राजस्थान की कालबेलिया जाति जिन्हें सपेरा, जोगी या नाथ कहते हैं एक विशिष्ट जाति हैं जो नाथ सम्प्रदाय के लोक में व्याप्त चिह्नों के रूप में पहचानी जा सकती है। विषधारी सर्प को बीन बजाकर अपने हाथ पर फन मारते अुए खिलाना किसी चमत्कार पूर्ण कार्य से कम नहीं है । कालबेलिये इस विद्या में पारंगत हैं।
‘हिंदी साहित्य का इतिहास' के अध्ययन से हमें जानकारी मिलती हैं कि -
‘गोरखनाथ के नाथ पंथ का मूल भी बौद्धों की वज्रयान शाखा है गोरख ने अपने पंथ का प्रचार देश के पचमी भागों में राजपूताने और पंजाब में किया। नाथ पंथ के जोगी कान की लौ में बड़े-बड़े छेद करके स्फटिक के भारी भारी कुंडल पहनते हैं इससे कनफटे कहलाते हैं।¹
नाथ सम्प्रदाय प्राचीन माहेश्वर मत के अंतर्गत विकसित एक शैव सम्प्रदाय है, मत्स्येन्द्रनाथ के उद्धार या परावर्तन के बाद ही शाक्त सम्प्रदाय और शेष सम्प्रदायों ने भी, गोरखनाथ का नेतृत्व स्वीकार कर लिया। इसमें से गोरखनाथी पंथ विशेष चर्चा का विषय बना, जिसे 'कनफटा' कहते हैं। कान चिरवा कर कर्ण कुण्डल धारण करना तथा वेगा में मेखला, श्रृंगी, सेली, गूदरी, खप्पर, मुद्रा, बाघम्बर, झोला, चिमटा या त्रिशूल आदि धारण करना इनकी विशेषता थी ।²
जिनके अवशेष नाथों और कालबेलियों दोनों में अब भी मिलते हैं। हिन्दी साहित्य कोष में नाथ शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया हैं
“योग साधना के द्वारा अपनी काया को अमर करने और विभिन्न चमत्कारों का प्रदर्शन करने के लिए ये नाथ योगी प्रख्यात थे।” जनता पर इन नाथ - योगियों का बहुत गहरा प्रभाव था । देश के विभिन्न भागों में आज भी योगी जातियाँ पायी जाती हैं, उनमें अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं।³
हिन्दी साहित्य के आदिकाल में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'नाथ सिद्धों की बानियों में तो और भी स्पष्ट कर दिया है -
नाथ सम्प्रदाय
- शिव (आदिनाथ)
- मत्स्येंद्रनाथ
- गोरखनाथ
- पावनाथ
- जालंधरिया
- कानिपा
- कालबेलिय
- वामारंग (?)
नाथ परम्परा से ही कालबेलियों की उत्पत्ति हुई है। गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित योगि-संप्रदाय नाना पंथों में विभक्त हो गया है। मुख्य पंथों का संबंध शिव और गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित पुराने संप्रदायों के साथ स्थापित किया जाता है।
(1) जैपुर के पावनाथ
- जालंधरिया
- पा-पंथ (?)
