अज्ञेय एक नाम है जो संसार के हर कोने में, जहाँ भारतीय बिखरे हुए हैं, जाना जाता है। यह एक ऐसे भारतीय साहित्यकार का नाम है जिसके लेखन की भाषा हिंदी थी, परंतु अनुभव की भाषा मानवीयता और भारतीयता थी।¹
शिष्ट साहित्य का लोक साहित्य से घनिष्ठ संबंध है। वास्तविक बात तो यह है कि शिष्ट साहित्य लोक साहित्य का ही विकसित संस्कृत तथा परिमार्जित स्वरूप है। इंग्लैण्ड के चिड्विक बंधुओं ने ‘ग्रोथ आव लिटरेचर’ नामक ग्रंथ में तथा एफ.बी.गूमर ने बिगिनिंग्स आव पोएट्री’ नामक अपनी सुप्रसिद्ध रचना में यह दिखलाने का प्रयास किया है कि अभिजात वर्ग के साहित्य के निर्माण में लोक साहित्य ने प्रचुर योगदान किया है।²
तार सप्तक की भूमिका में अज्ञेय लिखते हैं -
संगृहीत कवियों में से ऐसा कोई भी नहीं है जिसकी कविता केवल उसके नाम के सहारे खड़ी हो सके। सभी इसके लिए तैयार हैं कि कभी कसौटी हो, क्योंकि सभी अभी उस परमतत्व की शोध में ही लगे हैं जिसे पा लेने पर कसौटी की जरूरत नहीं रहती, बल्कि जो कसौटी की ही कसौटी हो जाती है।³
लोक तत्वों का प्रभाव अज्ञेय के काव्य पर संस्कार के रूप में व्यक्त हुआ है। संस्कार के स्तर में चेतन, अर्द्ध चेतन, स्वानुभूति भी स्वतः ही व्यक्त हुई है। इसीलिए सभी रागात्मक प्रवृत्तियों में आंतरिक मनोभाव भी सहज रूप में व्यक्त हो सके हैं। सहज इसलिए कि अभिव्यक्ति के साधारणीकरण में सहजता और स्वाभाविकता उपेक्षित रहे है। परंतु अज्ञेय के काव्य पर लोक तŸवों की सहजता व सरलता का उतना ही प्रभाव है जितना की नयी व्यंजना का।
अज्ञेय के काव्य पर लोक तत्वों के इस प्रभाव को हम चार भागों में बाँट सकते हैं -
- लोक सरलता
- लोक भाषा
- लोक परिवेश / लोक प्रतीक
- लोक संगीत
ये चारों प्रभाव अज्ञेय के काव्य में विभिन्न रूपों में व्यक्त हुए हैं। कहीं उन्होंने गीतों की सहजता को चुना है तो कहीं भाषा का नया प्रयोग, किसी लोक गीत के अंश, धुन, लय ताल के माध्यम से नयी चेतना देने की पहल की है।⁴
लोक गीत की तरह प्रश्नोत्तर शैली में अज्ञेय की कविता में इसका प्रयोग मिलता है-
यह दीप अकेला स्नेह भरा
है गर्व-भरा मदमाता, पर
इसको भी पंक्ति को दे दो।
यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा?
पनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृती लायेगा?
यह समिधा : ऐसी आग हठीला बिरला सुलगायेगा।
यह अद्वितीय : यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित :?5
उन्होंने परम्परागत छंदों से लेकर लोक-गीतों की लय और नये से नये मुक्त छंदों का प्रयोग किया है। अज्ञेय आधुनिक कविता में अपना एकाकी स्थान रखते हैं।⁶
प्रयोगवादी कवियों ने विशुद्ध लोक गीतों की रचना तो नहीं की है पर लोक गीतों से प्रभावित हो उनकी धुनों पर कुछ गीतों की रचना अवश्य की है।
भारतीय जीवन और काव्य में ऋतुओं का विशेष महत्व है। ऋतु को प्रयोगवादी कवियों ने अपनी कविताओं का विषय बनाया है। अज्ञेय की ‘वैशाख की आँधी’ लोक धुन के निकट है।⁷
लोक सरलता
लोक जीवन के परिवेश में सौन्दर्य है, दर्द है पीड़ा और वेदना है और जिसकी सहग अभिव्यक्ति मुंह से कहकर गाकर जी हल्का करने में होती है क्योंकि जो कुछ कवि व्यक्त करना चाहता है वह अपनी शांति के लिए नहीं वरन अपने आस-पास के जन समूह के लिए भी है-
उदाहरण -
ओ पिया, पानी बरसा
ओ पिया, पानी बरसा
घास हरी हुलसानी
मानिक के झूमर सी
झूमी मधु मालती
झर पड़े जीते पीत अमलतास
चातकी की वेदना बिरानी
..................
