जौहर शब्द राजस्थान के इतिहास और संस्कृति से जुड़ा हुआ है जो इसे विश्व में सिरमौर स्थान प्रदान करता हैं। ‘संसार की सभ्य जातियां अपनी स्वतंत्रता के लिए निरंतर बलिदान करती आई हैं। परस्पर युद्धों का आरंभ इस आंशका के साथ हुआ कि कोई स्वतंत्रता छीनने आ रहा हैं।
राजस्थान की युद्ध परम्परा में जौहर व शाकों का अपना विशिष्ट स्थान है जहाँ पराधीन होने की बजाय मृत्यु का आंलिगन करना उचित समझा। जब अधिक दिन लड़ते हुए शत्रु के घेरे के भीतर रह कर जीवित नहीं रहा जा सकता था तभी जौहर व शाके किये जाते थे। महिलाएँ कुलदेवी देवताओं का पूजन कर, तुलसीदल के साथ गंगाजल का आचमन कर, जलती हुई चिता में प्रवेश करके अपने योद्धाओं को निर्भय करती थी कि नारी समाज की पवित्रता अब अग्नि के ताप से तपित होकर कीर्ति कुन्दन बन गई हैं। पुरुष इससे चिन्ता मुक्त हो जाते थे और वे कसूंबा (अफीम का घोल) पीकर केसरिया, वस्त्र धारण कर साफे में तुलसी दल रख कर गले में शालिग्राम के गुटके बांध कर इस निश्चय के साथ रणक्षेत्र में उतर पड़ते थे कि या तो विजयी होकर लौटेंगे अन्यथा विजय की कामना हृदय में लिए हुए अंतिम क्षण तक लड़ते-लड़ते रणभूमि में ही चिरनिद्रा में शयन करेंगे। राजस्थानी संस्कृति में स्त्रियों का यह कृत्य जौहर कहलाता हैं और पुरूषों का कृत्य शाका के नाम से विख्यात हुआ। ¹
राजपूतों में जौहर की प्रथा थी। जौहर उस समय होता था जब शत्रुओं से घिरे गढ़ के भीतर सैनिक गढ़ रक्षा की आशा न देख शस्त्र लेकर बाहर निकल पड़ते थे और उनके पराजित होने या मारे जाने का समाचार गढ़ के भीतर पहुँचने पर सि़्त्रयाँ शत्रु के हाथ में पड़ने के पहले अग्नि में कूद पड़ती थी। ²
सुल्तान अलाउद्दीन ने 1303 ई. में चित्तौड़ पर आक्रमण किया और आठ माह के विकट संघर्ष के पश्चात् उसे अधिकृत कर लिया। वीर राजपूत योद्धा आक्रांताओं से युद्ध करते हुए खेत रहे और वीर राजपूत स्त्रियाँ जौहर की ज्वालाओं में समाधिस्थ हो गई। 3
जौहर शब्द राजस्थान में किस भाषा से आया है यह अनुसंधान का विषय हैं।
‘हिंदी शब्द सागर’ में जौहर शब्द का अर्थ इस प्रकार किया गया है
जौहर - संज्ञा पु. (फा. गौहर का अरबी रूप) 1. रत्न। बहुमूल्य पत्थर। 2. सार वस्तु। सारांश। तत्व। 3. हथियार की ओप। विशेषता। उत्तमता। खूबी।
संज्ञा पुं. (हि. जीव$हर) 1. ईसा की 13 वीं सदी से 15 वीं सदी तक अफगान बादशाहों में दूसरों की स्त्रियों को छीनने के कारण प्रचलित राजपूतों की एक प्रथा जिसके अनुसार नगर या गढ़ के घिर जाने पर अपनी हार निश्चित देखकर लड़ने योग्य समस्त वीर अपनी माताओं, बहनों, स्त्रियों और पुत्रवधुओं आदि स्त्री वर्ग को दहकती हुई चिता के सपुर्द करके फाटक खोल देते थे और स्वयं शत्रु का संहार करते हुए वीरगति लाभ करते थे। 2. वह चिता जो दुर्ग में स्त्रियों के जलने के लिये बनाई जाती है। 3. आत्महत्या। 4