- कानिपा - गोपीचंद्र इसी शाखा के सिद्ध है। गोपीचंद का नाम सिद्ध संगरी है। सपेरे इनको अपना गुरु मानते हैं।⁵
इस प्रकार कालबेलियों की उत्पत्ति हिन्दी साहित्य में वर्णित नौ नाथों में से ही हुई है।
ये लोग अपने नाम के पीछे आज भी 'नाथ' शब्द का प्रयोग करते हैं। राय बहादुर मुंशी हर दयाल सिंह ने मरदुमशुदारी राजमारवाड़ की रिपोर्ट ई. सन् 1891 में 'बीक्लास' कौमों में कालबेलियों का स्थान निर्धारित करते हुए वर्णन किया है-
"इनका गुरुद्वारा गाँव ढीकाई परगने जोधपुर में है जहाँ ये अपने गुरु कनीपावजी की गद्दी मानते हैं। कनीपावजी जलंधरनाथजी के 12वें चेले थे बड़े करामाती हुए वे सांप और बिच्छू से दुनिया को दुखी देखकर उन्हें पकड़ लेते थे और उनके काटे हुओं का इलाज जन्तर-मन्तर और जड़ी बूटी से करते थे उनके चेलो ने भी वही धंदा जारी रक्खा सो अब तक कालबेलिये सांपों को पकड़ते और खिलाते हैं और उनको खा भी जाते हैं इसीलिए ये भी नाथों की न्यात से अलग किये गये है। ⁶
राजस्थानी शब्द कोश में 'कालबेलिया' शब्द का अर्थ इस प्रकार दिया गया है कालबेलियौ - पु. 1 संपेरा, गारुडी । 2. काळबेलिया जाति का व्यक्ति ।⁷ वहीं मानक हिन्दी कोश में सँपेरा शब्द का अर्थ दिया गया हैं —
सँपेरा पु. (हि. साँप + एरा (प्रत्य.) (स्त्री संपेरिन ) वह जो साँप पकड़कर पालता और लोगों को उनके तमाशे दिखाता हो। मदारी।⁸
जोगी- पु. (सं. योगी) 1. नाथ पंथी जंगम शैव साधु । 2. इस वर्ग के कुछ गृहस्थ जो प्रायः सांरगी पर भजन गाकर भीख माँगते हैं। 3. सम्पूर्ण जाति का एक राग जो प्रातः काल गाया जाता है। जोगिया राग। 4. रहस्य संप्रदाय में, मन / 5. दे. योगी ।⁹
कोमल कोठारी ने कालबेलियों के बारे में लिखा है—
Kalbelia : Nomadic Jogi group providing technical Services.¹⁰
लोक में इनसे सम्बंधित एक कथा प्रचलित है—- कानिफनाथ के कुछ उदण्डी शिष्य व असमाल जोगी भी भंडारे में शामिल हुए। गोरखनाथ को चमत्कार दिखाने की इच्छा से मन ही मन में उन्होंने खप्पर में साँप गोयरों की कामना कर दी। फलस्वरूप खप्पर पर सर्प गोयरे दौड़ने लगे। चारों ओर हाय तौबा मच गयी। सभी देवी-देवता ऋषि मुनियों साधु सन्तों व नाथों ने मिलकर इस कृत्य की निन्दा की । कानिफनाथ ने सर्प को वश में करके असमाल जोगी के गले में डाल दिया और कार निकाल कर बाहर कर दिया इसी अभि प से भी इन्हें कार + बारिया (कालबेलिया) कहा जाता है।
कानिफनाथ ने अपने चेलों से नाराज होने पर उन्हें पाव विद्या ही दी यानि पूर्ण विद्या नहीं दी परंतु कालबेलियों ने अपनी साधना से इस पाव विद्या को सवा सेर विद्या में बढ़ोतरी कर दी। जिसमें तंत्र-मंत्र, शमशान जगाना, भूत-प्रेत को वश में करना, साँप पकड़ना, विष का झाड़ा देना, पूंगी बजाना सम्मिलित हैं।
कालबेलियों को गुरु के निम्न आदेश है –
- छड़ी छेड़ना नहीं
- पड़ी उठाणा नहीं
- छाड़ छेड़ करना नहीं
- छोटी को बहन और बड़ी को माँ मानना
- सदैव माँग कर खाना
