विवाहिता देवी-देवता से कामना करती है कि उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हो तो उसका सम्मान घर परिवार में बढ़े। यह इच्छा भारत वर्ष के कमोबेश सभी वर्गां, धर्मों और जातियों में पायी जाती है। कालबेलिया लोक गीत में एक महिला भैंरू से प्रार्थना कर रही है कि- ‘अेक बाळूड़ा रे कारणे म्हारी नणदल मो‘सा देय’ एक पुत्र नहीं होने से ननद मुझें (कटु वचन) कहती है। आप मेरी कंचुकी दूध से भिगवा दो हे भैंरू!
बड़ली रा भैंरू म्हानै पालणियों बंधाव जौ अे
भैंरू बाबा पालणियै री राखो थे तो लाज
म्हारी दूधां नहीं भीजी कांचळी¹
पुत्र परिवार का मुखिया बनता है और पुत्री ‘अकूरड़ी रो धन’ यानि वह अनायास उत्पन्न हुई वस्तु है या कचरे के ढेर पर उगने वाले पौधों की तरह है जो न चाहते हुए भी बड़े होते जाते हैं। लेकिन पुत्री अपने बचपन से लेकर सयानी होने तक घर परिवार के लिए जी तोड़ मेहनत करती है खेती किसानी का काम हो या घर गृहस्थी का वह अव्वल रहती है।
माँ के बेटा है, बहू है, पति है परंतु मन की बात केवल और केवल बेटी को ही कही जा सकती है इसीलिए वह माँ के काळजिया री कोर (कलेजे का टुकडा) है। जिसको अभावों में भी लाड़ प्यार से बड़ा किया जाता है। वह घर के अभावों में भी पलती है और सयानी होकर परायी हो जाती है।
एका-एक पराया भी तो नहीं होया जाता। जब तक ब्याह नहीं होता माता-पिता चिंतित है विदा करना है लेकिन जब विदाई की वेला आ जाती है तो कलेजा मुँह तक आ जाता हैं। घर परिवार सभी सूने-सूने। दूसरी ओर उस बिटिया के लिए सब कुछ नया है परिवार, घर, पति, सास, ससुर, देवर, जेठ, ननद उनका व्यवहार परंतु वह इन सबके बीच सेतु बंधन का कार्य करती है एक परिवार के संस्कार दूसरे में ले जाकर उन्हें भी समृद्ध करती हैं।
राजा की बेटी हो या सामान्य व्यक्ति की विदाई पर हृदय पिघल जाता हैं। बड़े से बड़े ऋषि और राजा भी अश्रु धारा बहाने लगते हैं तो सामान्य जन का तो कहना ही क्या! प्रस्तुत आलेख में भारत वर्ष के आर्ष ग्रंथों से लेकर लोक में फैली परम्परा, विभिन्न प्रदेशों और उनकी भाषाओं में कन्या विदाई के गीतों में नारी मन की अभिव्यक्ति कैसी है ! उसका विवेचन प्रस्तुत किया जायेगा। ये लोक गीत बड़े ही मर्मस्पर्शी हैं जहाँ कविता के स्वर भी पीछे रह जाते हैं।
यहाँ हम पुत्री, धीय, दुहिता, बेटी, कन्या व धीलटि शब्दों के शाब्दिक अर्थ क्या है उनका अर्थ जानेंगे।
पुत्री- स्त्री. ( सं. पुत्र $ ङीष्) बेटी । लड़की2
धीय - स्त्री. ( सं. दुहिता) पुत्री । बेटी
धीयड़ी - स्त्री धी (बेटी) उदा. - थारी धीयड़ी ने परदेस दीजौ राज. लोकगीत।
धीया - स्त्री - (सं. दुहिता, प्रा. धीदा, धीया) पुत्री। बेटी3
दुहिता (त्) - स्त्री (सं. दुह $ तृच) बेटी। लड़की।
विशेष - प्राचीन काल में गौएँ आदि दुहने का काम प्रायः लड़कियाँ ही करती थी, इसी से उनका यह नाम पड़ा था4
बेटी - स्त्री (सं.) 1. लड़का । पुत्री5
कन्या-स्त्री. (सं. कन्य $ टाप ) 1. अविवाहिता लड़की। क्वाँरी लड़की 2. पुत्री। बेटी6
धीलटि; -टी (स्त्री.) (धी $ लट् $ इन्, धीलटि $ ङीष्) पुत्री, बेटी।7