मेरा जिया तरसा
ओ पिया पानी बरसा⁸
इस कविता में लोक गीतों की सहजता और सरलता उभकर सामने आयी है और नई कविता को लोक तŸव का संस्कार प्राप्त हुआ है। ‘इत्यलम’ और ‘हरी घास पर क्षण भर’ में इसके सुंदर उदाहरण है-
आओ बैठो : क्षण भर तुम्हें निहारूँ।
अपनी जानी एक-एक रेखा पहचानूँ
चेहरे की, आँखों की अन्तर्मन की
और - हमारी साझे की अनगिन स्मृतियों की :
तुम्हें निहारूँ⁹
लोक भाषा
अज्ञेय ने भाषा की ताकत को पहचाना ‘पहचान’ कविता में अज्ञेय लिखते हैं-
हम सभी भिखारी हैं
भाषा की शक्ति
यह नहीं कि इसके सहारे
सम्प्रेषण होता है :
शक्ति इसमें है कि उसके सहारे
पहचान का वह सम्बन्ध बनता है जिसमें
सम्प्रेषण सार्थक होता है।10
नयी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए नये शब्दों की आवश्यकता पड़ती है और इसमें सन्देह नहीं कि ऐसे शब्दों का तो भण्डार लोकगीतों और गाथाओं में भरा पड़ा है।
लोक संगीत -
लोकगीतों की मँजी हुई धुनों के कारण ऐसे गीतों में मन पर प्रभाव डालने की अद्भुत क्षमता है ये धुनें ही लोकगीतों की प्राण हैं और कविता भी वही जिंदा रह सकती है जिसमें नाद सौंदर्य है-¹¹
लोक परिवेश / लोक प्रतीक -
अनुभूति की सरलता के आधार पर वातावरण को नये प्रयोग के रूप में स्वीकार किया गया।
‘हरी घास पर क्षण भर’ (1949) में कवि का रूप निखर कर साने आया। उनकी कविताएँ लोक तत्व का संस्पर्श लिए हुए है-
सवेरे-सवेरे
नहीं आती बुलबुल,
न श्यामा सुरीली
न फुदगी न दंहगल
सुनाती है बोली,
नहीं फूल सुँघनी,
पतेना-सहेली
लगाती है फेरे ।
जैसे ही जागा
कहीं पर अभागा
अड़ड़ाता, है कागा
काँय ! काँय ! काँय !
जागा, अभागा, कागा में अनुप्रास हैं परंतु लोक में प्रचलित अड़ड़ाता शब्द नये अर्थ बोध का नया आयाम सिद्ध करता है। मीरां ने भी प्रिय मिलन का संदेश कागा द्वारा देने पर चोंच सोना रूपा से मंडवाने का कहती है अन्यथा चोंच कटवाकर नमक भरवाने का आदेश देती है पद है ‘काग करूक कोटड़ियां’ इतना ही नहीं उसकी बोली को अड़ड़ाना कहकर एक नया रूप प्रदान किया है। प्रसिद्ध लोक कथा ‘सोहनी महिवाल (पंजाब की लोक प्रचलित दुखान्त गीत कथा है।¹²) को प्रेम के नये संदर्भ से जोड़ा है।¹³
योगफल
सुख मिला :
उसे हम कह न सके।
दुख हुआ :
उसे हमस ह न सके।
संस्पर्श बृहत् का उतरा सुरसरि-साः
हम बह न सके।
यों बीत गया सब !
हम मरे नहीं पर हम कदाचित्
जीवित भी हम रह न सके।¹⁴
सूर की गोपियाँ उद्धव को कहती हैं कि
हमारे हरि हारिल की लकरी
मन बच क्रम नंद नंदन सों उर यह दृढ़ करि पकरी¹⁵
हारिल एक ऐसा पक्षी है जो जिस टहनी पर बैठता है उसे मजबूती से पकड़ता है और हमने श्री कृष्ण को मजबूती से पकड़ लिया है। अज्ञेय ने भी हारिल को मन के प्रतीक रूप में वर्णन किया है-
उड़ चल हारिल लिये हाथ में यही अकेला ओछा तिनका
ऊषा जाग उठी प्राची में, कैसी बाट भरोसा किसका !