- गुरु को कभी अपशब्द नहीं कहना
कालबेलिया यानि साँप साक्षात काल ही है उसको भी ‘बेलि’ यानी मित्र बना लिया है।
कालबेलियों के कुल बारह गोत्र है :
बामणिया, सोलंकी, पड़ियार, भाटी, राठौड़, च्वहाण, दहिया, दुपगा, डगळा, पंवार, देवड़ा और सिंदणिया।
सोलंकी गोत्र के कालबेलिये पत्थर से घट्टियाँ (चक्की के पाट) बनाने का काम करते है। कालबेलिया के कुछ गोत्र बांस की छबड़ी बनाने का काम भी करते हैं। और कुछ देशी जड़ी बूटियाँ बेचने का भी।
लोक परम्पराएँ और रीति रिवाज
कालबेलियाँ जाति उपने जीवन से संतुष्ट और प्रकृति के बीच रहना पसंद करती है।कालबेलियों में दूसरी जातियों से कुछ बिन्दुओं पर समानता तो कुछ पर विशिष्टता भी हैं। इनके यहाँ जन्म को सामान्य माना जाता है। परंतु कन्या का जन्म शुभ माना जाता है। परम्परागत विद्या में ये पारगंत रहे हैं परंतु औपचारिक शिक्षा नहीं के बराबर रही है।
इनमें बाल-विवाह नहीं होता।
लड़के-लड़की के बालिग होने पर लड़के वाले लड़की के माता-पिता से सगाई की बात करते हैं। सगाई पक्की होने से पहले उस लड़के को लड़की के घर तीन साल तक रहना होता है यह उसका परीक्षा काल होता है। इस दौरान उसके लिए कुछ नियम लागू होते है -
- घर का हर कार्य करेगा परंतु डेरे से दूर रहेगा।
- लड़की से कभी बात नहीं करेगा और न सम्पर्क करने का प्रयास करेगा।
- ससुराल वालों का आदर करेगा।
- उनके सामने ऊँचे स्थान पर नहीं बैठेगा।
- किसी भी प्रकार का नशा नहीं करेगा।
- गाँव बस्ती से माँग कर लायी गई सामग्री, की गई शिकार और आय ससुराल में देगा।
- संवाद उचित माध्यम से ही होगा। सास-ससुर से सीधी बात-चीत नहीं करेगा और कोई बात करनी हो तो छोटे बच्चों के माध्यम से अपनी बात ऊपर पहुँचायेगा।
- इस दौरान यदि लड़का लड़की से सम्पर्क करता हुआ पाया जाता है तो सगाई टूट जाती है। उसे परीक्षा में विफल माना जाता है और उसे दंडित किया जाता है।
समय के बदलाव के साथ ही अब इन नियमों में थोड़ी शिथिलता दी गई हैं।
शादी रस्म पर व्यवहार के 1400/- रुपये लगते हैं जिनमें 400 रुपये सगाई के और 1000/- रुपये शादी के वक्त के हैं।
चंवरी में वर-वधू के सामने माता-पिता नहीं बैठते वे कुछ दूरी पर पीठ फेर कर बैठते हैं।
मेघवालों के और कालबेलियों के गुरु एक ही होते हैं जिन्हें ‘गुरुड़ा’ कहा जाता है। वही इनके विवाह की रस्म पूरी करवाता है।
दहेज में एक कुत्ता और लाहौरी नस्ल का गधा खास तौर पर दिया जाता है।
इनकी कुल देवी ‘मालण माता’ है जिसका मुख्य स्थान जांजरा जैसलमेर के खूड़ी के पास है।
वैसे कई कालबेलिये हिंगलाज देवी को अपना इष्ट मानते है।
शिकार
ये शिकार के बड़े शौकीन रहे हैं। हिरण, खरगोश, तीतर या अन्य वन्य प्राणि की ये लोग शिकार करते है। सियार को ये लोग बड़े चाव से खाते हैं, इसके अतिरिक्त गोपाटड़ा व सर्प को भी उसका सिर काटकर खा जाते है। ये शराब के भी शौकीन होते हैं —
नृत्य व गायन
कालबेलिया जाति की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार है -