संस्कृत परम्परा में शकुन्तला की विदाई पर ऋषि कण्व व शकुन्तला का मार्मिक वर्णन मिलता हैं।
यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया
कण्ठः स्तम्भितबाष्पवृत्तिकलुषिÜचन्ताजडं दर्शनम्।
वैकलव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः
पीड्यन्ते गृहिणः कथं न तनयाव्रिशलेष दुःखैर्नवैः।5।
कण्व-आज शकुन्तला चली जायेगी, इस कारण (मेरा) हृदय उत्कण्ठा से अभिभूत हो रहा है, अश्रुओं के प्रवाह को अन्दर-अन्दर रोक सकने के कारण कण्ठ अवरुद्ध हो गया है तथा चिन्ता के कारण दृष्टि जड़ हो गई है। जब मुझ (जैसे) वनवासी को स्नेह के कारण ऐसी इस विकलता का अनुभव हो रहा है, (तब) प्रथम बार पुत्री के बिछोह से समुत्पन्न दुःखों से गृहस्थजन कैसे न पीड़ित होते होंगे।⁸
तुलसी ने रामचरितमानस् में जानकी की विदाई का वर्णन क्या किया है राजा जनक भी अश्रुधार बहा रहे हैं-
जानकी जी ने जिन तोता और मैना को पाल-पोसकर बड़ा किया था और सोने के पिंजड़ों में रखकर पढ़ाया था, वे व्याकुल होकर कह रहे हैं- वैदेही कहाँ हैं! उनके ऐसे वचनों को सुनकर धीरज किसको नहीं त्याग देगा। (अर्थात् सबका धैर्य जाता रहा)
सुक सारिका जानकी ज्याए।
कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए।
ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही।
सुनि धीरजु परिहरइ न केही।।
जब पक्षी और पशु तक इस तरह विकल हो गए, तब मनुष्यों की दशा कैसे कही जा सकती है! तब भाई सहित जनक जी वहाँ आये। प्रेम से उमड़कर उनके नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का ) जल भर आया।⁹
भए बिकल खग मृग एहि भाँती।
मनुज दसा कैसें कहि जाती।
बंधु समेत जनकु तब आए।
प्रेम उमगि लोचन जल छाए।।
चित्रकूट में जनक कहते हैं बेटी! तूने दोनों कुल पवित्र कर दिये। तेरे निर्मल यश से सारा जगत् उज्ज्वल हो रहा है; ऐसा सब कोई कहते हैं।
पुत्री पवित्र किए कुल दोऊ!
सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ।।¹⁰
भोजपुरी लोकगीत में करुण रस सर्वाधिक हैं। इस प्रदेश के गीतों की भाव भूमि उच्च और हृदय तल की गहराइयों से निःसृत हैं उदाहरण देखिए -
अरे ! कहाँ से इतना सोना आया। कहाँ से इतना रूपा आया ? अरे! कहाँ से यह जग मोहने वाला लाल पलंग आया है। काशी से सोना आया है। गया से रूपा आया है। और स्वामी के साथ यह लाल पलंग आया है। जो संसार के मन को अपनी सुन्दरता से मोह लेता हैं।
अंदर माताजी रो-रो कर अंचल से आँसू पांछ रही हैं और कहती हैं कि अरे! मेरी कन्या परदेश चली। मेरी कोख सूनी हो गई। उधर बैठक में पिताजी रो-रो कर दुपट्टे से आँसू पोंछ रहे हैं और कह रहे हैं कि हा, मेरी बेटी परदेश चली। मेरा घर सूना हो गया।
‘‘कहवाँ से सोना अइले कहवाँ से रूपा अइले हो।
एहो कहवाँ से लाली पलँगिया पलँगिया जगमोहनि हो।।
कासी से सोना अइले गयाजी से रूपा अइले हो।
ऐ हो सैयाँ संग लाली पलँगिया पलँगिया जगमोहनि हो।।
भीतराँ से रोवेली मयरिया अचरवन आँसू पोछेली हो।
ए हो मोरी बिटिया चलेली बिदेस कोखिया मोरि सूनि भइले रे
दुअरहिं रोवलें बाबा पटुकवन लोरि पोंछेले हो।
मोरी धिया चलली बिदेस भवन मोरा सून भइले हो।11
