राजस्थान स्वाधीनता प्रेमियों की प्रसविनी भूमि रही है। यहाँ के वीरों ने आदिकाल से ही भारतीय संस्कृति के प्रतिपालक के रूप में अपना सर्वस्व न्यौछावर किया है। पृथ्वीराज चौहान, हठी हमीर, जयमल और पत्ता, महाराणा कुंभा, महाराणा प्रताप, अमरसिंह राठौड़, दुर्गादास आदि स्वतंत्रता नायक रहे हैं जिनके नाम स्मरण से ही प्रत्येक भारतीय को गर्व की अनुभूति होती है।
दिल्ली की बादशाहत जब अंतिम दौर में थी तब अंग्रेजों ने व्यापारी वेष में दरबार में नजराना पेष कर व्यापार की अनुमति मांगी और वही व्यापारी कुछ समय पश्चात् भारत वर्ष पर कब्जा कर बैठे। उनके पास सबसे बड़ा हथियार छल और कपट जिसमें में वे माहिर थे।
मुस्लिम शासन व्यवस्था के पतन के साथ ही राजस्थान पर मराठा और पिंडारियों के आक्रमण होने शुरू हुए और उन्होंने राजस्थान को बेरहमी से लूटा। गाँवों को लूट कर जला देना आम बात थी ऐसे दौर में अंग्रेज आये और यहाँ के शासक जो इन हमलों से त्र्रस्त थे अंग्रेजों की अधीनता को स्वीकार कर अपनी गद्दी को बचाने में कामयाब रहे लेकिन इसी दौरान कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने राजा द्वारा स्वीकार की गइ्र्र अंग्रजों की अधीनता को नकार दिया और संघर्ष का रास्ता अपनाकर सन् 1857 की क्रांति में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। आटे में हड्डियों का चूरा मिलाये जाने की अफवाह व सैनिकों पर अकारण अविष्वास के कारण 28 मई,1857 को राजस्थान के नसीराबाद छावनी से स्वाधीनता की सुलगाहट आरंभ हुई और शुरूआत में ही अंग्रेज अधिकारी न्यू बटी व के पैनी मारे गए। इन विद्रोहियों ने 15वीं व 30 वीं बंगाल एन.आई. देशी पैदल सेना का विद्रोह किया और ये विद्रोही दिल्ली चले गए।
नसीराबाद के विद्रोह से प्रेरणा लेकर 03 जून, 1857 को नीमच छावनी में भी सैनिकों का विद्रोह आरंभ हुआ। यहाँ के अंग्रेज महिलाओं व बच्चों को किसान रूघाराम ने शरण दी और वहाँ से अंग्रेज शरणार्थी उदयपुर शासक स्वरूप सिंह के पास चले गए।
सन् 1836 में जोधपुर महाराजा मानसिंह ने अंग्रेजों से की गई संधि के अनुसार 1.50 लाख रूपये देना स्वीकार किया और रणजीत सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजों को यहाँ से बाहर खदेड़ने का प्रयास करते रहे।
अगस्त 1857 में एरिनपुरा में जोधपुर लीजन द्वारा विद्रोह कर देने पर आऊवा ठाकुर व उनके सहयोगी मारवाड़ व मेवाड़ के सामन्तों को अंग्रेजों के विरूद्ध उठ खड़े होने का चिर प्रतीक्षित अवसर प्राप्त हो गया। इनमें आसोप के शिवनाथ सिंह, आलनियावास के अजीत सिंह व गूलर के विशन सिंह के नाम उल्लेखनीय है। केप्टन निक्सन के अनुसार जब ये सैनिक जोधपुर राज्य से होकर गुजर रहे थे तब आऊवा ठाकुर ने उन्हें अपनी सेवा में आने की पेशकश की। अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने वाले इस अभियान में बांता, भिमाळया, रडावास, लांबिया, बीजावास, सलूम्बर, कोठारिया, लसाणी, आसींद व रूपनगर ठिकाने थे।
जोधपुर महाराजा तखतसिंह ने अपनी सेना को कम्पनी की सेवा में भेजकर आऊवा के विद्रोह को दबाने में पूरी ताकत झौंक दी। 07 सितम्बर 1857 को अनाड़सिंह व कुशलराज सिंघवी ने आऊवा पर हमला कर दिया जिसमें ए.जी.जी. लॉरेन्स ने लेफ्टिनेंट हीथ कोट को पाँच सौ घुड़सवारों सहित अनाड़ सिंह को सामरिक सहायता उपलब्ध करवायी परंतु आऊवा कहाँ झुकने वाला था। ए.जी.जी. लॉरेन्स, जोधपुर को पॉलिटिकल एजेन्ट केप्टन मॉन्क मेसन ने अपनी विदेषी बटालियन, सिंघवी कुशलराज व मेहता छतरमल जोधपुर की सेना का प्रतिनिधित्व करते हुए आऊवा पहुँचे परंतु आऊवा के योद्धाओं ने गोरों की फौज के दाँत खट्टे कर दिए। आसोप ठाकुर शिवनाथ सिंह ने गोरों की फौज पर हमला कर तोपें छीनली और स्वयं युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। इस ऐतिहासिक घटना की साख यह लोक गीत भरता है -
