मीरां कृष्ण की अनन्य भक्त हैं उनके आराध्य गिरधर गोपाल हैं और वे उन्हें ही रिझाती हैं।
ब्रज भूमि कृष्ण और गोपियों की रास लीला भूमि है जहाँ कृष्ण ने गायें चरायी है, माखन चुराया है ग्वाल बाल के संग गेंद खेली है और कालिये नाग को नाथा है। इसीलिए ब्रज प्रदेश का हर पेड़, नदी, नाला, पर्वत, पशु, पक्षी सभी भक्तजनों को प्रिय हैं।
जिस तरह रामचरित मानस की भाषा अवधि है उसी तरह कृष्ण भक्तों की भाषा ब्रज है मीरां ने जहाँ कृष्ण के प्रति अनन्य अनुराग प्रकट किया हैं वहाँ उन्होंने ब्रज भाषा के शब्दों का प्रयोग किया है ब्रज भाषा कोमल कांत पदावली की भाषा है। मीरां को वृन्दावन की कुंज गलियों से मोह है वे कृष्ण को कुंज गलियों में ढूंढती है।
ब्रज अथवा ब्रज शब्द संस्कृत धातु ‘व्रज’ से बना हैं, जिसका अर्थ ‘गतिशीलता है। व्रजन्ति गावो यस्मिन्निति ब्रज :/जहाँ गायें नित्य चलती अथवा चरती हैं, वह स्थान भी ‘व्रज’ कहा गया हैं। कोशकारों ने ब्रज के तीन अर्थ बतलाये हैं- गोष्ठ (गायों का खिरक), मार्ग और वृंद (झुंड)। इनसे भी गायों से सम्बन्धित स्थान का ही बोध होता है। इसी संस्कृत शब्द ‘व्रज’ से हिन्दी रूप ‘ब्रज’ बना है।¹
ब्रजभाखा का अन्य नाम ब्रजभाषा भी है। दक्षिणी-भरतपुर, करौली तथा पूर्वी-जयपुर की गूजर जातियाँ भी ब्रजभाखा-भाषी हैं। इनकी बोली में अनेक स्थानीय-विषेषताएँ हैं। वास्तव में इधर की ब्रजभाखा में राजस्थानी का सम्मिश्रण मिलता है और इस प्रकार यह राजस्थानी तथा ब्रजभाखा के बीच की कड़ी है।²
गुजराती और राजस्थानी में इतना घनिष्ट सम्बन्ध है कि भाषा शास्त्री उसे एक ही मानते हैं।³
मीराबाई का नाम भारत के प्रधान भक्तों में हैं। इनके पद कुछ तो राजस्थान मिश्रित भाषा में है और कुछ विशुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा में। पर सबमें प्रेम की तल्लीनता समान रूप से पाई जाती हैं। इनके बनाए चार ग्रंथ कहे जाते हैं- नरसी जी का मायरा, गीत गोविन्द टीका, राग गोविंद, राग सोरठ के पद।⁴
मीराँ बाई मेड़ता व मेवाड़ से लेकर कुछ दिनों तक वृन्दावन में भी रह चुकी थी अतएव उनकी रचनाओं में उन स्थलों की भाषाओं के प्रयोगों का पाया जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं।⁵
मीराँ 1538 ई. के बाद ही वृन्दावन तीर्थ यात्रा करने गई होगी।⁶
विविध भक्ति धाराओं में हमें ऐसे बहुत से कवि मिलते हैं, जिनकी रचनाएँ किसी एक भाषा या बोली में न होकर कई भाषाओं या बोलियों में मिलती हैं। कवियों ने एक तो उस युग की प्रधान भाषा ब्रजभाषा में भी काव्य रचना की और अपनी मातृभाषा में भी, तथा अपने निवास भूमि की भाषा में भी। मीरा को हम इसी तीसरी कोटि का मानते हैं। इस नाते वे ब्रजभाषा में भी पद-रचना करती थीं।
ब्रजभाषा इस युग में सर्वत्र सामान्य भक्ति की भाषा थी। हम उन्हें ब्रजभाषा का भी कवि मानते हैं।⁷