पालकी पर चढ़कर कन्या ससुराल जा रही हैं। इस पर उसका सगा भाई उसे पालकी से उतर जाने का कहता है वह उसे अपने घर रखने की बात कहता है परंतु बहिन बोल उठती है कि ऐ मेरे भाई मेरी डाँडी छोड़ दे, मुझे जाने दे। जानते हो मेरा बोझा कितना है। तुम सात लौंड़ियो का भार मजे मे सह सकते हो उन्हें तुम खिला पिला सकते हो परंतु मेरा भार तुम सह नहीं सकते।
‘‘छोड़ छोड़ भइआ डँड़ियावा घरे जाये रे देउ।
सातो लउड़ियाँ के भारावा, ए गो हमारी नाहीं।।¹²
माँ ने मुझे घी के गागर की तरह संजोकर पाला पोसा है पर पिता ने मुझे घर से बाहर कर दिया है। जल से निकाली गई मछली की तरह पिता का हृदय वियोग से फटा जा रहा है और माँ की आंखों से सावन भादो की झड़ी झर रही हैं-
अमा जे धीया परि पाले ली,
जइसे घीव गगरी ए
बाबा ले धीया काढि दिहलेइ,
जइसे जल माछरि ए
बाबा के बिहरले छतिया बिहरे
जइसे कांकरि ए
अमां के नयना नीर ढलकेला
जइसे सावन झरे ए¹³
जानकी तो स्वयं मिथिला प्रदेश की थी उस प्रदेश के लोक गीतों में विदाई के गीत में करुण रस की धार बहती हैं। मिथिला में ‘समदाउनि’ गीत कन्या की विदाई के अवसर पर गाया जाता है-
हम और भैय्या एक ही कोख से जन्मे हैं
भय्या को दूध पीने को मिलता है
उनका राज पाट यहीं रहना है
और हमारे किस्मत में लिखा हैं परदेश¹⁴
हम भइया मिलि एक कोख जनमल
पिअलि सोरहिया क दूध हे।
भइया के लिखइन एहो चउपरिया,
हमरो लिखल परदेस हे
बाबुल का घर छोड़ प्रिय के घर जाती हुई बेटी डोली ढोने वाले कहार से निवेदन करती है हे कहार भइया। डोली को रोको। पिता के खुदवाये पोखर का जल जाते-जाते पी लूं। ऐसे भावों का वर्णन ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम’ में मिलता हैं-
रोकू रोकू आहे रोकू अगिला कहरिया भइया
बाबा के पोखरिया पानी पियव .....
नैहर के बाग-बगीचे छूटते जा रहे हैं। शस्य श्यामला खेत छूटते जा रहे हैं। जल भरे कूप तड़ाग छूटते जा रहे हैं। बाँस की कोंपल के समान छोटा भाई, कमल फूल सदृश पिता और पुरइन (कमल पत्र) के समान माँ को त्याग दिया है।¹⁵
‘‘मगही लोक गीत में विदा होती कन्या कह रही है कि मेरा जनकपुर देश छूट रहा है भइया व भौजाई का संग छूटा जा रहा है-
‘‘छूटल आटन, छूटल पाटन,
छूटल जनकपुर देस
छूटल भइया के लाखो दुखरिया
छूटल भउजी के संग¹⁶
अंगिका विवाह गीतों में सीता की विदाई के अवसर को संजोकर गीत गाया जाता हैं- मैं ने बड़े ही यत्न से सीता को पाला-पोसा, अब उसे ही रघुवंशी राम लिए जा रहे हैं। भाई को पीछे पीछे आते देख बहन सीता बोल उठती है हे भाई, तुम घर को लौट जाओ, क्योंकि मेरे बिछोह में माँ बहुत ही रो रही होगी। कहीं वह रोते-रोते पत्थर की न हो जाए-¹⁷
बड़ी रे जतन सें हम सीया जी के पोसलौं
सेहो रघुवंशी नेनें जाय
घुरू घुरू भैया धूरी घर जाअहो
हकन करती होइथि माय
अम्मा कानते कानते पत्थल भै जैती
हमहुँ बैठव हिया हारी
बज्जिका लोक गीतों में- लड़की की शादी के बाद विदाई के समय जो गीत गाये जाते हैं उसे ‘समदओन’ कहते हैं। महिलाएँ इस गीत को गाते रोने लग जाती हैं-
केकरा ही संग सिआ, जाके धीआ बइठल
के पोछथिन हुनकर लोर
केकरा के जाने जनक रिसी पुकारथीन
केकरा देखी धरथीन धीर¹⁸