शक्ति रहे तेरे हाथों में छूट न जाय यह चाह सृजन की;
शक्ति रहे तेरे हाथों में रुक न जाय यह गति जीवन की¹⁶
अज्ञेय के काव्य में प्रयुक्त हुए लोक परिवेश व प्रतीकों के उदाहरण देखिए—
बाजरे के खेतों को फलाँगती डार
हिरनों की बरसात में¹⁷
सूप-सूप भर
धूप-कनक¹⁸
भर ली गयी हैं पुआलें खलिहानों की¹⁹
सन्थाली झूमुर का लम्बा कसक - भरा अलाप²⁰
दोलती कलगी छरहरी बाजरे की²¹
पौधे लता दोलती, फूल, झरे पत्तों, तितली, भुनगे,
फुनगी पर पूँछ उठा कर इतराती छोटी सी चिड़िया²²
झोंपड़ी में ही हमारा देश बसता है
इन्हीं के ढोल मादल बाँसुरी के
उमगते स्वर²³
पुआल के घेरदार घाघरे
झूल गए पेड़ों पर,
घास के गट्ठे लादे आती हैं
वन कन्याएँ²⁴
और भी बहुत सारे उदाहरण हैं जिन्होंने कविता को नए संस्कार और नयी चेतना दी है।
लोक संस्कृति की ओर जो आकर्षण लक्षित होता है, उसके पीछे इस प्रवृत्ति को पहचानना आवश्यक है, क्योंकि इस परिणाम पर लोग दो भिन्न मार्गों से पहुँचे थे जिनमें से केवल दूसरे की चर्चा अधिक होती रही है।²⁵
कविता में नवाचार और प्रयोग की परंपरा भी इधर शिथिल हुई है। यह सोचकर विचित्र लगता है कि जिस तरह का और जितना विविध नवाचार अज्ञेय, मुक्तिबोध या शमशेर ने किया बाद में उस तरह की नवचारिता इधर पिछले दो दशकों में निस्तेज पड़ गई है।²⁶
अज्ञेय एक शब्द-विपुल कवि हैं। आम बोलचाल, बोलियों से लेकर तत्सम शास्त्रीयता तक उनकी भाषा यथावसर पहुँचती है। ऐसे अनेक शब्द या अभिव्यक्तियाँ हैं जो लगभग सदियों बाद अज्ञेय की कविता में पुनरुज्जीवित हुई है।²⁷
सन्दर्भसूचि:
- आजकल स्वर्ण-जयंती अंक, अज्ञेय-ऊर्जा का प्रवाह और खोजने की चुनौती थे रघुवीर सहाय का आलेख, 1994 पृ. 228
- हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास षोडश भाग हिन्दी का लोक साहित्य संपादक महापंडित राहुल सांकृत्यायन, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय नागरी प्रचारिणी सभा, काशी सं.2017 वि. पृ. 13
- तारसप्तक : अज्ञेय भारतीय ज्ञानपीठ नयी दिल्ली आठवाँ संस्करण 2003 पृ. 11
- सम्मेलन पत्रिका लोक संस्कृति विशेषांक हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सं. रामनाथ सुमन, प्रयोगवादी काव्य में लोक गीतों में अभिव्यक्ति : सर्वेश्वर दयाल का आलेख तृतीय संस्करण सन् 1945-पृ. 270 से 271
- आधुनिक काव्य संग्रह सम्पादक रामवीर सिंह विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी संस्करण 2013 ई. पृ. 195
- प्रयोगवादी काव्य : डॉ. पवनकुमार मिश्र मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी भोपाल सन् 1977 पृ. 176
- प्रयोगवादी काव्य : डॉ. पवनकुमार मिश्र मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी भोपाल सन् 1977 पृ. 304-05
- अज्ञेय : इत्यलम
- अज्ञेय काव्य स्तबक सं. विद्यानिवास मिश्र, रामेशचन्द्र शाह, साहित्य अकादेमी नयी दिल्ली सन् 1995 पृ. 141
- अज्ञेय काव्य स्तबक वही पृ. 194
- सम्मेलन पत्रिका लोक संस्कृति विशेषांक हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सं. रामनाथ सुमन, प्रयोगवादी काव्य में लोक गीतों में अभिव्यक्ति : सर्वेश्वर दयाल का आलेख तृतीय संस्करण सन् 1945-पृ. 270 से 275
- हिन्दी साहित्य कोश भाग - 2 सं. धीरेन्द्र वर्मा ज्ञानमंडल लिमिटेड वाराणसी सन् 1986 पृ. 659
- अज्ञेय एक अध्ययन : भोलाभाई पटेल वाणी प्रकाशन नयी दिल्ली द्वितीय संस्करण 2002 पृ. 27
- भारतीय कविता 1954-55, भूमिका जवाहरलाल नेहरू, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली 1961
- सूरदास और भ्रमर गीत सार : डॉ. किशोरीलाल अभिव्यक्ति प्रकाशन इलाहाबाद सन् 1999 पृ. 112
- अज्ञेय काव्य स्तबक सं. विद्यानिवास मिश्र, रामेशचन्द्र शाह, साहित्य अकादेमी नयी दिल्ली सन् 1995 पृ. 118
- वही पृ. 118
- वही पृ. 75
- वही पृ. 122
- वही पृ. 140
- वही पृ. 142
- वही पृ. 139
- वही पृ. 137
- अज्ञेय रचना सागर सं. कृष्णदत्त पालीवाल प्रभात प्रकाशन दिल्ली सन् पृ. 146
- सर्जना और सन्दर्भ - अज्ञेय, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नयी दिल्ली सन् 1985, पृ. 72
- समकालीन हिन्दी आलोचना सं. परमानन्द श्रीवास्तव, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, कविता के देश में - अशोक वाजपेयी का आलेख, पुनर्मुद्रण 2013 पृ. 405
- सन्नाटे का छन्द सं. अशोक वाजपेयी, वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर प्रथम संस्करण 1997, पृ. जितना तुम्हारा सच है।
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