(1) विशेष प्रकार का अंजन आँखों में डालने से कालबेलिया कभी अंधा नहीं होता।
(2) सर्प दंश से कालबेलिये को मरने नहीं दिया जाता।
(3) इस जाति की महिलाएँ सर्प को नहीं पकड़ती।
(4) कालबेलियों के बाल सफेद नहीं होते।
(5) हरिजन व धोबी जाति को छोड़कर सभी जाति के घरों से ये भीख माँग लेते हैं।
कालबेलिया जाति की महिलाएँ मांगलिक एवं वैवाहिक उत्सवों पर विभिन्न प्रकार के नृत्य करती हैं। नृत्य एकल, युगल एवं सामूहिक होते हैं। प्रायः सभी नृत्यों के साथ गीत गाये जाते है। नृत्य के समय पुरुष वर्ग पूंगी (बींण) खंजरी व मंजीरे बजाते हैं तथा महिलाएँ इन वाद्यों की संगत पर बड़ा मनोहारी एवं लयात्मक नृत्य करती हैं। नृत्य के साथ गाये जाने वाले गीतों में केसरियो बनो‘ ईडांणी, हिचकी, रूमाल, बीरो, बिणजारों आदि प्रमुख है। होली के उत्सव पर इस जाति की महिलाएँ चंग पर नृत्य करती है।
कालबेलिया अपने नृत्यों की लय व ताल के लिए पूंगी, खंजरी, चंग, मंजीरा व धुरालिया लोकवाद्यों का प्रयोग करते हैं।
वेश-भूषा
नृत्याँगनाएँ घेरदार घाघरे के ऊपर लंबी कुर्ती पहनती हैं जिस पर काँच व कशीदाकारी का सुंदर काम किया होता है। ये आकर्षक एवं बहुरंगी ओढनी ओढ़ती हैं। कालबेलिया महिलाओं का केशविन्यास विशेषता से परिपूर्ण होता है। बालों को राल द्वारा बड़े ही कलात्मक ढंग से चिपकाती हैं। आजकल इनकी वेशभूषा में भी बड़ा बदलाव आ गया है। पुरुष कलाकार गेरुंए रंग का साफा धोती व लंबा कुर्त्ता पहनते हैं।
जोगी महिलाएँ चाँदी के बने आभूषण पहनती हैं। माथे पर बोर, गले में कंठी, हंसली, एवं लौंग व चीड़ों से गूंथी हुई विशेष प्रकार की माला जो लौगारी कहलाती है कानों में टोटीयें झूमके, हाथों में बाजूबंद, हथफूल व चूडा धारण करती हैं। लंबी कुर्ती कांचली विवाहित महिलाएँ ही पहनती हैं। गुलाबो, महादेवनाथ जयपुर व कालूनाथ जोधपुर के नृत्य दलों ने लोक नृत्य प्रस्तुति के क्षेत्र में विशेष ख्याति अर्जित की है।
रिवाज
इनमें ‘नाता’ (पुनर्विवाह) की प्रथा है जो शनिवार की रात को किया जाता है इस दौरान कोई गाना बजाना और खाना नहीं करते।
मुर्दे को दफनाने का रिवाज है। कान में चीरा और मुद्रा है और हिंगलाज पुरसी हुई है तो उसको बैठी समाधि दी जाती है और सामान्य है तो सीधा लेटाकर दफनाते हैं। दफनाये हुए स्थान पर चबूतरा या छतरी बनायी जाती है। बारह दिन तक अंधेरे में ‘मडप’ जोत की जाती है। कालबेलियों में जीवित खर्च (मृत्युभोज) किया जाता है जिसमें शक्कर, घी व रोटी आने वालों को खिलाई जाती है।
सामाजिक न्याय व्यवस्था
किसी भी प्रकार के विवाद की स्थिति में न्यात के पंचों द्वारा किया गया निर्णय मान्य होता है। विशिष्ट खान-पान व शारीरिक संरचना के चलते कालबेलिया लड़कियाँ ‘लोक नृत्य’ करती हैं जिसे कालबेलिया नृत्य कहते हैं। गुलाबो ने इसी क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाई हैं।