किसके साथ में जाकर सीता बैठेगी कौन उसके आँसू पोंछेगे। किसको जनक ऋषि जाकर पुकारेंगे। यह सोच कर सीता के माता - पिता व्याकुल हो जाते हैं।
आँगन में तुलसी का पौधा रोपा तब घर मैं पुत्री का जन्म हुआ था। इधर तुलसी का बिरवा भी बढ़कर बड़ा हो गया और उधर बिटिया भी सयानी हो गयी। बेटी विदा हो रही है माँ रो रही है कि अब इस तुलसी को पानी कौन देगा-
‘‘तुलसी जे रोपल बेटी जे जनमल
बिरवा से भेल छतनार गे माई
तुलसी के बिरवा में रोज जल देबे
बेटी चलल ससुरार गे माई19
राजा राम की जन्म भूमि है अयोध्या, जायसी के प्दमावत व तुलसी के रामचरित मानस की भाषा है अवधी; इस भाषा की मिठास इन गीतों में हैं-
बाबा नीम के पेड़ को मत कटवाना इस नीम के पेड़ पर चिड़िया का बसेरा है जो मैं अपने भय्या की बलाइयाँ लेती हूँ। बाबा बिटिया को जो कोई दुःख देता है। बिटिया चिड़िया की तरह है। सभी चिड़ियायें एक दिन उड़ जानी हैं।
बाबा, निबिया के पेड़ जिनि काटेउ,
निबिया चिरैया बसेर
बलैया लेऊँ बीरन
बाबा बिटियउ जिनि कोउ दुख देय,
बिटिया चिरैया की नाइ
सब रे चिरैया उड़ि जइहे²⁰
पुत्री के बिना आँगन सूना है कोयल के बिना बाग, पुत्र के बिना घर का द्वार सूना है और हंस के बिना पोखर सूना हैं।
धिया बिनु सून अँगनवा ए बेटी
कोइलरि बिनु लखँराव हो।
पूत बिनु सून दुअरवा ए बेटी।
हंस बिनु पोखरा हमार²¹
बघेलखण्ड में पुत्री के अवसर पर अवध रंग चूनर ‘दाई’ को देने का वर्णन मिलता हैं-
पति कहता है कि यदि पुत्र होगा तो सोना चाँदी लुटाऊँगा और यदि पुत्री होगी तो अवध रंग चूनर दूँगा।
जो हमरे व्हइहैं होरलवा
तौ सोनवा लुटइबै रूपवा लुटइबै हो
जो हमरे व्हइहै धोरिया, अवध रंग चूनरि हो²²
बघेली लोक गीत में बिटिया को चने की दाल की तरह पाल कर बड़ी करने का वर्णन मिलता है-
इस तोते (पुत्री) को ऐसा पाला जैसे चने की दाल और यही सुग्गा मेरा कहना नहीं मान रहा उड़ कर जंगल मैं जा रहा हैं।
ईं सुवनन का अइसन पालेन,
जइसे चना कइ दार।
पै ईं सुवनन मेरे कान न मानइ,
उड़ि जंगल का जायँ।।23
छतीसगढ़ी लोक गीत में
अली गली में सभी रो रहे हैं मेरे दादा मूसलधार बारिश की तरह रो रहे हैं। मेरी बहिन बिचारी रो रही है और भइया भी रो रहे हैं। दुनिया की यही रीत हैं जो पुरखों ने चला दी हैं।²⁴
दाई के रेहेवँ मैं तो राजदुलारी,
दाई रोवय तोर महल ओ।
अलिन गलिन दाई रोवयथय,
मोर ददा रोवय मूसरधार ओ।
बहिन बिचारी रोवजय,
मोर भइया ह दंड पुकार ओ।
तुम धन रहव अपना महल में ओ,
दुख ला देहु सब भुलाए ओ।
दुनिया के एकइ रीत ये ओ,
पुरखा दिए है चलायँ ओ।
कनउजी लोक गीत में कन्या को अपने पीहर छूटने की पीड़ा है-
आम नीम के तले बेटी रुक कर जरा जलपान कर लो अभी ससुराल दूर हैं। बेटी डोली में बैठकर चली एक वन, दूसरे वन तीसरा में पार करते-करते दूर चली गयी तब उसने डोली का परदा उठाकर देखा कि मेरा पीहर छूटा जा रहा हैं-
आम नीम तरे ठाढ़ी बेटी,
माया कलेवा लए ठाढ़ि है रे।
खाय न लेवे मोरी बेटी परदेसिन,
तुम्हरे कलेवा बड़ो दूरि रे।
सोउत बेटी की डुलिया फँदा मैं,
सोउत करैं असवार है रे।
इक बन नागी दुसर वन नागी,
तिसरे मैं पहुँची जाय है रे
परदा खोलि जब बेटी जू देखो,
छूटो नइहर वो देस है रे।²⁵