‘मानक हिन्दी कोश’ में ‘जौहर’ शब्द का अर्थ इस प्रकार मिलता हैं
जौहर- पु. (फा. गौहर का अरबी रूप) 1. कोई बहुमूल्य पत्थर। जैसे- नीलम, पन्ना, हीरा आदि। 2. किसी बात, वस्तु या व्यक्ति में निहित वे तात्त्विक और मौलिक बातें जो उसके गुणों, दोषों, विशेषताओं, त्रुटियों आदि की परिचायक या सूचक होती है। जैसे- आदमी का जौहर विकट परिस्थितियों में, बहादुरों का जौहर लड़ाई के मैदान में अथवा सोने का जौहर उसे तपाने पर खुलते हैं। कि.प्र. -खुलना। 3. उक्त के आधार पर लोहे के धारदार औजारों, हथियारों आदि के संबंध में विशिष्ट प्रकार के वे चिह्न या धारियाँ जो लोहे की उत्तमता की सूचक होती हैं। जैसे- तलवार या कटार का जौहर। 4. उत्तमता। श्रेष्ठता।
पु. (सं. जीव-हर) 1. मध्य-युग में राजपूत स्त्रियों की एक प्रथा जिसमें गढ़ या नगर के शत्रुओं से घिर जाने और अपने पक्ष की हार निश्चित होने पर वे एक साथ इस उद्देश्य से जलती चिता में कूद पड़ती थीं कि विजयी शत्रु हमारा अपमान तथा हम पर अत्याचार न करने पावें।
2. उक्त उद्देश्य से बनाई हुई बहुत बड़ी चिता।
कि. प्र.- सँजोना।-सजाना।
3. आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए की जानेवाली आत्म-हत्या।
पुं. - जौह्ड़।⁵
राजस्थानी- हिन्दी संक्षिप्त शब्दकोश में जौहर शब्द का अर्थ
जौहर- पुं. 1. जवाहिरात, रत्न। 2. अच्छे लोहे की तलवार की धारियां। 3. विशेषता, खूबी, गुण। 4. राजपूत स्त्रियों द्वारा अपनी सेना की हार व आततायियों से अपने धर्म की रक्षार्थ किया जाने वाला सामूहिक आत्म-दहन। 5. इस प्रकार के आत्मदहन हेतु बनाई गई चिता। 6. आततायी शासन के विरूद्ध किया जाने वाला आत्म-दहन।⁶
उर्दू हिन्दी शब्द कोश में जौहर शब्द का अर्थ हैं।⁷
जौहर - अं. पु.- गुण, सिफतय दक्षता, होशियारीय सार, सतय रत्न, मणिय कला, फन, धर्म, खासियत, वे बारिक धारियाँ जो अच्छी तलवार पर होती हैं। 7
कर्नल टॉड चितौड़ के जौहर के बारे में लिखते हैं-
श्ज्ीपे ूं जीम ेबमदम वि जीम ूंनिस श्रवींतए वद जीम वबबेंपवद वि ।सं ैंबापदह ब्ीपजवतए ूमद जीम ुनममदे चमतपेमक पद जीम थ्संउमेय वदूपबी जीम बंअमतदष्े उवनजी ूं बसवेमक 8
श्रवींतए श्रवनींतए हमदमतंस ेनपबपकम वि ूवउमद 9
दुर्ग में उपस्थित स्त्रियों का सामूहिक अग्नि समर्पण जौहर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। संभवतः यह धर्मपाल शर्मा के अनुसार शब्द अरबी/फारसी या हिब्रू भाषा से आया हैं। जिसका अर्थ होता है ‘बेमिसाल करिश्मा’