विशिष्ट अवसरों पर गाये जाने वाले लोक गीत इनके जीवन संघर्ष और उन्मुक्त जीवन की कथा कहते हैं। रात भर पूंगी के साथ गाते हैं और घुँघरु बाँधकर नाचते हैं।
होली के दिनों में इस जाति के महिला-पुरुष चंग मंजीरा लेकर गली-मोहल्लों में हर रोज ‘तिंवारी’ लेने निकलते है। चंग बजाते हैं जिस पर युवतियाँ नाचती है- श्रद्धानुर लोग कुछ रुपये इनको नेग रूप में देते हैं। पूरे फाल्गुन में विशेष रूप से गायन-वादन के साथ ये लोग घुले-मिले रहते हैं।¹²
कालबेलिया लोक गीत
पश्चिमी राजस्थान के लोक देवता रामदेवजी के दर्शनार्थ समूचे भारत वर्ष के श्रद्धालु आते हैं। लोक देवी देवताओं की पूजा अर्चना भी पौराणिक देवी देवताओं जैसी नहीं सहज और सरल ही मन की पीड़ा को व्यक्त किया जाता हैं कालबेलिया जाति वैसे तो हिंगलाज माँ की पूजा अर्चना करते हैं, शुभ अवसर पर गणेश को मनाते हैं और संकट की घड़ी में रामदेवजी का स्मरण कर अपनी पीड़ा हर लेने का आह्वान करते हैं-
इस गीत में इसी बात का वर्णन मिलता हैं
साम्है सुरजी ये खेजड़ी रे बाबा
थे तो रे फरूके अजमाल धजा रो धणी
रामदेजी थारौ मेळौ रे भरीजै ओ राम
थे म्हारै आईजौ रे पावणा रे बाबा
भरनै भादवा री रात
धजा रा धणी रामदेजी
थारौ मेळौ रे भरीजै औ राम
देसान परदेसा रा आवै रे जातरू बाबा
लावै रे लाडलड़ा री जात रे
धजा रा धणी रामदेजी
थारौ मेळौ रे भरीजै ओ राम
भावार्थ-ः पूर्व दिशा में खेजड़ी का पेड़ हैं और उस पेड़ पर रामदेवजी की ध्वजा फहरा रही हैं। हे बाबा! आप हमारे घर पाहुने बन कर आना। भाद्र पद महीने में। देश विदेश के श्रद्धालु आते हैं। पुत्र प्राप्ति होने पर आपको शीश नवाने आ रहे हैं।
स्त्री जीवन का सुख मातृत्व भाव में माना जाता हैं। प्रस्तुत लोक गीत में एक वंध्या लोक देवता भैरव से प्रार्थना करती है कि -
म्हारी दूधां नहीं भीजी कांचळी
भैरूं बाबा दूधां दूधां नहीं भीजी कांचळी
भैरूं बाबा गोदी में नहीं रमियौ बाळ
भेरूं बाबा लाज सरम राखजौ अे
ओ भैरूं बाबा झीणा झीणा बाजै भैरूं घूघरा
भैरूं बाबा घूघरियां री बाजै है घमरोळ
म्हारी लाज सरम राखजौ
भैरूं बाबा ऊबी म्हें तो सरवरिये री तीर
सासूजी मे‘णो म्हनै बोलियौ
भैरूं बाबा ऊबी ऊबी आंसूड़ा रळकाव
म्हारी लाज सरम थे राखजौ
भावार्थः- हे भैंरू! मेरी दूध से कंचुकी नहीं भीगी अर्थात् मेरे कोई संतान नहीं हुई। मेरी गोद में कोई बालक भी नहीं खेला हे भैरू! आप ही मेरी लज्जा रखना। हे भैंरू! मेरी सास मुझे दे रही है ताने मुझे इस बात पर रोना आता है आप ही मेरी लज्जा रखना
एक स्त्री की पीड़ा इस गीत में दर्द बनकर व्यक्त हुई हैं।
इनमें प्रेम और विरह के गीत सर्वाधिक प्रचलित हैं इस गीत में नायक नायिका के विरह का वर्णन है -
थांरी तो अवळूंड़ी ढोला म्हांई रे करांला
थारौंड़ी अवळूंड़ी रे घरे आव
म्हारै बाजूडै़ रे बंद री लूंबा म्हारा परदेसी
थूं तो अळगै रो खड़ियोड़ो रे घरे आव
भावार्थ -ः प्रिय तुम्हारी तो याद मैं करुंगी मेरे बाजूबंद की लूम मेरे प्रिय परदेसी तुम दूर से चल कर शीघ्र घर आवों!