ब्रज भाषा का अपना सौन्दर्य है ब्रज लोक गीतों में कन्या अपने पिता से कह रही है कि हम सोन चिड़ियाँ हैं सवेरा होते ही उड़ जायेंगी -
घर के किनारे पर खेलती गुड़ियों को छोड़ा
खेलती हुई अपनी सहेलियों को छोड़ा
अपने ससुर के संग चली
हे पिता अब अपना घर सम्हालो
औरे रे कौरे गुड़िया ओ छोड़ी,
रोमत छोड़ी सहेल री
अपने बबुल को देस छोड्यौ
अपने ससुर के सँग चली
लेउ बबुल घर आपनो।²⁶
मेरा घर खाली हो गया। जंवाई आया वह बिटिया को ले गया। अब तो मैं बेटे को जन्म दूंगी बहू को घर लेकर आऊँगी।
मेरौ पटेऊ खाली घरैऊ खाली
आयौ जमइया धीयै लै गयौ।
अब तौ जनमूँगी पूत, बऊ ऐ लै घर आइऐ।²⁷
पिता सुनो हम तो सोन चिड़िया हैं भोर होते ही उड़ जायेंगी भैय्या ने जो अटरिया बनाई वह हमारे किस काम की हमें तो परदेश जाना हैं।
हम तौरे बाबुल सौन चिरइया,
भोर होत उड़ जायरे सुन बाबुल मोरे काहे को
वीरन को काजे बाबुल छाई अटरिया,
हमकूँ तौ छायौ परदेश रे
सुन बाबुल मोरे। काहे को .......28
बुंदेली लोक गीत में कन्या की माँ समधी से विनती करती है कि- बड़े लाड़ प्यार से बिटिया को बड़ा किया हैं। ब्याह हो गया अब वह परायी हो गयी। गीत के माध्यम से होती कन्या के लिए समधी से विशेष विनती है कि यह बिटिया हमने गोबर के उपले थापने के लिए नहीं दी है वह रसोई में ही काम करेगी।
इक नई छोड़ो तुमरी धिया
जिन बिन बरात बिसूनी
गुबरा पाथन कों धीया न दीनी,
पै तपने को राम रसोइ,
कराओ साजन जूं से बीनती²⁹
पिता हमें परदेश भेज रहे हैं। माँ का घर अब हमसे छूट रहा हैं। हे माँ! जिसे तुमने नौ दस माह तक अपने गर्भ में सहेजकर रखा था वही तुम्हारी पुत्री अब परेदेश जा रही हैं।
बाबुल भेज रहे परदेश मैया के घर छूट रहे।
नौ दस माह गरभ में रह के बेटी जात तुम्हारी विदेश।30
बेटी खूंटे पर बांधने वाली गाय की तरह है राजस्थानी लोक गीत में इसका मार्मिक वर्णन मिलता है
हे प्रिय! इन्हें मत मना करो यह तो दो दिन की चिड़िया (मेहमान) है। इनको जहाँ भेजेंगे वहीं चली जायेगी। ये बाग की कोयल हैं। इनको जहाँ बाँधेंगे वहीं बँध जायेगी। खूंटे से बंधी गायें हैं।
मत बरजो घर का ना’र चिड़िया दो दिन की
आ’ने भेजे जठे ही चली जाय
कोयल बागां की
आं’ने बांधे जठे ही बंध जाय
गऊआं खूंटा की³¹
राजस्थान में विदाई के अवसर पर गाया जाने वाला सर्वाधिक करूण रस से भरा गीत है। कोयल कई इतना बाबा का लाड़ कोयल बाई कहाँ चले आम पके न इमली महुए लहरें ले रहा आया समधियों के यहाँ से सुग्गा ले गया टोली में से चुन कर कोयल बाई कहाँ चले !
इतरो बाबोसा रो लाड
कोयल बाई सिद चाल्या
आंबा पाक्या न आमली
महुड़ा लेहरां लेय
आयो सगां रो सूवटो
लेयग्यो टोळी माऊं टाळ
कोयल बाई सिद चाल्या³²
राजस्थानी लोक गीत ओळूं
तुम्हारे पानी कौन भरेगा ओ पिता कौन भरेगा तुम्हारी बिटिया बिना तुम्हारी भाभियाँ भरेगी तुम्हारे पानी प्यारी बेटी जा रही ससुराल तुम्हें बाबुल कौन कहेगा ओ बाबुल ! तुम्हारी धीय बिना ? आँसू भर आये नयनों में प्यारी बेटी जा रही ससुराल।
मेरो पींडो रीतो ओ बाबल!
कूण भरैगो तेरी धीय बिना ?
तेरी भाभ्यां भरैगी तेरो पींडो
लाडो बेटी! जाय घरां
तनै बाबल कूण कहैगो
ओ बाबल! तेरी धीय बिना ?
