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सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

महामारियों का लोक संस्कृति पर प्रभाव – डॉ. महीपाल सिंह राठौड़

महामारियों ने जन जीवन को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया है। उसके गुजरने के निशान मानव जाति पर पड़े हैं और उसी के बचाव में जन मानस देवी प्रकोप मानकर उनकी पूजा अर्चना, नृत्य, गीत व रीति रिवाजों को सम्पन्न कर देवी को प्रसन्न करने का प्रयास करता है। महामारियों का लोक संस्कृति के प्रभाव पर चर्चा करने से पूर्व हम ‘महामारी’ व ‘लोक संस्कृति’ शब्द की व्याख्या पर चर्चा करें तो समीचीन रहेगा। मानक हिन्दी कोश में महामारी शब्द का अर्थ निम्न प्रकार वणि्र्ात है- 

महामारी-स्त्री. (सं. महत् मृ (मरना) $ णिच् $ अण् $ ङीप्)

  1. ऐसा संक्रामक रोग जिससे बहुत अधिक लोग मरें! मरक। मरी। (एपिडेमिक) जैसे : हैजा, चेचक आदि।
  2. महाकाली का एक नाम-¹

लोक संस्कृति पर विचार प्रकट करते हुए डॉ. श्याम परमार लिखते हैं-

‘भारतीय समाज में नगर एवं ग्राम्य दो भिन्न संस्कृतियों का प्रायः उल्लेख किया जाता है, किन्तु ‘लोक’ दोनों संस्कृतियों में विद्यमान है, वही समाज का गतिशील अंग है’-²

डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के शब्दों में

‘लोक हमारे जीवन का महासमुद्र है; उसमें भूत, भविष्य, वर्तमान सभी कुछ संचित रहता है। लोक, राष्ट्र का अमर स्वरूप है। लोक कृतस्न ज्ञान और सम्पूर्ण अध्ययन में सब शास्त्रों का पर्यवसान है। अर्वाचीन मानव के लिये लोक, सर्वोच्च प्रजापति है। लोक, लोक की धात्री सर्वभूतमाता पृथिवी और लोक का व्यक्त रूप मानव यही हमारे जीवन का अध्यात्म-शास्त्र है! इसका कल्याण हमारी मुक्ति का द्वार और निर्वाण का नवीन रूप है। लोक-पृथिवी-मानव, इसी त्रिलोकी में जीवन का कल्याणतम रूप है।³

अर्थात् सम्पूर्ण पृथ्वी का कल्याणतम रूप लोक की दृष्टि है। यह लोक की विराट कल्पना है जिसमें वह सभी को समाहित कर लेता है! महामारी शब्द का वर्णन हमें दुर्गासप्तशती में मिलता है।

दुर्गासप्तशती के द्वादशोऽध्यायः में देवी-चरित्रों के पाठ का माहात्म्य के वर्णन में ऋषि कहते हैं-

व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्याण्डं मनुजेश्वर।

महाकाल्या महाकाले महामारी स्वरूपया।।38।।

अर्थ - राजन् ! महाप्रलय के समय महामारी का स्वरूप धारण करने वाली वे महाकाली ही इस समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं।

सैव काले महामारी सैव सृष्टि र्भवत्यजा।

स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी।।39।।

अर्थ - वे ही समय-समय पर महामारी होती और वे ही स्वयं अजन्मा होती हुई भी सृष्टि के रूप में प्रकट होती हैं। वे सनातनी देवी ही समयानुसार सम्पूर्ण भूतों की रक्षा करती हैं।⁴

इससे यह स्पष्ट होता है कि महामारी मानव समाज पर एक दैवीय प्रकोप के रूप में भारतीय जनमानस स्वीकार करता है। तुलसी ने भी अपनी कवितावली में प्लेग जैसी भयंकर बीमारी का वर्णन किया है-

सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डॉ. तारापुर वाला ने लिखा है कि

‘मनुष्य की यह प्रवृत्ति होती है कि नीच तथा भंयकर वस्तु को किसी सुंदर नाम से पुकारने का प्रयत्न करता है।⁵ इसी बात की पुष्टि भाषा वैज्ञानिक डॉ. भोलानाथ तिवारी भी करते हैं- ‘संसार में अशोभन बातें, भावनाएँ, कार्य हैं पर यथासाध्य मनुष्य का मस्तिष्क उनसे दूर रहना चाहता है। विडंबना यह है कि चाहकर भी दूर नहीं रह पाता, इसलिए उन भावनाओं को शोभन शब्दों से ढक कर वह संतोष की साँस लेता है। इसका परिणाम यह होता है कि वे शोभन शब्द अपने शोभन अर्थों को छोड़कर अशोभन अर्थ ढोने लगते हैं।⁶