मारवाड़ में हर दूसरे वर्ष अकाल पड़ते रहे है। पानी और अनाज के अभाव में जन जीवन त्राहि-त्राहि करने लगता है इस गीत में अकाल की विभीषिका का वर्णन हैं ऐसी विषम परिस्थितियों में गायों ने अपने बछड़ों को छोड़ दिया और माँ ओ ने अपने बच्चों को। और खाने को भी मोटा अनाज और भूसा मिला यह गीत उसी विभीषिका का वर्णन करता हैं-
फैर मती आजै रे छाईसा वाळी साल
गायां चाली माळवै ने लारै बरसै मेह रे
फैर मत आजै रे छाईसा वाळी साल
नैना कण री बाजरी ने मोटे कण रो डूर रे
मोटे मोटे लोगां रा उतर गया नूर
छाईसे री साल में भांबी बणिया मेट रे
फैर मती आजै रे छाईसा वाळी साल
गायां छोड्या बाछड़िया लुगायां छोड्या बाळ रे
फैर मत आजै रे छाईसा जेड़ी साल
जीवन संघर्ष से ही बनता है यहाँ सुख बादल की छाया सदृश है बहिन अपने भाई से मन की बात करके मन हल्का करना चाहती है परिवार में रिश्ते नाते तो बहुत है परंतु माँ जाया भाई नहीं मिलता-
बड़ले री छय्यां करौ नीं दिलडै री जामण जाया बातड़ी
थारै दिल री बातड़ली तो जियौ वीर म्हारा
लोभीड़ौ संसार म्हारोड़ी दिलडै री बैन म्हारी बातड़ी
चालू वीरा चालूं चालूं रे जामण जाया
थारोड़ी महलां, सूतां ने पोढ़ा दूं रंगियै पालणै
अेरा बाई रा पूतड़ला तो जीयौ वीर म्हारै
आंगण रे जामण रो जायोड़ी वीर म्हांनै नीं मि‘लै
मिलसी तो मिलसी रे वीर म्हारा
लोकड़लै संसार
माई रो जायोड़ो जुग में वीरौ नीं मिलै
पूंगी (बीन) बजाना कालबेलियों की विशेष लोक कला हैं। जिस पर लोकगीतों की सुरीली धुनें रेत के टीले पर बैठ कर जब बजाई जाती है तो बड़े बड़े मंच की प्रस्तुतियाँ फीकी लगने लगती है। लोक वाद्य पूंगी आकड़े जैसे कड़वे पौधे से बनती है और उसमें से निकलने वाली धुनें उतनी ही मीठी। इस पूंगी पर सपेरे की अंगुलियाँ नाचती है जिस पर साँप भी नाचता है और कालबेलिया युवतियाँ भी बल खाती नाचती है प्रस्तुत गीत इसी का उदाहरण है-
मीठी घणी बोले रे बालमा
आकड़ियै री पूंगी म्हारा बालमिया मीठी घणी बोले रे
म्हारोड़ौ दिल मो‘यौ जी जावै थारोड़ै सुरतड़ी ओ राम
आयौ रे रइजै रे दिलभर आयौ रइजै रे हां रे म्हारे
सौंदर्य प्रसाधन सामग्री का नयी नवेली दुल्हन को बड़ा चाव रहता है। प्रिय अपनी प्रिया के लिए इत्र लाया है। यौवन से मदमाती प्रिया मुझे तेरे महलों में आने दे-
अंतरियौ लाया अे बाळक बनी म्हेलां में आवा दे
थारौ जोबन भरियौ डील म्हेलां में आवा दे
बादल के रंग जैसी आढनी मेरे लिए रंगा कर रख लेना। मुझे न ओढनी की इच्छा है न चीर की। मेरा जी तो दुपट्टे में जो तुम्हारे साथ ओढना है मेरे प्रिय मेरे लिए ओढनी रंगा लेना-
