-->

सोमवार, 9 जनवरी 2023

विश्व हिन्दी दिवस पर विशेष | डॉ.महीपाल सिंह राठौड़

  


विश्व हिन्दी दिवस पर विशेष | डॉ.महीपाल सिंह राठौड़

विश्व हिन्दी दिवस पर विशेष




डॉ.महीपाल सिंह राठौड़

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष

हिन्दी विभाग

जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय,जोधपुर




हिन्दी दुनिया की दूसरी महत्वपूर्ण भाषा है जिसे चीनी भाषा के बाद दुनिया में सर्वाधिक बोला जाता है। इस स्थान पर पहुँचने में हिन्दी को कई यात्राएँ करनी पड़ी हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की इच्छा शक्ति ही थी कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में अपना उद्बोधन हिन्दी में दिया। यानि भारत के साथ जिसे मैत्री और व्यापार करना है वे भारत की भाषा में बात करें तो रिश्ता प्रगाढ़ होगा। जब शासन मजबूत होता है तो उसकी भाषा को दूसरे भी सुनते हैं अंग्रेजी के प्रभाव का मुख्य कारण यही रहा है और अब हिन्दी के महत्वपूर्ण होने में भी यह कारण नजर आता है। 

प्रतिवर्ष 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस मनाने की संकल्पना 10 जनवरी 2006 को हमारे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा की गयी थी। वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिन्दी में उद्बोधन देकर हिन्दी की गरिमा को बढ़ाया है। हिन्दी की इस विकास यात्रा को यहाँ तक पहुँचने में हम हिन्दी भाषियों का ही योगदान नहीं विदेशी विद्वानों व अप्रवासी भारतीयों का भी महŸवपूर्ण अवदान है। विदेशी विद्वानों ने जहाँ हिन्दी भाषा के साहित्य संस्कृति को पठन पाठन की परम्परा से जोड़कर व भाषा साहित्य में अनुसंधान कर विश्व समुदाय में हिन्दी के प्रति एक प्रेम उत्पन्न किया और हमारे साहित्य भंडार का परिचय अपने देशवासियों व भाषा प्रेमियों को करवाया। 

वँही अप्रवासी भारतीय जोे विदेशों मे खेती किसानी और मजदूरी करने गए अपने साथ अपनी भाषा और संस्कृति भी ले गए और उससे जुड़ाव बनाये रखा। विदेशी धरती पर भारतीय तŸवों की परिपूर्ति यदि कोई भाषा कर सकती थी तो वह हिन्दी ही थी। वहाँ देशों की सीमाएँ भी कोई मायने नहीं रखती। विदेश में रहने वाले भारतीय व पाकिस्तानी हिन्दी में सहज बात करते हैं। यह दो दिलों की एक भाषा है। 

हिन्दी भाषा का पहला व्याकरण ही 1695-1698ई. डच भाषा में लिखा गया। फ्रांसीसी विद्वान गार्साद् तासी ने हिन्दी साहित्य का प्रथम इतिहास लिखा और जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण कर अभूतपूर्व कार्य किया। 

बेल्जियम में फादर कामिल बुल्के का हिन्दी प्रेम किससे छिपा है वे सन् 1935 में धर्म प्रचार के उद्धेश्य से भारत आये और भारत की नागरिकता प्राप्त कर यहीं के हो गए। उन्होंने राम कथा, उत्पत्ति और विकास विषय पर डी.लिट की उपाधि प्राप्त की और अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश तैयार किया जो आज भी हमारे लिए महत्वपूर्ण कोश के रूप में है। हिन्दी सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण से सम्मनित किया गया। 

आज विश्व में लगभग 150 देशों में हिन्दी भाषा बोली एवं समझी जाती है। भारत के अतिरिक्त विश्व के सौ से अधिक विश्वविद्यालयों में हिन्दी का पठन-पाठन व शोध कार्य जारी है। अंग्रेजी विज्ञान की भाषा है परन्तु हिन्दी भारत में व्यापार की भाषा हैं । हिन्दी आज भारत की ही भाषा नहीं वह विश्व भाषा का स्थान प्राप्त कर चुकी है। आम आदमी की बात करने वाले कबीर, मीरां और प्रेमचंद को विश्व साहित्य प्रेमी पढ़ना चाहते हैं । 

