बुंदेल खंड की लोक संस्कृति भारत और विश्व के अनेक जनपदों की लोक संस्कृतियों से भी प्राचीन है।1 इसी जनपद में हिंदी के वाल्टर स्काट बाबू वृंदावन लाल वर्मा का जन्म (9 जनवरी, 1889 ई.) को हुआ और सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की महान नायिका रानी लक्ष्मी बाई की भी यह कर्मभूमि रही।
वर्मा जी के परदादा दीवान आनंदराय सन् 57 में रानी लक्ष्मीबाई की ओर से युद्ध में लड़ते हुए शहीद हो गए थे। उन्हीं के प्रपोत्र वृंदावनलाल ने हिंदी कथा साहित्य को तिलस्मी व ऐयारी वृति से निकालकर आंचलिकता व ऐतिहासिकता की ओर मोड़ दिया। इतिहास के उन अन छुए प्रसंगों पर प्रकाश डाला जो विस्मृति में चले गए थे। पेशे से वकील, गर्म दल के समर्थक कर्म से क्षत्रिय और जाति से कायस्थ वर्मा जी शिकार के शौकीन थे। उनकी रचनाओं में पहाड़, जंगल और खंडहर सजीव नजर आते हैं। वर्मा जी ने उनकी स्तब्धता को पहचानकर उन्हें सरस और प्रांजल बना दिया है। गढ कुंडार, विराटा की पदमिनी, झांसी की रानी, लक्ष्मीबाई (1946 ई. ) सदृश उपन्यास इन्हीं स्थलों पर रचे।
अनुसंधान परक दृष्टि जनमानस में प्रचलित कथाओं व बिखरे कथा सूत्रों का विश्लेषण कर ऐतिहासिक उन्यास रचे।
राजनीति विज्ञान ने राज्य का आवश्यक तत्व सम्प्रभुता को माना है। सम्प्रभुता के अभाव में कोई भी राज्य नहीं कहला सकता। रानी ने सम्प्रभुता के लिए ही युद्ध किया।वार वही है जिसे दुश्मन भी सराहे और अंग्रेजों को लिखना पड़ा ‘‘ैम ूं जीम इमेज ंदक जीम इतंअमेज वि जीमउ ंसस’’ काशीबाई को रानी कहती है। युद्ध वास्तव में है किस निनित? अपने जीवन और धर्म की रक्षा के लिए अपनी संस्कृति और कला को बचाने के लिए। ‘‘अंग्रेजों के छक्के छूट जाएँ और यह देश उनकी फाँस से मुक्त हो जाए।2
बचपन से कुश्ती, मलखंभ, घुड़सवारी और अस्त्र-शस्त्र के संचालन में बढ़-चढ़़ कर भाग लेने वाली मनू जब रानी बनी तो अपने संस्कारों को राज्य की जनता में प्रसारित किया। नारियों में आत्म विश्वास विकसित किया और कठिन परिस्थितियों में भी संघर्ष करने की प्रेरणा दी।
वर्मा जी के उपन्यासों में प्रेम और युद्ध साथ-साथ चलते हैं सच्चा पवित्र प्रेम जो दो हृदयों में अंकुरित होता चन्द्रधर शर्मा गुलेरी कि ‘उसने कहा था’ लहना सिंह और सूबेदारनी का प्रेम। वैसी ही भावना लिये हुए यह प्रेम है।
झाँसी की जनता वीर है, उसके निवासी जिनमें झलकारी कोरिन पूरन कोरी, नर्तकी जुही, मोती बाई, काशीबाई आदि नारियों का चरित्र, वहीं कुँवर खुदाबख्श, गुलाम गौस खाँ, बुंदेला वीर जवाहर सिंह, रघुनाथ सिंह, महाराष्ट्री वीर रामचन्द्र देशमुख, तात्या टोपे, तथा पठान वीर गुलमुहम्मद आदि का चरित्र जिन्होंने स्वातंत्र्य युद्ध में अपना खून मिलकर बहाया और स्वतंत्रता की नींव के पत्थर बने।
आज जब सांप्रदायिक द्वेष का बोलबाला बढ़ रहा है, हमारे लिए यह जानना शिक्षाप्रद होगा कि स्वाधीनता संग्राम के प्रथम युद्ध में रानी लक्ष्मीबाई के साथ दो सौ पठानों ने अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते प्राण दिए थे।3
इस उपन्यास से बुंदेलखंड की बोली बानी, जीवन-संस्कार, पर्व-त्योहार वहाँ की संस्कृति और जीवन शैली को पहचाना जा सकता है।4 एक उदाहरण देखिए हरदी-कूँकूँ के उत्सव पर सधवा स्त्रियाँ एक दूसरे को रोरी (रोली) का टीका लगाती हैं और उनको किसी न किसी बहाने अपने पति का नाम लेना पड़ता है।5
लेखक ने ऐतिहासिक तथा परम्परित घटनाओं को लेकर अपनी कल्पना का रंग ढाल कर रानी के एक ऐसे आदर्ष चरित्र का निर्माण किया है, जो हिन्दी साहित्य के लिए ही नहीं बल्कि, भारतीय इतिहास के लिए भी एक नवीन देन है।6 मेर वह स्वप्न कि उपन्यास लिखूँगा, ऐसा जो इतिहास के रंग-रेशे से सम्मत हो और उस संदर्भ में हो।7 साकार हो गया।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वर्माजी से एक प्रश्न पूछा गया कि ‘‘आज तक आपने जो कुछ लिखा है उसे वाक्य में बतायेंगे?’’ तो वर्मा जी का उत्तर था : ‘मैंने इतिहास को कला के चौखटे में जड़ने का प्रयत्न किया है।8’’