मीरां के फुटकल पदों में बहुत से पद राजस्थानी भाषा के दिखाई पड़ते हैं, किन्तु ब्रज-भाषा में लिखे पदों की संख्या भी कम नहीं हैं। इसी तरह के पद मीरां बाई की शब्दावली, वेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद अथवा नरोत्तम स्वामी के ग्रन्थ ‘मीरां मन्दाकिनी’ में काफी संख्या में मिल सकते हैं। नीचे एक पद दिया जाता है-
मैं तो गिरधर के घर जाऊँ
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊँ’
रैन पड़े ही उठि जाऊँ भोर भये उठि आऊँ।⁸
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ब्रजवासी श्याम सलोने के प्रणय में अपना सर्वस्व समर्पित कर सभी से नाता तोड़ देने वाली मीरा ने, अपने भक्ति भाव के लिए मातृभाषा के साथ ब्रजभाषा को भी अपनाया होगा।⁹
मीराँ पदावली में ब्रज-भाषा के शब्दों या उससे प्रभावित शब्द-रूपों का भी प्रयोग हुआ है, जो ब्रज की व्यापकता, उसके लालित्य एवं भक्ति के संदर्भ में उसकी सहज लोक-प्रियता का ही घोतक हैं।¹⁰
वृन्दावन महिमा वृन्दा (तुलसी) के वन ब्रज की विषेषता है। मीराँ ने उसे पहचाना है।¹¹
आली, मोहि लागत बृन्दाबन नीको।
घर घर तुलसी ठाकुर पूजा, दर्शन गोविंदजी को।।
निर्मल नीर बहत यमुना को, भोजन दूध दही को।।
रत्न-सिंहासन आप बिराजे, मुकुट धर्यो तुलसी को।।
कुंजन कुंजन फिरत राधिके, शब्द सुनत मुरली को।।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, भजन बिना नर फीको।।¹²
मीरां का मन सांवरी सूरत से लगा है इसलिए वह ब्रज में अंत समय तक रहकर श्रीकृष्ण का ध्यान लगाना चाहती है-
साँवरी सूरत पर तिलक बिराजे,
वाही से लाग्यो मेरो ध्यान।।
सुरनर मुनिजन ध्यान धरत है,
गावत वेद पुरान।
मीराँ नें प्रभु दरसण दीज्यो,
बृज तज अन्त न जान।।¹³
कृष्ण के सिर पर केशर का टीका है और उन्हें मोर मुकुट पीतांबर शोभायमान हो रहे है। बृन्दावन में गायें बहुत है और दूध दही के भोजन की कोई कमी नहीं है वहीं मीरां का मन रमता है-
बृन्दाबन में धेनु बहुत है,
भोजन दूध दही को रे।।
मोरमुकुट पीतांबर सोहै,
सिर केसर को टीको रे।।14
कृष्ण ब्रज के भूषण हैं और वे ही इस लीला भूमि के प्राण हैं मीरां के कृष्ण गायें चराने यमुना के तट पर निकल पड़े हैं उसी का वर्णन इस पद में है-
सारी गउएँ निकस गईं यमुना,
लेकर संग लवारे।
वस्तर भूषण तन पर धारो,
पगियाँ पेच सँवारे।।
या ब्रज के प्रभु भूषण तुम हो,
तुम ही प्राण हमारे।¹⁵
हे यदुवर (कृष्ण) आप मुझे बहुत प्रिय लगते हो। मथुरा में आपका जन्म हुआ है और गोकुल में अपने पदार्पण किया है काला कंबल धारे ग्वाल बने हुए यमुना के हीर पर गायें चरा रहे हो वह ब्रज भूमि धाय है जहाँ कृष्ण का जन्म हुआ और गोचारन किया।
यदुवर लागत है मोहिं प्यारो।
मथुरा में हरि जन्म लियो है, गोकुल में पग धारो।
यमुना के तीरे धेनु चरावे, ओढे कामल कारो।¹⁶
कृष्ण को मोर मुकुट, पीताम्बर सभी शोभा दे रहे हैं ओर कुण्डल की छवि ही न्यारी है। कृष्ण की मुरली की मीठी तान और गायें चर रही है कितना सुंदर चित्रण किया है भारतीय कृषि संस्कृति का -