अगस्त 2018 में मॉरिशस में आयोजित ग्यारहवें विश्व हिन्दी सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए भारत सरकार की विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने मंच से कहा कि जब भाषा लुप्त होने लगती है तब संस्कृति के लोप का बीज उसी में रख दिया जाता है इसलिए हिन्दी को संरक्षित करना यानि हमारी संस्कृति को भी संरक्षित रखने का प्रयास है। 

डॉ.अब्दुल कलाम आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति थे जिन्होंने राष्ट्रपति चुने जाने के बाद हिन्दी भाषा में शपथ ली थी। विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार यह विश्व की 10 शक्तिशाली भाषाओं में से एक है। यह संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा है। सन् 2006 से विश्व हिन्दी सचिवालय मॉरिशस के मोका गाँव में कार्यरत है। अब तक 11 विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं। 

आज चीन के ग्यारह विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ायी जाती है। चीनी भाषा के विद्वान प्रो.जिनदिंग हान ने रामचरित मानस का चीनी भाषा में अनुवाद किया है।  प्रो.च्यांग चिंग ख्वेई ने अपना जीवन हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित किया । सूर पर इनका विशेष कार्य है। भारत सरकार ने उन्हें जार्ज ग्रियर्सन पुरस्कार से नवाजा है। यिन होंग यु एन चीन के पहले हिन्दी अध्यापक थे। उन्होंने चीनी भाषा में हिन्दी का पहला व्याकरण लिखा। प्रो.यिन ने वृन्दावन लाल वर्मा के ‘झाँसी की रानी’ और इलाचंद्र जोशी के ‘सन्यासी’ का अनुवाद चीनी भाषा में किया है। प्रो.ल्यू आन ऊ ने प्रेमचंद साहित्य पर कार्य किया है। प्रो.जिन दिड् हान ने ‘मानस’ का चीनी मे अनुवाद किया है। 

विश्वविद्यालय स्तर पर रूस में सन् 1918 में हिन्दी अध्यापन आरंभ हो गया था। रूस में हिन्दी भाषा के प्रचारक अलेक्सेई पेत्रोविच के ‘प्राच्य भाषा संस्थान’ मंे 1920 से हिन्दी का अध्यापन जारी है। रूस में हिन्दी भाषा के प्रचारक अलेक्सेई पेत्रोविच बरान्निकोव थे। उनके पुत्र व्योत्र तथा प्रपोत्र आंद्रेई भी हिन्दी के प्रतिष्ठित विद्वान हैं। बरान्निकोव ने रामचरितमानस का रूसी में पद्यानुवाद किया। 

जापान में हिन्दी के प्रति विशेष प्रेम है। प्रो.ताकाकुसु के प्रयासों से वहाँ विश्वविद्यालयों में हिन्दी का अध्ययन-अध्यापन आरंभ हुआ। प्रो.मिजोकामी रामायण व महाभारत धारावाहिकों के माध्यम से जापानी विद्यार्थियों को हिन्दी सिखाते हैं। जापान के प्रोफेसर क्यूया दोई ने हिन्दी-जापानी कोश का निर्माण किया। प्रोफेसर तोशियों तनाका जी ने मूल गुजराती से गाँधीजी की आत्मकथा को जापानी भाषा मंे अनूदित किया। प्रो.हिरोकी नागासाकी, प्रो.मिकि निशिओका, प्रो.ताकेशि फूजी, प्रो.योशिफूमि मिजुनो, प्रो.तेइजि सकाता, प्रो.हिदेआकि इशिदा ने हिन्दी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया है। यूइचिरो मिकि ने रेणु के मैला आँचल व उपेंद्र नाथ अश्क की रचनाओं का जापानी में अनुवाद किया है। 

यूरोप में भी हिन्दी भाषा के प्रति लगाव रहा है। क्रेम्ब्रिज विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रो.मैक्ग्रेगर प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी हैं। हिन्दी व्याकरण पर उनकी पुस्तक ‘एन आउटलाइन ऑफ हिन्दी ग्रामर’ प्रसिद्ध है। डॉ.रूपर्ट स्नेल ब्रजभाषा अवधी के अतिरिक्त मध्यस्तरीय हिन्दी साहित्य में बडे़ विद्वान हैं। उनकी पुस्तक ‘हिन्दी टीच योर सेल्फ’ पाठकों में लोक प्रिय रही है। जर्मनी में 1921 में हिन्दी शिक्षण का कार्य आरंभ हुआ था। सेतांदवीर ने सूर के पदों का जर्मन में अनुवाद किया है। इटली की मारियोल्ला आफरेदी ने प्रेमचंद के ‘गोदान’ तथा कुँवर नारायण की काव्यकृति ‘आत्मजयी’ तथा चेचीलिया कोस्सियों ने फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘‘मैला आँचल’ का ‘इतालवी’ में अनुवाद किया है।