आंसू तो भर आया नैणां- में
लाडो बेटी! जाय घरां³³
हे ऊँट! मैं तेरी सजावट पर वारी जाती हूँ। तू इतना उतावला मत हो थोड़ा ढीठ बन जा। मेरे पिता के देस से मेरा बिछोह हो रहा हैं।
घर घोली रे करहलिया थारोड़ी लूंब नां
करहलिया पग भर पाछड़ली फेर
देसड़लो छूटै रे म्हारौड़े बाप रो³⁴
गुजराती लोक गीत में- विदा होती कन्या को देखकर वहाँ खडे़ सभी लोगों की आँखों में आँसू आ जाते हैं-
ल्योने रे बनी कचोळड़ा। जमोने बार बे वार रे
पछे रे जमशो के सासरे, जमशो उछीष्ट भात रे
कूर जमशो दिवाळड़ी, रोटली आदितवार रे
एक जमशो रे बपोरे के बीजलूं माजम रात रे
घेड़ी रे चाल्या सासरे रे, कोई रोई भरिया तलाव रे³⁵
मालवी लोक गीतों में- यह मेरी प्यारी बेटी है इसे दुःख मत देना। यह मेरे घर आँगन का उजियाला हैं। इसे मैं ने दूध पिलाकर बड़ा किया हैं। लो म्हारी कर करियारी बेटी
ओ सासू, दुःखड़ली मती दीजे हो
म्होरा घर आंगन को टमक्यो
ओ सासू, दुखड़ली मती दीजै हो
म्हने दुदड़ला पई ने मोटी करी³⁶
पीहर छोड़ना इतना सहज तो नहीं होता। जिस आंगन में बचपन से जवानी तक या मोहक किन्तु भोलेपन का समय बिताया। जिस आंगन से हजारों स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। उसी आँगन से अचानक विदा हो जाना। वैसा ही है जैसा एक पौधे को मूल क्यारी से उखाड़ कर दूसरी क्यारी में रोपना
दो वीणया दो वीणण देओं
वीणण देओ फूल चार
पछे बेठू पालखड़ी
खेलण देओ दन चार
पछे बेठू पालखड़ी³⁷
पंजाबी लोक गीत में बेटी कहती है-
बाबुल, तुम्हारा घर हमारे लिए चम्पा पुष्प की हरी भरी झाड़ी के समान है जिसमें बैठकर चिड़ियाँ थोडी़ देर तक चहकती हैं फिर उड़ जाती हैं। हम भी तुम्हारे इस महल से एक दिन उड़ जायेगी। हमारी उड़ान बहुत लम्बी है। पता नहीं हमारा भाग्य हमें किस देश में ले जायेगा।
साड़ा चिड़ियाँ दा चम्बा वे
बावल असां उड्ड जाणा।
साड़ी लम्मी उड़ारी वे,
खबरे केहड़े देस जाणा।।³⁸
कुमाऊँनी लोक गीत में विदा होती बेटी कहती है-
छोड़ा, छोड़ा कन्ये तुमने, धूल मिट्टी का खेल
क्यों छोड़ी कन्ये तुमने माँ की कोख
क्यों छोड़ा पिता जी का घर
छोड्यो छोड्यो बाली त्वीले धुल माटी को खेल
छोड्यों बाली माणूनी का, खाजा
किलै छोड़ी बाली त्वीले मायूड़ी की कोख
किलै छोड्यो बाबा ज्यू को घौर³⁹
गढवाली लोक गीत में विदा होती बिटिया कह रही है-
आज माता का हाथ छूट गया है
आज भाभी का साथ छूट गया है,
आज आंगन का खेल छूट गया है,
आज सखियों से मिलना छूट गया हैं।
आज छूटो माई को हात,
आज छूटो बौटी को सात।
आज छूटो आंगणी को खेल,
आज छूटो धियाणी को मेल।⁴⁰
कांगड़ी लोक गीत में कन्या पिता से कहती है -
आपके महल के भीतर पिताजी, अब कौन खेलता है?
अब वहाँ मेरी पोतियां खेलती है तू अपने घर जा।
चंबा चिड़ियों से भरा है, पिताजी् अब वे उड़ जाएंगी,
हमारी बड़ी लंबी उडान है, ना मालूम किस देश जांए।
तेरिआं महलां दे अंदर जी, बापू हुण कुण-कुण खेले,
मेरिआं खेलणा पोतरिआं, धीए घर जा अपणे।
चंबा चिड़िया दा भरेया जी, बापू चंबे उड़ी बो जाणा,
स्हाड़ी लम्मी उडारी वो, धीए कुस देसें जाणा।⁴¹
आंध्रप्रदेश के लोक गीत में वर्णन मिलता है कि-
सीते, एक बार मुड़ कर मेरी तरफ देख लो
तुम्हारी नजर हमारे लिए मोतियों और हीरों की तरह हैं⁴²
ओड़िया लोक गीत जिन्हें :- कांदणा गीत (रुदन गीत) कहते है में बेटी कहती है-
आज चली मैं गोपपुर छोड़ कर, ओ माँ।
उठ गई सवारी, बैठेगी नहीं, ओ माँ।
फिर गोपपुर दिखेगा नहीं, ओ माँ।
हमने लगाया है फूल जागर
हम है माँ के सोने का सागर
आजि जिबि मुं गोपपुर छाड़ि हे बोउ
उठिता सवारि बसिला नाई हे बोउ
आउ गोपपुर दिश्बि नाई हे बोउ
आमे लगाइलु फूल जागर,
माआ मो आमे सुना सागर⁴³