इस उपन्यास में रानी को नायिका ही नहीं नारी शक्ति के प्रतीक रूप में चित्रित किया गया है-
अंग्रेज अधिकारी ऐलिस ने गवर्नर जनरल की आज्ञा जब रानी को पढ़कर सुनायी कि आपको पाँच हजार रुपये मासिक वृत्त देने की घोषणा राज ने की है तो रानी ने परदे के पीछे से कहा’ मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।9
यह उपन्यास उस समय आया जब स्वतन्त्रता-प्राप्ति का सारा श्रेय तथाकथित अहिंसात्मक सत्याग्रही हड़प कर ले जा रहे थे। ‘झाँसी की रानी’ वर्मा जी के सशस्त्र क्रान्ति प्रयास का प्रतिनिधित्व करती हुई अहिंसात्मक सत्याग्रह के इस एकान्त श्रेय के दावे को ललकारती है।10
वर्मा जी ने अपनी आत्माभिव्यक्ति में कहा है-
1908 में ही मुझे वॉल्टर स्कॉट के कई उपन्यास पढ़ने को मिले। उनसे मुझे बुन्देलखण्ड के प्राकृतिक दृश्यों से सजे चरित्रों के सम्बन्ध में लिखने की प्रेरणा मिली।11
उपन्यासों में जिंदगी की आग के जितने शेड्स दिखाई देंगे, आस्वाद के जितने स्तर मिलेंगे उतने अन्य विधाओं में नहीं इसीलिए इसकी रचनाओं में आधुनिकता का उष्ण रक्त प्रवाह सबसे अधिक महसूस होता है।12 स्पष्ट है कि लाख कोशिश करने पर भी इसे इतिहासविद के बाहर नहीं किया जा सकता। इतिहासविद के दायरे में ही वह गहन से गहनतर अस्तित्व मूलक चिन्तनों को ले सकता है।
झांसी की रानी उपन्यास का चित्रपट देशव्यापी और विस्तृत है। प्रथम बार वर्माजी ने बुन्देलखण्ड की परिचित भूमि से बाहर निकलकर देशव्यापी ऐतिहासिक वातावरण को सजीव किया है। ‘रानी का शौर्य परिस्थितिजन्य था’, वर्माजी ने अंग्रेजों की इस भ्रान्त धारण का सफलतापूर्वक निराकरण किया है।13
बुंदेलखंड के चन्दवरदायी वर्मा जी ने अपने उपन्यास में आंचलिक इतिहास को पूरे देश और अंग्रेजी राज्य-विरोधी अभियान से जोड़ दिया है।14
रानी के इस कथन से लेखक स्वराज्य की नींव लगाता है-
जब जनता का पूरा सहयोग राज्य को प्राप्त हो जाए और राजा टीम-टाम तथा विलासिता का दासत्व छोड़कर प्रजा का सेवक बन जाए तब मानो स्वराज्य की नींव भर गई।15
रानी के तेजोदीप्त चेहरे का वर्णन वर्मा जी ने किया है रानी एक वीर नायिका की भाँति युद्ध में सज-धज कर जाती है- सफेद और पीली पौ फटी। उषा ने अपनी मुसकान बिखेरी। रानी स्नान-ध्यान और गीता के अठाहरवे अध्याय के पाठ से निपट चुकी।......... रानी ने नित्यवत् अपने रिसाले की लालकुरती की मर्दाना पोषाक पहनी। दोनों ओर एक-एक तलवार बाँधी और पिस्तौलें लटकाईं। गले में मोतियों और हीरों की माला जिससे संग्राम के घमासान में उनके सिपाहियों को उन्हें पहचानने में सुविधा रहे। लोहे के कुले पर चंदरी का जरतारी लाल साफा बाँधा। लोहे के दस्ताने और भुजबंद पहने।16
निर्णायक युद्ध की घड़ियाँ नजदीक है रघुनाथ सिंह को रानी कहती है। मेरी देह को अंग्रेज न छू पावें।17
जाना तो सभी को है एक दिन अमरित की घरिया पीकर कोई नहीं आया। कुछ लोग अपने जीवन के संघर्ष मूल्यों के बल पर अमर हो जाते हैं रानी अंग्रेजों से युद्ध करती-करती जब वीर गति को प्राप्त होती है तो बाबा गंगादास ने कहा - प्रकाश अनंत है। वह कण-कण को भासमान कर रहा है। फिर उदय होगा। फिर प्रत्येक कण मुखरित हो उठेगा।18 झांसी का सूर्यास्त हो गया पर आजादी का सूर्योदय हो गया।
अंग्रेजी सेना का एक दल रानी की ढूँढ, खोज में वहाँ पर आया। गुलमुहम्मद साँई से उसने पूछा, ‘यह किसका मजार है, साँई साहब? ‘गुलमुहम्मद ने उत्तर दिया, ‘हमारे पीर का, बौत बड़ी बली था।19