बादळ भर री ओढणी रंगाई ले जो जी
नहीं रे ओढू ओढणी म्हैं
नहीं रे ओढूं चीर
साळूड़ा में सींया मरू
केसरिया ओ राज
इनकी दोस्ती भी बड़ी अजीब है प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रात में’ ‘हलकू’ की दोस्ती ‘जबरे’ कुत्ते से होती है वैसे ही इनके गधा रसिया है और कुत्ता यार-
गधौ थारौ रसियौ ने कुत्तौ थारौ यार
धर महारा धरमी ओढणी ओ राज
प्रिया के हाथ से पीना और भी मधुकर लगता है। इसीलिए उस बात की याद आ रही है। तुम्हारी बोली प्यारी लगती है मुझे। काँच वाले प्याले में रेत के टीले पर बैठकर जो दारू पी उसकी खुमारी अब तक चढ़ी हुई है। जिस तरह पके फलों को तोता चोंच से चखता है उसी प्रकार तुम भी मेरे सेज के सुग्गे हो -
थारी बोली प्यारी रे हद लागै रे
हांजी म्हारा लालजी काच वाळी रे लालू
प्यालै में रे धाड़ायती धोरे वाळो रे दारू पीओ रे
थूं तो सेजां रा रे सुवटिया
सालू तो मेरा ले गयी रात को कहाँ रह गयी थी। बाग में प्रिय मिल गये वहीं बातों ही बातों में खो गयी। अब तो खिड़की खोल दे। सालू में ठिठुर गयी खिड़की खोल दे-
हाळूड़ौ तो म्हारौ ले‘गी रात कठै रहगी अे
बागां में कंवरजी मिलिया बातां लागी रे
खिड़की खोल दे
बोल खिड़की खोल दे साळूड़े में सींया मरगी रे
खिड़की खोल दे
प्रिय मिलन की छटपटाहट है और उसकी जब याद आती है तो वह बेसुध हो जाती है उसकी याद में वह सीधी होकर सो रही है लेकिन कोई दूर तक आता नजर नहीं आता इसलिए विरह की पीड़ा लिए वह गधों में जा-जाकर रोती है-
थांरी मन में आवै सागरा
सवळी है ने सोजू रे
सोजू रे जोगी सागर नाथ
घाटोड़ै रा रेवासी रे
थांरी मन में आवै सागरा
गधिया में जाय जाय रोती रे
रोती रे जोगी सागर नाथ
प्रेम अंधा होता है। जिस तरह कुएँ पर पानी निकालने वाली रस्सी आते जाते पत्थर को घिस कर निशान बना देती है। वैसे ही इस गीत में प्रेमिका ने प्रेमी के यहाँ आते जाते रास्ता बना दिया है -
तेरे कारण प्रिय छोटे बच्चे भी छोडू रे-
लवारिया रे थारोड़ै कारणियै म्हें तो ऊजड़ डांडी घाली रे
नैना टाबर छोडूं रे लवारिया रे
हे प्रिय! तुम्हारे ही कारण मैंने ‘जोगी पा’ लिया है-
हां जी रे लालूसा थारे रे कारणियै
म्हें तो जोगी पो लीयौ रे
हे प्रिय! तेरी और मेरी यह प्रीत मरने पर ही छूट सकती है अर्थात् हमारे प्यार का बंधन अटूट है —
रिड़माल जोगी म्हारा थारी रे म्हारी परीत रे रिड़माल
मरियां पछै छूटे रे