स्वतः स्फूर्त आत्म बलिदान की भावना से प्रेरित वीरांगनाओं के लिये इसकी कल्पना करना भी व्यर्थ है
किसी भी प्रारंभिक मुस्लिम इतिहासकार ने ‘जौहर’ शब्द का प्रयोग नहीं किया, जबकि इन घटनाओं का विस्तृत वर्णन दिया हैं। इससे स्पष्ट है कि इस शब्द की उत्पत्ति और प्रयोग के बारे में शब्द कोश सहायक नहीं हो सकते। इस ऐतिहासिक एवं गरिमामय शब्द ने अपना जौहर दिखा कर शब्दकोशों को अलंकृत किया है।
संक्षेप में जौहर शब्द में शौर्य, त्याग, बलिदान नारी जीवन की अस्मिता, निष्कलंकता और प्राणोत्सर्ग की उदात्त भावना का समावेश रहा है। जिस प्रकार जौहरी रत्नों की निष्कलुषिता की परख करता हैं। उसी प्रकार जौहर ने समाज एवं संस्कृति को पतित होने से रोकने में अपना जीवन समर्पित किया हैं।
विविध मान्यताओं के अनुसार संसार का सर्व प्रथम जौहर ईसा से 500 वर्ष पूर्व वीडिया देश के राजा क्रोस के समय में हुआ था, जब क्रोस के ऊपर फारस के राजा कुरुष ने हमला किया।
भारत में सबसे प्राचीन व प्रथम जौहर 327ई.पू. में सिकन्दर के आक्रमण के समय पंजाब के अगल्लसोई गणराज्य में हुआ। संसार का सबसे अंतिम जौहर इंडोनेशिया के बाली द्वीप में डचों के आक्रमण से वहाँ के राजा देवगांग के मारे जाने पर संवत् 1908 में हुआ।
उपरोक्त घटनाओं में स्त्रियों ने सामूहिक प्राणोत्सर्ग तो किया परन्तु उनको जौहर शब्द से जोड़ना कठिन है। भारत में मुस्लिम आक्रमणों के साथ इस स्थिति में व्यापक परिवर्तन आया।
मोहम्मद बिन कासिम का सिंध पर आक्रमण 712 ई. में हुआ, राजा दाहर वीरतापूर्वक लड़ता हुआ मारा गया। दाहर की पत्नी ‘बाई’ ने रावर दुर्ग में जौहर किया। इसी राजा की दूसरी पत्नी ‘लाडी’ ने ब्राह्मणाबाद दुर्ग में दूसरा प्रयास किया जो शत्रु के आ जाने के कारण सफल नहीं हो सका। इसे भारतीय इतिहास के प्रथम जौहर की संज्ञा दी जाती है। इसी शृंखला में राजस्थान का सर्वप्रथम जौहर 725 ई. में गोगामेडी के ठाकुर की गढ़ी में संपन्न हुआ। महमूद गजनवी के आक्रमण के समय 1004 ई. में भटनेर के शासक विजयराव भाटी के परिवार की स्त्रियों ने आत्मोत्सर्ग किया। 1160 ई. में बाचोरा के तंवरों ने और 1232 ई. में ग्वालियर में जौहर होने के उल्लेख मिलते हैं।
भारतीय इतिहास में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल को जौहर युग कहा जा सकता है। इस सुल्तान की साम्राज्यवादी विस्तार की भावना, अर्थ संग्रह की लिप्सा सुंदर स्त्रियों को प्राप्त करने की लालसा ने समस्त भारत को उद्वेलित किया, परन्तु राजस्थान को इसकी सर्वाधिक कीमत चुकानी पड़ी।
रणथंभौर 1301 ई.
सिवाना 1301 ई.
चितौड़ का पहला शाका 1303 ई.
जालोर 1311 ई.
