्तरी भारत की संत-परंपरा रू आचार्य परशुराम चतुर्वेदी भारती भंडार लीडर, इलाहाबाद द्वि.सं. सं. 2021, पृ 517
- दादू समग्र (दो) सं. गोविंद रजनीश साखी खंड अमर सत्य प्रकाशन दिल्ली प्र.सं. 2007, पृ. 402
- वही साच कौ अंग साखी सं. 97 पृ. 339
- वही साच कौ अंग साखी सं. 123 पृ. 345
- वही साच कौ अंग साखी सं. 153 पृ. 352
- वही साच कौ अंग साखी सं. 27 पृ. 324
- वही साच कौ अंग साखी सं. 154 पृ. 352
- वही मधि कौ अंग साखी सं. 46 पृ. 409
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