अर्थात् मानव हृदय कोमल है वह भयंकर वस्तुओं के नाम मात्र से भयभीत है इसलिए उन्हें शोभन शब्दों के रूप में प्रयोग लेकर आम जन में उत्साह का संचार कर जिजीविषा का संचार करता है।

हमारे यहाँ ‘चेचक’ व ‘प्लेग’ जैसी महामारियों का प्रकोप पहले रहा है। चेचक में गर्मी अधिक होती है इसलिए उसे ‘शीतला’ कहते हैं। विश्व की दूसरी भाषाओं में भी बीमारी की भयंकरता को देखकर उसे दूसरे नाम से सम्बोधित करने की परम्परा रही है- उदाहरण के लिए ‘कैंसर’ जैसी लाइलाज बीमारी को पुर्तगाली में ‘ओबियो साल्वो सेजा’ (वइपबीव ेंसअव ेमरंत्रजीम सपजजसम इमेंज हवक वितइपक) कहते हैं।⁷

हमने जब ग्लोबल गाँव का सुख भोगा है तो अब कष्ट भी उठाना होगा। गाँव और ढाणी में सात समुद्र पार की महामारी पहुँचने का कारण वैश्वीकरण है। हमें उसके लाभ भी हुए परंतु हमारा निजीपन या मौजीपन हमेशा के लिए व्यवस्था द्वारा छीन लिया गया है।

चेचक हमारे यहाँ महामारी के रूप में रही है उसके चिन्ह कई व्यक्तियों के चेहरे पर अब भी देखे जा सकते हैं। चेचक को ‘शीतला माता’ के रूप में एक लोक देवी स्वरूप में प्रतिष्ठापित कर गाँव व शहर सभी स्थानों पर पूजने की परम्परा है। इसकी पूजा करने से शीतला माता प्रसन्न होती है और बालकों की रक्षा करती है।

शीतला की पूजा होली के पश्चात् सप्तमी को की जाती है। जिसे ठंडा/बास्येड़ा कहा जाता है इस दिन चूल्हे पर बना कर कुछ नहीं खाते। एक दिन पूर्व ही सब मिष्ठान्न तैयार किये जाते हैं। मेवज, चावल, दही, केर सांगरी की सब्जी, पूरियां, पपड़ियाँ, खाजे, शक्करपारे चढ़ाये जाते हैं। प्रातः काल गाँव में निर्धारित स्थान जिसे शीतलामाता का थान कहते हैं वहाँ दही, चावल, हल्दी व अन्य तैयार की गई सामग्री चढायी जाती है।

किसान लोग इस दिन जमाना होने के शकुन लेते है। बाजरा मोठ थान के पास बोये जाते हैं। गीत गाती हुई महिलाएं शीतला माता को ‘धोक’ कर आती हैं। घर आते वक्त मिट्टी का लोंदा बनाकर लाती हैं। जिस पर खेजड़ी की पतली टहनी लगाती हैं और घर में जहां पानी रखने का ‘परिंडा’ होता है वहां उस लौंदे को रखते हैं। यह घर में बिलौने से आने वाले मक्खन का प्रतीक माना जाता है यह जितना बड़ा होता है आशा करते हैं कि उस वर्ष उस आकार के मक्खन का लौंदा बिलौने से वर्ष भर प्राप्त होगा।

महामारी को लोक संस्कृति ने अपने में आत्म सात कर लिया है और जनमानस को भयमुक्त कर दिया है यही लोक संस्कृति की शक्ति है।

प्रस्तुत शोध पत्र में राजस्थान के ‘मारवाड़, मेवाड, हाड़ौती अंचल के उन लोक गीतों को व हिंदी प्रदेशों में भोजपुरी लोक गीतों को भावार्थ सहित प्रस्तुत किया जा रहा है जिनसे आप लोक मानस की भारतीय भावनाओं को समझ सकेंगे।


मारवाड़ के लोक गीत


गीत - गोअर में आई सीतळा

सुणो सुणो न ओ म्हारा कान कंवर रा बाप

गोअर में आई सीतला

अब कई करसी ओ म्हारा चंचल कंवर का बाप

चोवटे में आई सीतला 

थूं क्यूं डरपे अे म्हारी भोळी भाळी नार

गुवाळ्या ने टूटी सीतळा

थूं क्यूं डरपे म्हारी मिरगा नैणी नार

बाळूड़ा ने टूटी सीतळा

अर्थ - गोर (पशु रखने के स्थल) में आयी शीतला/ सुनो सुनो न ओ मेरे कान्ह कंवर के पिता/ गोर में आयी शीतला/ अब क्या करोंगे मेरे चंचल कंवर के पिता/ चौक में आयी शीतला। तुम क्यों डर रही हो मेरी भोली भाली प्रिया/ ग्वालों पर प्रसन्न हुई शीतला/ तुम क्यों डर रही हो मेरी मृग नयना प्रिया। बालक पर प्रसन्न हुई शीतला 