जगदम्बा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ ने इन अमर शहीदों को नमन करते हुए रचा है-
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निषां होगा।।20
कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ‘झांसी की रानी’ कविता में रानी के संघर्ष का वर्णन इस प्रकार किया है-
चमक उठी सन् सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी।
बुन्देले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।21
‘पदमावत’ में जायसी की इन पंक्तियों को रानी ने सार्थक कर दिया-
धनि सो पुरुख जस कीरति जासू,
फूल मरै पै मरै न बासू।22
रानी का यश आज भी जिंदा है। वह संघर्ष का प्रतीक है।
संदर्भ ग्रन्थ :
- गुप्त नर्मदा प्रसाद : बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि. नयी दिल्ली, प्र.सं. 1995, पृ.32
- वर्मा वृंदावनलाल : झाँसी की रानी, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली संस्करण सन् 2000 पृ. 107
- चौहान सिंह शिवदान : झाँसी की रानी पर एक दृष्टि ‘आजकल स्वर्ण जयंती अंक’ 1994, पृ.10
- राय गोपाल : हिन्दी उपन्यास का इतिहास राजकमल प्रकाषन नयी दिल्ली पटना संस्करण 2005, पृ. 162
- वर्मा वृंदावनलाल : झाँसी की रानी, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली सन् 2000 पृ. 37
- सिंह डॉ. त्रिभुवन : हिन्दी उपन्यास, शिल्प और प्रयोग हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी प्र.सं. फरवरी, 1973, पृ.123
- वर्मा वृंदावनलाल : झाँसी की रानी, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली सन् 2000 पृ.7
- सक्सेना राजीव : वृन्दावनलाल वर्मा साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली पुनर्मुद्रण 1999, पृ. 50
- वर्मा वृंदावनलाल : झाँसी की रानी, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली संस्करण 2000, पृ. 50
- माहौर भगवानदास : झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई आलेख ‘साहित्य सन्देश’ ऐतिहासिक उपन्यास अंक साहित्य रत्न भंडार आगरा, वर्ष 20, अंक 7-8, पृ. 345
- वर्मा डॉ. वृन्दावनलाल : आत्माभिव्यक्ति, साहित्य-सन्देश भाग 20, अंक 7-8 जनवरी-फरवरी 1956, पृ. 27
- सिंह डॉ. बच्चन : भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र का तुलनात्मक अध्ययन, हरियाणा साहित्य अकादमी, चण्डीगढ़ प्र.सं. 1987, पृ. 232
- तिंवारी डॉ. रामचन्द्र : हिन्दी का गद्य - साहित्य : विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, तृ सं. 1992 ई., पृ. 439
- सिंह बच्चन : हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि., तीसरी आवृत्ति 2004, पृ. 383
- वर्मा वृंदावनलाल : झाँसी की रानी प्रभात प्रकाशन, दिल्ली संस्करण सन् 2000, पृ. 162
- वर्मा वृंदावनलाल : झाँसी की रानी, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली संस्करण सन् 2000, पृ. 165
- वर्मा वृंदावनलाल : झाँसी की रानी, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली संस्करण सन् 2000, पृ.170
- वर्मा वृंदावनलाल : झाँसी की रानी, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली संस्करण सन् 2000, पृ.173
- वर्मा वृंदावनलाल : झाँसी की रानी, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली संस्करण सन् 2000, पृ.176
- चन्द्र देवेषः सं. स्वतंत्रता आंदोलन के गीत राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत सातवीं आवृत्ति 2017, पृ. 14
- अनुजा डॉ. मंगला : सुभद्रा कुमारी चौहान स्वराज संस्थान संचालनालय भोपाल, प्र.सं. 2004, पृ. 33
- अग्रवाल वासुदेवषरण सं. पदमावत : जायसी साहित्य सदन तलैया, झाँसी संस्करण 2002, पद 652, पृ. 713
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