गोण्ड जनजातीय गीत में- मेरी सभी सहेलियाँ पानी भरने जा रही हैं, जिस तरह सर की ‘ईडूणी’ के छूट जाने से गगरी गिरकर फूट जाती है, इसी तरह आज मेरी सभी सखी सहेलियाँ छूट रही हैं। कागज में लिखा होता तो मैं अवश्य (बांच) लेती परन्तु तकदीर की लिखाई कोई नहीं बाँच सकता।
कौन गुड़निया औ मोरे दाई सब सखियन पनिया को जाये।
टूट गेय गुड़निया फुट गैय गघरिया छुट गैया संधिया हमार।
कागज होतिस में बाँच लेतव, करमय दाई री बाँच नहि जाय।⁴⁴
इन लोक गीतों के अध्ययन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि
मानव हृदय सर्वत्र समान है। लोकगीतों में लोक संस्कृति की समान भावधारा प्रवाहित हो रही है। पुत्री की विदाई के अवसर पर अवध प्रदेश की माता जिस प्रकार बिलख-बिलख कर रोती है उसी प्रकार पंजाबी माता भी करूण क्रदंन करती हैं। यही लोक मान्य संस्कृति की उपलब्धि लोकगीतों की विशेषता हैं।⁴⁵
प्रत्येक बन्नी पैतृक घर छोड़ने की बेला में संत से भी अधिक वीतरागी बन जाती हैं। अपने पिता का घर व माँ का आँचल छोड़कर एका एक प्रियतम के घर चली जाती है, वह सज धज कर युगीन परम्परा का आँचल ओढ़कर बचपन की यादों को गली-गुवाड़ी में छोड़कर चुप चाप चल देती है। इसीलिए यह विदाई सब शब्दों से परे अश्रुधारा में बदल कर बहती हैं। शब्द यहीं रुकते हैं। गीत रुकते हैं वाद्य मंद हो जाते हैं सारा कुटुम्ब एक बार थम जाता है बेटी को विदा करके।
परिवार की अखंड शृंखला, सृजन का विराट स्वरूप इससे बड़ी आस्था और विश्वास किन शब्दों में कहा जा सकता हैं। जब विदा होती बन्नी से उसके बाबुल, माँ, काका व परिजनों ने कहा बेटी! बाग में जो तू ने पेड़ पौधें लगाये उन पेड़ पौधों का क्या होगा? यह तो सभी को मालूम है बन्नी सयानी होते ही परायी हो गयी, सावा चढ़ने पर तो विदा होना ही है। पर विदा होने से पूर्व बन्नी ने अपने हृदय में बिछुड़न के दर्द को छिपाकर सृजन को अनवरत बताते हुए अथाह विश्वास के साथ कहा-
म्हारा सूं छोटी म्हारी बेनड़
भाभा जी लुळ लुळ सींचेला
म्हारा हरिया बन री कोयली
बाबा ! चिन्ता नहीं करो, मेरे से छोटी मेरी बहना जो है, वह आप के बाग को सूखने न देगी। वह उत्साह और स्नेह से इन पौधों, लताओं को सींचेगी, यह सींचना परिवार समाज सभी को सींचना है। सींचने में स्नेह की बरखा हो रही हैं। इस संदेश में सृजन का अखंड क्रम वर्णित हो चला हैं।
संदर्भः
- लूर : सम्पादक डॉ. जयपाल सिंह राठौड़, अंक 17.18 कालबेलिया विशेषांक, पृ़. 27
- मानक हिन्दी कोश तीसरा खण्ड सं. रामचन्द्र वर्म्मा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सन् 1990 ई. पृ. 531
- वही कोश, तीसरा खण्ड, पृ. 173
- वही कोश, तीसरा खण्ड, पृ़. 98
- वही कोश चौथा खण्ड प्रकाशन वर्ष 1991 ई. पृ़. 159
- वही कोश पहला खण्ड प्रकाशन वर्ष 1991 ई. पृ. 449
- वामन शिवराम आप्टे संस्कृत- हिन्दी (छात्र-संस्करण) नाग प्रकाशक दिल्ली सन् 1996 पृ. 497
- कालिदास-विरचितं अभिज्ञान शाकुन्तलम - व्याख्याकार डॉ. यदुनन्दन मिश्र चौखम्भा पब्लिशर्स वाराणसी संस्करण 1999 पृ. 223-24
- गोस्वामी तुलसीदास विरचित रामचरित मानस टीकाकार- हनुमानप्रसाद पोद्दार सं. 2058 तिरसठवाँ संस्करण पृ.. 268
- गोस्वामी तुलसीदास विरचित रामचरितमानस टीकाकार - हनुमानप्रसाद पोद्दार सं. 2058 तिरसठवाँ संस्करण पृ.. 499
- भोजपुरी लोक-गीत में करुण रस : दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सन् 1965 पृ. 515
- भोजपुरी लोक-गीत भाग 1 सं. डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सन् 1990
- पृ. 46
- लूर : सं डॉ. जयपाल सिंह राठौड़, अंक 9-10, बन्नी लोक गीत विशेषांक उषा वर्मा का आलेख