गीत - हमें कांई करसां ओ हालरिया रा बाप

 माताजी चमकिया देस में

 गाड़ी जोतूं ओ हालरिया री माय

 थे थांरै जाऔ बाप र

 गाडी जोती ओ हालरिया रा बाप

 अे गधो पिलाण्यौ देवी सीतळा⁸

अर्थ - अब क्या करेंगे ओ बालक के पिता/ माता जी (चेचक) निकली हैं देश में/ गाड़ी जोत रहा हूँ बालक की माता/ तुम जाओ तुम्हारे पिता के/ गाड़ी जोती ओ बालक के पिता/ गदर्भ पर सवार होकर आयी शीतला


मेवाड़ के लोक गीत


माता रे देवळ चढतां रखड़ी सरकी अे माय,

तेड़ो सोनीड़ा रो बेटो रखड़ी लावे अे माय,

पेरो म्हारी आद भवानी ऊंठाळा री राणी,

सदा मतवाळी बाळूड़ा रखवाळी अे माय।

माता रे देवळ चढतां चुड़लो तड़क्यो अे माय,

तेड़ो खैरादी रो बेटो चुड़लो लावे अे माय,

पेरो म्हारी आद भवानी ऊंठाळा री राणी,

सदा मतवाळी बाळूड़ा रखवाळी अे माय।।⁹

अर्थ - माता के देवालय चढ़ते रखड़ी (आभूषण) सरक गयी अे माँ/ भेजो सोनार के बेटे को रखड़ी लावे ओ/ पहनो हमारी आदि भवानी ऊंठाला (गाँव) की रानी/ सदा मतवाली बालकों की रक्षक अे माँ!/ माता के देवालय जाते चूड़ा (वलय) के तरेड़ हो गयी है/ भेजो खरादी के बेटे को चूड़ा ले लावे ओ’ पहनो हमारी आदि भवानी ऊंठाला (गाँव) की रानी/ सदा मतवाली बालकों की रक्षक अे माँ/

गीत - सीळी सीतळा ये मांय

ठंडी बोदड़ी ये मायं

सरवर झूलता घर आय¹⁰

अर्थ - ठंडी शीतला अे माँ/ ठंडी बोदड़ी (रोग का नाम) ओ माँ/ सरोवर में स्नान कर घर आयी/

गीत - माता देवळ चढाता साळूड़ा घटिया ओ मां

घटिया तो घटवा दिजो और मोलावा ओ मां

आद भवानी ऊठाळा री राणी

बाळूड़ा रखवाळी ओ मां

घटिया तो घटवा दिजो और मोलावा ओ मां

अर्थ - माता के देवालय में चढ़ाते सालू (रेशमी ओढ़नी) घट गयी ओ माँ/ घटी हो तो घटने दीजिए और मोल भाव करेंगे ओ माँ/ आदि भवानी ऊंठाले की रानी, बालकों की रक्षक ओ माँ/ घटे हैं तो घटने दो और खरीद लायेंगे ओ माँ/

गीत - लालजी खोलो खोलो नी कमाड़

थोरे बारणे ऊबा माता सीतळा

अे तो कई जो केवे माता सीतळा

अे तो देवे ओ दोई हालरिया री जोड़

अे तो देवे ओ दोई पुतरियां री जोड़

थोंरे पे कृपा करे छे माता सीतळा

खोलो खोलो नी कमाड़¹¹

अर्थ - लाल खोलो खोलो नी कपाट/ तुम्हारे बाहरी खड़ी माता शीत/ यह तो क्या कह रही माता शीतला/ यह तो दे रही दो पुत्रों की जोड़ी/ यह तो दे रही दो पुत्रियों की जोड़ी/ आप पे कृपा कर रही है माता शीतला/ खोलो-खोलो नी कपाट।

गीत - म्हारी माता को चिणबो चौबारो 

दूध पूत देनी को चिणबो चौबारो

कुण ये माता थारी ईंट थपाई

और कुण नै घाल्यौ है गारो

श्रीकिसन ने मैया ईंट थपाई

दाऊजी घाल्यो है गारो¹²

अर्थ - हमारी माता का चुनना चौबारा/ दूध पूत देने वाली का चुनना चौबारा/ किसने अे माता आपके ईंट थपाई/ और किसने बनाया गारा (चुनाई का मसाला)/ श्री कृष्ण ने मैया ईंट थपवाई, दाऊजी ने बनाया है गारा।