पौलेंड में डॉ.रूत्कोवस्का तथा डॉ.स्ताशिक की हिन्दी साहित्य की रूपरेखा (1992 पोलिश भाषा) में तथा डॉ.स्ताशिक की ‘हिन्दी भाषा’ महŸवपूर्ण कृतियाँ हैं युल्यूश पार्नोवस्की ने रेणु के ‘मैला आँचल’ को पोलिश में अनुवाद किया है। चेकोस्लोवाकिया में विनसेंट पोरिशका हिन्दी के प्रसिद्ध चैक विद्वान थे। प्रोफेसर स्मेकल उन नामचीन विदेशी विद्वानों में है जो हिन्दी भाषा में साहित्य साधना करते है। आस्ट्रेलिया में डॉ.रिचर्ड के बार्ज हिन्दी-उर्दू के विद्वान और भाषा वैज्ञानिक के रूप में जाने जाते है।  

गिरिमिटिया देशों में भारत से ही वर्षो पूर्व कुली और मजदूर के रूप में लोग गए थे। उनके साथ कबीर, सूर, तुलसी के पद रामलीला और लोक गीत भी गये उन्हीं को गाकर उन्होंने अपनी संस्कृति और भाषा को बचाया।

फिजी में अयोध्या प्रसाद, कुँवर सिंह, जोगेंद्र कँवल, विवेकानंद शर्मा, डॉ.सुब्रमणी आदि ने हिन्दी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया। जोगिंदर सिंह को फिजी का प्रेमचंद कहा जाता है। कमला प्रसाद मिश्र फिजी के राष्ट्रकवि के रूप में जाने जाते हैं। 

डॉ.सुब्रमणी का ‘डउका पुरान’ इस बात का प्रमाण है कि वहाँ की हिन्दी में किस प्रकार अवधी का प्रमुखता से प्रभाव है। 

मॉरिशस में ब्रिजेद्र भगत मधुकर, सोमदŸा बखौरी, मुनीश्वर चिंतामणि सहित अनेक साहित्यकारों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। अभिमन्यु अनत का प्रसिद्ध उपन्यास ‘लाल पसीना’ का फ्रेंच में अनुवाद हुआ है। 

त्रिनिडाड में प्रो.हरिशंकर आदेश ने हिन्दी प्रचार के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया है। सूरीनाम में अधिकांश विश्वविद्यालयों में हिन्दी विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। पड़ोसी देश पाकिस्तान, खाड़ी देश, श्रीलंका, बर्मा, नेपाल, भूटान सभी देशों का हिन्दी से संबंध है। इन विद्वानों ने हिन्दी को विश्व पटल पर मान और सम्मान दिलवाया है। हमारी भावनाओं और विचारों को विश्व समुदाय के सम्मुख पहुँचाया है और हिन्दी के प्रति लोगो में जिज्ञासा पैदा कर दी है जिससे आज हिन्दी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन, अध्यापन व शोध की महत्वपूर्ण भाषा होती जा रही है। 

विदेश में चालीस से अधिक देशों में छः सौ से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। इंटरनेट की दो हिन्दी पत्रिकाएँ जो दुनिया में प्रतिमाह एक सौ बीस देशों में छः हजार लोगों द्वारा पढ़ी जाती है। 

हिन्दी फिल्म का गाना ‘मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी, सर पे लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी’ रूस में खूब चला और विदेशियों की जुबान पर चढ़ गया। 

दुनिया के सर्वाधिक शक्तिशाली देश अमेरिका में 110 से अधिक विश्वविद्यालयों व कॉलेजों में हिन्दी पढ़ायी जा रही है। प्रो.माइकल शपीरो, कैरीन शोमर, क्रिस्टी मेरिल, फिलिप लुटजेनडोर्फ, टाइलर विलियम्स आदि प्रमुख नाम है जो वहाँ हिन्दी के लिए समर्पित हैं। हिन्दी एक विश्व भाषा के रूप में स्थापित होती जा रही है । यह हमारे लिए गर्व का विषय है।  


2 टिप्पणियाँ:

  1. हिंदी के संदर्भ में बेहद सार्थक संवाद के लिए धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. विश्व हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं,
    बहुत ही सार्थक आलेख!

    जवाब देंहटाएं