आऊवौ नै आसोप धणियाँ मोतियां री माळा ओ
बारै नांखौ कूंचियां तोड़ावो ताळा ओ
झल्लै आऊवौ
व्है हो झल्ले आऊवौ
आऊवौ धरती रौ थांबौ ओ
झल्लै आऊवौ
पॉलिटिकल एजेंट मॉन्क मेसन ए.जी.जी. लॉरेन्स की मदद के लिए सीधा आऊवा की सेना के बीच पहुँच गया जहाँ वह आजादी के दीवाने सिपली के ठाकुर सगत सिह के हाथों मारा गया और फिरंगी का सिर काट कर गढ़ के द्वार पर लटका दिया गया।¹
इस लड़ाई में मेसन के रण खेत रहने का लोक मानस पर गहरा असर पड़ा। आम जन को यह एहसास हुआ कि वो भी बड़ी से बड़ी ताकत से लड़ सकते हैं। इसी बात को रेखांकित करती यह होरी आज भी मारवाड़ में गायी जाती है -
ढोल बाजै थाळी बाजै
भेळौ बाजै बांकियौ
अजंट ने मारनै दरवाजे नांखियौ
जूंझै आऊवौ
हां रै जूंझै आऊवौ
आऊवौ मुलकां में चावौ औ
जूंझै आऊवौ
जब बडे़-बड़े राजा अंग्रेजों के साथ थे ऐसे में आऊवा ठाकुर कुषाल सिंह ने अंग्रेजों से लोहा लिया
मोटा मोटा ठिकाणा अंगरेजा लारै बोले ओ
ठिकाणा रो ठाकर व्है ने कोनी डरियो रे कारण भाटा रौ
गोरों से लोहा लेने को वीर उतावले हो रहे थे
ऊंटा माथे अरठिया हस्ती रे माथे तोपां रे
अरे लावो-लावो कूंचिया तोड़ावो ताळा रे
बगतर बारे लो
हां बगतर बारे लो
झगड़े री म्हारे मोटी मन में ओ
बगतर बारे लो²
होली के दिनों में गाये जाने वाले लोकगीत का उदाहरण देखिए -
वाणिया वाळी गोचर मांय
काळो लोग पड़ियो ओ
राजाजी रे भेळो तो फिरंगी
लड़ियों ओ
काळी टोपी रो
हे ओ काळी टोपी रो
फिरंगी फेलाव कीधो ओ
काळी टोपी रो
बारली तोपां रा गोळा
धूड़गढ में लागे ओ
मांयली तोपां रा गोळा तंबू तोड़े ओ
झल्ले आउवो
हे ओ झल्ले आउवो
आउवो धरती रो थांबो ओ
झल्ले आउवों
मांयली तोपां तो छूटे आडावळो धूजे ओ
आउवे रा नाथ तो सुगाळी पूजे ओ
झगड़ो आदरियो
राजाजी रा घोड़लिया काळां रै लारै दोड़ै ओ
आउवे रा घोड़ा तो पछाड़ी तोड़े ओ
झगड़ौ व्हैण दो
हे ओ झगड़ो व्हैण दो
झगड़ा में थांरी जीत व्हैला ओ
झगड़ो व्हैण दो
भावार्थ- आऊवे की धरती पर फिरंगी चढ़ आया है। उसको खदेड़ने की जरूरत है। हमारे राजा भी फिरंगी का पक्ष लेकर उसके साथ आ डटे हैं। वह गोरे रंग वाला और काली टोपी वाला है। निरंतर फैलाव कर रहा है।³
छः दिन तक घमासान युद्ध चला। युद्ध का भार ठाकुर पृथ्वी सिंह ने अपने ऊपर लिया और कुषाल सिंह को आबू के पहाड़ों में सुरक्षित भेज दिया। आऊवा के ठाकुर को सुगाली माता का इष्ट था। युद्ध में आखिर छल कपट की जीत हुई। परंतु उन्होंने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार नहीं की। आज भी जनता उन वीरों की कुरबानी को याद करती है।
अंग्रेज अपनी सैन्य शक्ति और कूटनीति के बल पर भारतीय शासकों को एक-एक कर अपने चंगुल में फँसाने जा रहे थे। जसवंत राव होल्कर जो तत्कालीन समय में एक शक्तिशाली शासक के रूप में जाना जाता था अंग्रेजों द्वारा पीछा करने पर अपना राज्य छोड़ कर भरतपुर राज्य के डीग के किले में जाकर शरण ली। डीग के पास होल्कर व अंग्रेज सेना के बीच भंयकर युद्ध हुआ जिसमें 643 योद्धा काम आये जिनमें 22 अंग्रेज अफसर थे । होल्कर की करीब-करीब पूरी सेना काम आ गई। डीग का किला भरतपुर राज्य के अंतर्गत आता था और होल्कर को राजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों को नहीं सौपा। अंग्रेजों को मजबूर होकर 1805 में संधि करनी पड़ी और होल्कर सही सलामत पंजाब की ओर चला गया। राजा रणजीत सिंह ने स्वतंत्रता के पुजारी का मान रखा। इसी सम्बन्ध का यह गीत फाल्गुन मास में चंग और डफ के साथ आज भी गाया जाता है