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- हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास षोडश भाग सं. राहुल सांकृत्यायन नागरी प्रचारिणी सभा, काशी सं. 2017 वि.पृ. 28
- लूर वही डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन का आलेख पृ. 15
- हिन्दी साहित्य का वृहत इतिहास, पृ. 69
- लूर वही डॉ. अमरेन्द्र का आलेख पृ. 52
- लूर वही डॉ. ब्रजनन्दन वर्मा का आलेख पृ. 23
- लूर वही अश्विनी कुमार आलोक का आलेख पृ. 49
- हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास षोडश भाग सं. राहुल सांकृत्यायन नागरी प्रचारिणी सभा, काशी सं. 2017 वि. पृ. 166
- उत्तर प्रदेश के लोक गीत : सूचना विभाग, उत्तर प्रदेश शक संवत् 1881 पृ. 39
- बघेलखण्ड के लोक गीतः लखन प्रताप सिंह ‘उरगेश’ मध्य प्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद्, भोपाल सन् 1994 पृ. 7
- हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास षोडश भाग सं. राहुल सांकृत्यायन नागरी प्रचारिणी सभा, काशी सं. 2017 वि पृ. 256
- वही पृ. 305
- वही पृ. 411-12
- उत्तर प्रदेश के लोक गीत : सूचना विभाग, उत्तर प्रदेश शक संवत् 1881, पृ. 66
- हिन्दी साहित्य का वृहत इतिहास, वही पृ. 378
- लूर- सं. डॉ. जयपाल सिंह राठौड़ अंक 9-10 बन्नी लोक गीत विशेषांक श्रीमती पवित्रा ‘सुहृद’ का आलेख पृ. 88
- हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास षोडश भाग सं. राहुल सांकृत्यायन नागरी प्रचारिणी सभा, काशी सं. 2017 वि पृ. 342
- बुन्देली वैवाहिक गीत : डॉ. सुधा गुप्ता आदिवासी लोक कला अकादमी मध्यप्रदेश भोपाल वर्ष 2004
- पृ. 170-171
- लूर बन्नी लोक गीत विशेषांक डॉ. रेंवत कँवर राठौड का आलेख पृ. 38
- राजस्थानी लोकगीत विहार प्रथम भाग संकलनकर्ता नरोत्तमदास स्वामी श्रीराम मेहरा एण्ड कम्पनी आगरा, सन् 1997-98 पृ. 56-57
- रंगयोग : सम्पादक डॉ. रामप्रसाद दाधीच जनवरी-मार्च 1971, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी जोधपुर नारायणसिंह चंपावत का आलेख, पृ. 55
- लूर- सं. डॉ. जयपाल सिंह राठौड़ अंक 9-10 बन्नी लोक गीत विशेषांक डॉ. दीपेन्द्र सिंह जाडेजा का आलेख पृ. 61
- मालवी लोक-साहित्य : डॉ. श्याम परमार हिंदुस्तान एकेडमी इलाहाबाद 1969 पृ. 139
- लूर बन्नी लोक गीत विशेषांक डॉ. पूरन सहगल का आलेख मालवी के बन्नी गीत पृ. 28
- लूर वही डॉ जगन सिंह का आलेख पृ. 117
- कुमाऊँनी लोक गीत : देवी सिंह पोखरिया मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद् भोपाल सन् 1996 पृ. 179-80
- उत्तर प्रदेश के लोक गीत : सूचना विभाग, उत्तर प्रदेश शक संवत् 1881 पृ. 168
- हिमाचल प्रदेश लोक संस्कृति और साहित्य : डॉ. गौतम शर्मा ‘व्यथित’ नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया नयी दिल्ली प्रथम आवृत्ति 1993 पृ. 171-72
- आंध्र प्रदेश लोक संस्कृति और साहित्य : बी.राम. राजू नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया नयी दिल्ली द्वितीय आवृत्ति 1989 पृ. 42
- ओड़िसा : लोक संस्कृति और साहित्य : के.बी. दास, एल के. महापात्र नेशलन बुक ट्रस्ट, इंडिया नयी दिल्ली पहला संस्करण 1995 पृ. 130-131
- गोण्ड जनजातीय गीत : रूपसिंह कुशराम मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद भोपाल वर्ष 2003 पृ. 224
- हिन्दी साहित्य का वृहत् इतिहास षोडश भाग सं. राहुल सांकृत्यायन नागरी प्रचारिणी सभा, काशी सं. 2017 पृ. 166
- लूर- सं. डॉ. जयपाल सिंह राठौड़ अंक 9-10 बन्नी लोक गीत विशेषांक पृ. सम्पादकीय
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