मोरमुकुट पीतांबर शोभे,
कुण्डल की छवि न्यारी।।
वृन्दावन में धेनु चरावे,
मुरली बजावत प्यारी।।¹⁷
बरसाने से चली गुजरी को नंद गाँव जाना है आगे कृष्ण गायें चरा रहे हैं जिनसे मुझे प्रेम का बाण लग गया है-
बरसाने सों चली गुजरिया,
नन्दगाम को जाना।
आगे केशो धेनु चरावै,
लगे प्रेम के बाना।।
वृंदावन की कुंज गली में
रूनझुन नुपुर बज रहे हैं
प्रिय कृष्ण अब तो मीरां को दर्शन दो-
बृन्दाबन की कुन्जगलिन में,
नूपुर रूनझुन लाना।
मीराँबाई को दरशन दीजो,
ब्रज तज अनत न जाना।।¹⁸
इन्द्र ने जब ब्रज पर कोप किया तो मूसलाधार बारिश की। कृष्ण ने गोवर्द्धन पर्वत को बायें नख पर धारण कर डूबती हुई ब्रज को उबारा उसी प्रकार आप हमें भी उबारो -
आज बिरज पर इन्दर कोप्यो,
बरसे मूसलधारा।
बाँवां नख पर गिरवर धार्यो,
डूबत बिरज उबारा।¹⁹
हे सखी! कन्हैया मेरे कलेजे का टुकड़ा है, उसे मोर मुकुट; पीतांबर व कुंडल शोभा देते हैं वृंदावन की कुंजगली में नंदकिशोर नृत्य कर रहे हैं-
सखी मेरो कानूड़ो कलेजे-कोर।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै,
कुंडल की झकझोर।।
बृन्दाबन की कुंजगलिन में,
नाचत नन्दकिशोर।।²⁰
मीरां कृष्ण की प्रेम दीवानी है और कृष्ण ब्रज के राजा हैं-
सांवराजी हो, चूड़ें रंग लाग रह्यो छे,
लाग रह्यो छै ब्रजराज।
रंग चूड़ो रंग चूनड़ी जी काँई रंगीलो साज
रंग बृंदावन कुंजलता जी।
काँई सहस गोप्यां रा सिरताज।²¹
हे नंदलाला आपके द्वार पर ब्रजबाला दर्शन को खड़ी है आप से विनती कर रही हैं कि आप उन्हें दर्शन दीजिए बिन दर्शन के सब श्रृंगार फीका लग रहा।
नंदजी के लाला ठाडी ब्रजबाला दरसन दीजिये।
ब्रजबाला बिनती करे, सुनियो स्याम पुकार।
बिन दरसन फीको लगै, सबही हार सिंगार।।²²
ब्रज में होली को विशेष चाव से मनाया जाता है। ब्रज के मंदिरों में गुलाल उड़ती हैं झांझ पखावज, डफ पर होरियों गायी जाती हैं मीरां के कृष्ण भी ब्रज नर नारी के साथ होरी खेल रहे हैं।
होरी खेलत है गिरधारी
मुरली चंग बजत डफ न्यारौ,
सँग जुंवती ब्रजनारी।।
फागु जु खेलत रसिक साँवरो,
बाढ़्यो रस ब्रज भारी।²³
नंद गाँव और बरसाने की होली तो आज भी प्रसिद्ध हैं मीरां कहती है ब्रजमण्डल में फाग रचा है सखियों ने उत्साह बढ़ा दिया है।
साँवरो होरी खेलन आयो, आयो।
नंदगाँव से संग सखा ले, बरसाने में ध्यायो।
ब्रजमण्डल में फाग रच्यो है, सखियन मोद बढ़ायो।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, केसर रँग करायो।।
सखी मन आनंद छायो।²⁴
कृष्ण के बिना मीरां को ब्रज सूना लग रहा है वह उदास हो गयी है। वृन्दावन सूखने लगा और कुंज कुम्हला गये हैं जन्म भूमि मथुरा को छोड़कर कृष्ण द्वारका में जा बसे हैं-
ब्रज में आवोलाजी ब्रजबासी,
रामाँ थां बिन भौमि उदासी।
बृन्दाबन थारी सूखण लागी,
कुंज कुंज कुमलासी।
जन्मभौमि मथुराकी छोड़ी,
अब हुये द्वारिका बासी।
सीतल जल जमुना को छोड्यो,
अब खारो कैयाँ भासी।।²⁵