आछो, गोरा हट जा
राज भरतपुर को रे गोरा हट जा
भरतपुर गढ़ बांको, किलो रे बांको
गोरा हट जा
यू मत जाणी रे गोरा लड़े रे बेटो जाट को
ओ कंवर लड़े रे राजा दशरथ को रे
गोरा हट जा
संवत् 1895 में अंग्रेजो का विरोध करते हुए उनकी छावनियों को लूट कर आम जन में बाँटने वाले स्वतंत्रता सेनानी डूंगजी जवारजी (डूंगर सिंह व जवाहर सिंह) को लोक गीतों में गाया जाता है। उनकी लोक गाथा गायी जाती है उसी का एक उदाहरण प्रस्तुत है।
फिरंगी तो पाछो फिर्यौ,
स कोइ करी न ज्यादा बात
नाय भरोसे के करै स कोइ
या रांघड़ की जात⁴
मारवाड़ रियासत ने संधि की शर्तो के अनुसार कंपनी को कर चुकाना तय किया । कई दिनों तक रियासत ने कर देने के मामले को लंबित रखा तब कंपनी का दबाव आने लगा तो तय किया कि सांभर व नावां की नमक की खानों की आमदनी दे दी जायेगी। जब वह भी नहीं दी गयी तो कंपनी ने नमक उत्पादन क्षेत्र नांवा व सांभर को अपने कब्जे में ले लिया। बाजार में नमक की कमी आ गई। आम आदमी को नमक खाने को नहीं मिला उसी घटना की साख भरता यह लोकगीत है-
म्हारौ राजा तो भोळो
सांभर तो दे दी अंगरेज ने
म्हारो टाबर भूखो
रोटी तो मांगे तीखा लूण री
इसी तरह जब अंगरेज पहली बार अमर कोट (अब पाकिस्तान) में जमीन की पैमाइश करने गये तो वहाँ के शासक रतन राणा ने अंग्रेजो को जमीन पैमाइष नहीं करने दी और अंग्रेज अधिकारी का सर काट कर टांग दिया। लोकगीतों में रतन राणा की जन प्रिय छवि आज भी गायी जाती है-
म्हारा रतन राणा
अेकर तो अमराणे
घोड़ो फेर
अमराणे में घोर अंधार
अंग्रेजों की चाल को लोक मानस ने भी खूब अच्छी तरह में समझ लिया था-
देस में अंगरेज आयो कांई कांई हुनर लायो रे
फूट न्हांखी भायां में बेगार लायो रे काळी टोपी रो
अंगेजी शिक्षा पद्धति ने बाबू वर्ग को जन्म दिया-
देस में अंगरेज आयो जबरो हूनर लायो रे
कलम न चौपनिया लायो रे काळी टोपी रो
घर-घर रा कंवळा काळा कीधा ओ काळी टोपी रो
स्वाधीनता आंदोलन की शुरूआत जिन लोगों ने अपने आत्म बलिदान से की। गोरी फौजों से सामना किया और उन्हें भारत भूमि की वीरता का परिचय दिया वे वीर हमारे लिए वंदनीय हैं। उनके संघर्ष की साख भरते ये लोकगीत हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा बनना चाहिए ताकि हमारी लोक संस्कृतिक धरोहर में वर्णित इतिहास की जानकारी आने वाली पीढ़ी को मिल सके।
सन्दर्भ
- स्वाधीनता संग्राम में राजस्थान की आहुतियाँ (1805-1947) डॉ. कन्हैया लाल राजपुरोहित साइन्टिफिक पब्लिशर्स जोधपुर सन् 1993 पृष्ठ संख्या 51 , 53
- राजस्थान का होरी एवं लूर साहित्य : डॉ. जयपाल सिंह राठौड़, सुधन प्रकाशन जोधपुर सन् 2002 पृष्ठ संख्या 90-92
- गेरा हट जा स्वतंत्रता आंदोलन की राजस्थानी प्रेरक रचनाएँ सम्पादक - नारायण सिंह भाटी राजस्थानी शोध संस्थान चौपासनी जोधपुर सन् 1997 पृष्ठ संख्या 71
- राजस्थानी गंगा (पत्रिका) डूंगजी जवाहर जी विषेषांक प्रधान संपादन - डॉ. किरन नाहटा, राजस्थानी साहित्य एवं संस्कृति जनहित प्रन्यास अप्रेल - दिसम्बर 2013 पृष्ठ संख्या 30
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