जैसलमेर तिथि प्रमाणित नहीं
इसके बाद दिल्ली के सुल्तानों, मुगल बादशाहों एवं प्रान्तीय शासकों से जौहर किये जाते रहे। जिनमें प्रमुख इस प्रकार हैं।
स्थान वर्ष आक्रान्ता
कम्पिल मोहम्मद तुगलक का काल (विदेशी यात्री
इब्नबतूता ने वर्णन दिया है)
जैसलमेर 1368 फिरोज तुगलक
भटनेर 1398 तैमूरलंग
गागरोन (झालावाड़) 1423 गुजरात का सुल्तान
गागरोन (झालावाड़) 1444 मालवा का सुल्तान
चाँपानेर (गुजरात) 1484 गुजरात का सुल्तान
चितौड़ का दूसरा शाका 1535 गुजरात का सुल्तान
जैसलमेर 1550 कांधार का नवाब
अलीखान का धोखा
चितौड़ का तीसरा शाका 1568 मुगल सम्राट अकबर
चौरागढ़ (जबलपुर) रानी दुर्गावती मुगल सेनापति आसफ खाँ का आक्रमण
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भी रोडियागढ़ और जगदीशपुर की स्त्रियों ने अंग्रेजो के आक्रमण के समय जौहर किया।¹⁰
जायसी ने भी जौहर और शाके का वर्णन पद्मावत में किया है
सँचि संग्राम बाँधि सत साका। तजि कै जिवन मरन सब ताका। ¹¹
अर्थात-ः युद्ध की तैयारी करके, साका करने के लिए सत बाँधकर (दृढ़ निश्चय करके) और जीवन की आशा छोड़कर सबने मरण का ही विचार कर लिया था।
पद्मावत में ‘राजा बादशाह युद्ध खण्ड’ में ‘जौहर’ शब्द का वर्णन मिलता हैं
हठि चूरौं तौ जौहर होई।
पदुमिनि पाव हिएँ मति सोईं। ¹²
अर्थात् -ः उसके मन में यही विचार बना रहा था कि पद्मिनी प्राप्त करनी चाहिए, पर यदि हठ से गढ़ तोडूँगा तो जौहर हो जायेगा।¹³
इसी प्रकार राजा बादशाह-मेल खण्ड में जौहर का उल्लेख किया है-
अब हौं जौंहर साजि कै कीन्ह चहौं उजियार।
फागु गएँ होरी बुझें कोउ समेंटहु छार।। 14
अर्थात्-ः अब मैं जौहर रच कर उजाला करना चाहता हूँ। फाग बीतने पर जब होली बुझ जायेगी तो जो कोई चाहे राख बटोर ले।
पद्मावत के ‘पद्मावती नागमती सती खण्ड’ में ‘जौहर’ का वर्णन मिलता है
जौहर भई इस्तिरी पुरूख भए संग्राम।¹⁵
अर्थात्-ः स्त्रियों ने जौहर कर लिया पुरुष संग्राम करते हुए अन्त के प्राप्त हुए।
पद्मावत में ‘उपसंहार खण्ड’ में जायसी कहते हैं-
धनि सो पुरूख जस कीरति जासू
फूल मरै पै मरै न बासू 16
अर्थात्-ः धन्य है वह पुरुष जिसके यश की कीर्ति है फूल मर जाता है, पर उसकी गंध नहीं मरती।
चित्तौड़ के जौहर की साक्षी भक्त कवयित्री मीरां बाई ने भी अपने पदों में ‘जौहर शब्द का वर्णन किया है जौहर की गत ‘जौहरी जाने, के जिन जौहर होय।।¹⁷
अकबर द्वारा चित्तौड़ पर किये गये आक्रमण के दौरान चित्तौड़ के किले में किये गये जौहर का वर्णन ‘जयमल वंश प्रकाश’ में इस प्रकार मिलता हैं-