मीरां ने पूरे वृंदावन को ढूंढ लिया पर कृष्ण नहीं मिले इसी भाव की मार्मिकता को उन्होंने वर्णित किया हैं पद को पढ़कर पाठक का मन भी उदास हो जाता है-
वै न मिले जिनकी हम दासी।
पात पात बृन्दाबन ढूंढ्यौ ढूंढि फिरी सगरी मैं कासी।²⁶
मीरां विश्व की महान् भक्त कवियों में से है। उनके पद उनका भाव प्रत्येक भाषा भाषी को अपने से लगते हैं। क्योंकि उनके पद सहज भाव से निकले हैं। मीरां ने अपने पदों में ब्रजझेग का वर्णन क्या किया है उसकी छवि में चार चाँद लगा दिए है।
लोक वाणी में प्रचलित मीरां के हरजसों में ब्रज का वर्णन मिलता है-
सांवरिया म्हांने कीन्हा क्यूं नीं बन का मोर
ब्रज में रे’ता बनफळ खाता बन में करता किलोळ²⁷
संदर्भ सूची
- ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास प्रथम भाग रचयिता प्रभुदयाल मीतल, राजकमल प्रकाशन दिल्ली 15 जुलाई, 1966 ई पृ.1
- हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास : डॉ. उदयनारायण तिवारी लोकभारती प्रकाषन इलाहाबाद संस्करण 1995 पृ. 181
- वही पृ. 134
- हिन्दी साहित्य का इतिहास : आचार्य रामचंद्र शुक्ल, नागरीप्रचारिणी सभा, काषी संवत् 2056 वि.पृ. 101
- मीरांबाई की पदावली सं. आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, संस्करण सन् 1993 ई. पृ. 58
- मीराँबाई : ऐतिहासिक व सामाजिक विवेचन-डॉ. हुकम सिंह भाटी, रतन प्रकाशन जोधपुर सन् 1986 पृ. 20
- ब्रज - साहित्य का इतिहास : डॉ. सत्येन्द्र, भारती भंडार लीडर प्रेस, इलाहाबाद सं. 2024 वि. पृ. 245
- सूर-पूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य : डॉ. शिवप्रसाद सिंह, हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय, वाराणसी अक्टूबर 1958 ई. पृ. 216
- मीरा जीवन और काव्य : द्वितीय खण्ड डॉ. सी.एल. प्रभात राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर प्रथम संस्करण 1999 पृ. 397
- मीराँ पदावली - डॉ. शम्भूसिंह मनोहर, रिसर्च पब्लिकेशन्स जयपुर सन् 1969 पृ.64
- हिन्दी कृष्ण-भक्ति काव्य पर श्रीमद्भागवत का प्रभाव पृ. 255 विष्वनाथ शुक्ल भारत प्रकाषन मन्दिर, अलीगढ़
- मीरां बृहत्पदावली सं. हरिनारायण पुरोहित प्रथम भाग राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर तृतीय संस्करण सन् 2006 पद सं. 31 पृ. 15
- वहीं पद सं. 52 पृ. 26
- वहीं पद सं. 46 पृ. 23
- वहीं पद सं. 200 पृ. 95
- वहीं पद सं. 488 पृ. 236
- वहीं पद सं. 207 पृ. 99
- वहीं पद सं. 83 पृ. 41
- वहीं पद सं. 41 पृ. 20
- वहीं पद सं. 585 पृ. 292
- वहीं पद सं. 604 पृ. 305
- वहीं पद सं. 243 पृ. 117
- वहीं पद सं. 657 पृ. 329
- वहीं पद सं. 615 पृ. 310
- वहीं पद सं. 301 पृ. 144
- वहीं पद सं. 564 पृ. 281
- लूर सं. डॉ. जयपाल सिंह राठौड़, मीरां विषेषांक वर्ष 1, अंक 2, जुलाई-दिसम्बर 2003 पृ.88
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