भोजपुरी लोक गीत

गीत  -  

पटुका पसारि भीखि माँगेली बालकवा के माई

हमरा के बालकवा भीखी दो।

मोरी दुलारी हो मइया,

 हमरा के बालकवा भीखी दी।13

भावार्थ - आँचल फैलाकर लड़के की माता यह प्रार्थना करती है कि हे माता ! मेरे बालक को भिक्षा दीजिये। चेचक का रोग बालकों को अधिक होता था इसलिए गीत में बालक की रक्षा के लिए प्रार्थना की गयी है।

आँचरा पसार भीख माँगेला बालाका के बाबा

आरे मइया हमरा के; बालकवा भीख दीं।।

मोर मनवा राखक्षि मइया; 

हमरा के बालकवा भीख दी।¹⁴

भावार्थ - शीतला (चेचक) के प्रकोप से पीड़ित बालक की रक्षा के लिए पिता की देवी से प्रार्थना है।

महामारी के दौरान कई नियमों के पालन की परम्परा रही है जिसमें बालों को न काटना, रोटी का न खाना, दाल में हल्दी न डालना, शाक भाजी को न छोंकना, जूता न पहनना, किसी को प्रणाम न करना, स्त्री-पुरुष संग से दूर रहना।

इन नियमों को हमने अंधविश्वास कह कर हवा में उड़ाया पर आज नई परिभाषा ‘सोशियल डिसटेंस’ के माध्यम से हमारे बीच व्याप्त है। परम्परागत ज्ञान का लाभ हमें लेना चाहिए।

महामारियों ने हमारी लोक संस्कृति को प्रभावित किया है वर्तमान संदर्भ में हम उनसे जानकारी प्राप्त कर अपने आप को स्वस्थ और सुरक्षित रख सकते हैं। यही भारतीय जनमानस की शक्ति है।


संदर्भ ग्रंथ :

  1. मानक हिन्दी कोश सं. रामचन्द्र वर्म्मा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग चौथा खण्ड, सन् 1991 ईसवी, पृ. 321
  2. मालवी लोक साहित्य : एक अध्ययन : डॉ श्याम परमार, हिन्दुस्तान एकेडमी इलाहाबाद, प्र.सं. 1969, पृ. 2 
  3. सम्मेलन पत्रिका : लोक संस्कृति विशेषांक सन् 1995 ई, तृ.सं., पृ. 67
  4. श्री दुर्गासप्तशती अनुवादक पाण्डेय पं. श्रीरामनारायणदत्त जी शास्त्री ‘राम’, गीताप्रेस गोरखपुर सं. 2073, सतावनवाँ, पुनर्मुद्रण, पृ.177
  5. म्समउमदजे वि ज्ीम ैबपमदबम वि स्ंदहनंहम रू प्तंबी श्रमींदहपत ैवतंइरप ज्ंतंचवतम ूंसं ब्ंसबनजजं न्दपअमतेपजल 1978ए ज्ीपतक मकपजपवद
  6. भाषा विज्ञान कोश : डॉ. भोलानाथ तिवारी, ज्ञानमण्डल लि. वाराणसी सन् प्र.सं., माघ संवत् 2020, पृ. 46-47
  7. वही भाषा विज्ञान कोश, पृ. 46-47
  8. अक्षर वार्ता अप्रैल 2018 भाग-1/राजस्थान के लोक पर्व और त्यौहार मेरा आलेख, पृ.12
  9. राजस्थानी लोक गीत भाग-1 सं गंगाप्रसाद कमठान, साहित्य-संस्थान राजस्थान विश्व विद्यापीठ, उदयपुर, पृ. 119-120
  10. राजस्थान के मांड गीत : डॉ. विश्वास मेहता, पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर, जुलाई 2004, पृ. 68
  11. गोरवाल समाज सांस्कृतिक लोकगीत एवं कथाएँ, संकलनकर्ता धर्मपाल शर्मा, राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर, प्र.सं. 2002, पृ.105
  12. नागरचाल लोक साहित्य और संस्कृति : डॉ. रेणु वर्मा, गौतम बुक कम्पनी, जयपुर प्र.सं. 2010, पृ.223
  13. भोजपुरी लोक गीत भाग1 -डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग सन् 1990, पृ. 236
  14. वही, पृ. 237

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