‘‘दूसरे ही दिन अन्तिम युद्ध करने का निश्चयकर अपनी अपनी स्त्रियों और बालबच्चों को जौहर करने की आज्ञा दे दी। किले में रावत पत्ता सिसोदिया, रावत साहिबखां चौहान और राठौड़ ईसरदास इन तीनों की हवेलियों में जौहर किया। शतशः राजपूत रमणियों और कुमारियों ने प्रज्वलित अग्नि में अपने वंश और धर्म के गौरव की रक्षार्थ अपने जीवन का बलिदान कर दिया। किले में अचानक धधकती हुई जौहर की अग्नि को देखकर बादशाह को बड़ा आश्चर्य हुआ और शाही कर्मचारी तरह तरह के विचार प्रकट करने लगे। आंबेर के राजा भगवन्तदास ने कहा कि यह जौहर की अग्नि है, राजपूत जब मरने का निश्चय कर लेते हैं तब अपनी स्त्रियों और बच्चों को जौहर की अग्नि में जलाकर शत्रुओं पर टूट पड़ते हैं।’’¹⁸
राजस्थान के ऐतिहासिक कहानीकार कुंवर आयुवान सिंह ने अपनी कहानी ‘‘ममता और कर्त्तव्य’’ में प्रसिद्ध वीर गोरा और उसकी पत्नी पंवार जी के संवाद में जौहर करती नारी के उदात्त चरित का वर्णन इस प्रकार किया हैं-
‘‘गोरा ने सोचा- ‘‘ ये अबला कहलाने वाली नारियाँ पुरुषों से कितनी अधिक साहसी, धैर्यवान और ज्ञानी होती हैं।’’ इस समय के साहस और वीरत्व के समक्ष युद्ध-भूमि में प्रदर्शित साहस और वीरत्व उसे अत्यन्त ही फीके जान पड़े। उसने पहली बार अनुभव किया कि नारी पुरुषों से कहीं अधिक श्रेष्ठ होती हैं। अब उसके साहस, धैर्य ओैर वीरता का गर्व गल चुका था।’’ ¹⁹
तुलसी ने रामचरितमानस में भी लंका में राम के विरह में सीता द्वारा काठ की चिता सजाकर आग लगा कर प्राण त्यागने का वर्णन किया है-
‘आनि काठ रचु चिता बनाई
मातु अनल पुनि देहि लगाई।²⁰
राजस्थानी कवि डॉ. गोविन्द सिंह राठौड़ ने अपनी कविता ‘चित्त हरणू चित्तौड़’ में जौहर का वर्णन इस प्रकार किया हैं-
जौहर कुंड दीसै घणी
हंसती-खिलती पदमणियां
पोयण फूल सरोवरां
उण
त्रण, त्रण जोहर-साकां री
लपलपाती लपटां रौ
कसुमली उजास
ओ जग
किण लपटां रै तेज, उजास
आखै हिंदवाण
तिरिया तेल
चढतौ
मान उजळतौ रियौ²¹
जौहर को वही पहचान सकता है जिन्होंने जौहर किया है। जिन्होंने अपनी संस्कृति को, उदात्त जीवन मूल्यों के लिए, राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए और नारी स्वातं़़त्र्या के लिए जीवन का सर्वस्व समर्पण कर दिया उनके बलिदान को कम कर कैसे आंका जा सकता हैं। कुछ व्याख्याकारों ने इस शब्द का अर्थ सामूहिक आत्म हत्या कर दिया है जो आपत्ति जनक हैं। ऐसे शब्दों का अर्थ जो हमारी संस्कृति की पहचान है उनका शब्दार्थ तो विवके के साथ करना चाहिए।
जौहर को सामूहिक आत्म हत्या या ष्ैनपबपकमष् बताना उचित नहीं हैं। यह आत्मोत्सर्ग हैं। कर्नल टॉड, हिंदी शब्द सागर, मानक हिन्दी कोश और राजस्थानी शब्द कोश में इस शब्द का अर्थ ठीक करना चाहिए।
सन्दर्भः-
- चित्तौड़ के जौहर व शाके : सवाई सिंह धमोरा राजस्थानी ग्रन्थागार जोधपुर प्रथम संस्करण 2008 पृ. 11
- जायसी ग्रंथावली संपादक रामचंद्र शुक्ल नागरीप्रचारिणी सभा वाराणसी 18वां संस्करण सं. 2052 वि. पृ. 93
- खलजी वंश का इतिहास : के. एस. लाल द्वितीय संस्करण विश्व प्रकाशन नई दिल्ली सन् 1993 पृ. 87
- संक्षिप्त हिन्दी शब्दसागर : रामचंद्र वर्मा द्वारा मूल संपादित कोश संस्थान (कोश विभाग) नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी दशम संस्करण सं. 2051 वि. पृ. 367
- मानक हिन्दी कोश सं. रामचन्द्र वर्म्मा दूसरा खण्ड हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग प्रकाशन वर्ष 1992 ई. पृ. 391
- राजस्थानी- हिन्दी संक्षिप्त शब्दकोश सं. पद्मश्री सीताराम लालस प्रथम खण्ड - राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान जोधपुर सन् 1986 पृ. 489
- उर्दू हिंदी शब्दकोश संकलनकर्ता : मुहम्मद मुस्तफा खाँ ‘मद्दाह’ उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ गयारहवां संस्करण 2006 पृ. 261
- ।ददंसे ंदक ।दजपुनपजपमे वि त्ंरेंजींद ष्श्रंउमे ज्वकष् ॅपससपंउ बतववाम अवस प्प्प् डवजपसंस ठंदंतेपकें क्मसीप त्मचतपदज 1987 चंहम दवण् 1821
- ।ददंसे ंदक ।दजपुनपजपमे वि त्ंरेंजींद ष्श्रंउमे ज्वकष् ॅपससपंउ बतववाम अवस प्प्प् डवजपसंस ठंदंतेपकें क्मसीप त्मचतपदज 1987 चंहम 1848
- मेवाड़ संस्कृति एवं परम्परा : धर्मपाल शर्मा प्रताप शोध प्रतिष्ठान उदयपुर सन् 1999 पृ. 195-97
- पद्मावत : मलिक मुहम्मद जायसी व्याख्याकार वासुदेवशरण अग्रवाल साहित्य ‘सदन तलैया झांसी संस्करण 2002 पद सं. 503 पृ. 532
- वही पृ. 570
- वही पृ. 571
- वही पृ. 573-574
- वही पृ. 712-713
- वही पृ. 713-714
- मीरां बृहत्पदावली भाग- 1 सं. हरिनारायण पुरोहित राजस्थान प्राच्य विद्याप्रतिष्ठान, जोधपुर संस्करण सन् 2006 पृ. 326
- जयमल वंश प्रकाश बदनोर (मेवाड़) एवं मेड़तिया राठौड़ों का इतिहास ठा. गोपाल सिंह राठौड़ प्रथम खण्ड दूसरा संस्करण सन् 2013 राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर पृ. 155-156
- ममता और कर्त्तव्य कुंवर आयुवान सिंह (कहानी संग्रह) तृतीय संस्करण सं. 2047 आयुवान सिंह स्मृति संस्थान जयपुर पृ. 41
- श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदास विरचित श्री रामचरित मानस टीकाकार - हनुमान प्रसाद पोद्दार सं. 2058 तिरसठवाँ संस्करण गीता प्रेस गोरखपुर पृ. 625
- चित्त हरणूं चित्तौड़ : डॉ. गोविन्द सिंह राठौड़ ‘राजस्थानी काव्य संग्रह’ संपादक डॉ. जगमोहन सिंह परिहार पाठ्यक्रम पुस्तक माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान, अजमेर सन् 2006 पृ. 71-72
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