तुम्हारे रसीले नयनों में भांग घुल रही है। भांग का नशा भी मदमस्त कर देता है। रंग भरा दीपक जल रहा है-
थारै डाबरियै नैणां रे मांही घुळ रही है भांग
रंग भर दिवलौ जग रह्यौ
“जो जनजातियाँ आधुनिकता और भौतिकता के सम्पर्क में है, उनके आचार-विचार और चिंतनधारा में यत्किंचित परिवर्तन स्वाभाविक हैं, फिर भी उनके जीवन में रची बसी लोक-संवेदनाएँ लोक-कथाएँ और लोक-गीत आदि अपनी अक्षुण्णता बनाए रखते हुए उनके जीवन के विविध आयामों, आस्था-विश्वासों को उद्घाटित करने में अपना योगदान देते रहेंगे।¹³
‘लोक जीवन में जितना प्रभाव लोक गीतों का होता है उतना किसी भी अन्य भाषा या साहित्य का कदाचित् नहीं हो सकता
’¹⁴
कालबेलिया जाति लोक के बीच रहकर अभावों को झेलती लोक कलाओं की संवाहक हैं। ये गाँव के बाहर किसी ढाणी में या तालाब किनारे डेरे में अपना यायावर जीवन व्यतीत करते हैं। कालबेलिया लोक नृत्य अंतराष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता है परंतु इनकी कला को पोषित करने वाले अब नहीं रहे। केवल मंच प्रदर्शन के दौरान ही इनकी याद आती है अन्यथा तिलक छापा लगाये फटी झोली में भीख माँगते नजर आते हैं। इन्हें भी स्वाभिमान से जीने का हक है परंतु सरकारें मौन हैं।
सन्दर्भ ग्रन्थः-
- हिन्दी साहित्य का इतिहास : रामचंद्र शुक्ल नागरीप्राचारिणी सभा काशी संवत् 2007 वि. पृ. 13, 17 व 18
- गोरखनाथ : नागेन्द्रनाथ उपाध्याय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली प्रथम संस्करण : 1991 पृ. 22
- हिन्दी साहित्य कोश भाग 1, सम्पादक - धीरेन्द्र वर्मा ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी, तृतीय संस्करण 1985, पृ. 329
- नाथ सिद्धों की बानियाँ सं. हजारी प्रसाद द्विवेदी नागरीप्रचारिणी सभा वाराणसी संवत् 2035 वि., पृ. 14
- नाथ सिद्धों की बानियाँ सं. हजारी प्रसाद द्विवेदी नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी संवत् 2035 वि., पृ. 12
- रिपोर्ट मरदुचशुमारी राजमारवाड़ सन् 1891 श्री जगदीश सिंह गहलोत शोध संस्थान जोधपुर पुनः प्रकाशन तिथि 12 मई 1997 पृ. 248
- राजस्थानी-हिन्दी संक्षिप्त शब्दकोश : सं. पद्मश्री सीताराम लालस प्रथम खण्ड राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर सन् 1986, पृ. 227
- मानक हिन्दी कोश सं. रामचन्द्र वर्म्मा पाँचवा खण्ड हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, सन् 1993 ई. पृ. 225
- मानक हिन्दी कोश सं. रामचन्द्र वर्म्मा पाँचवा खण्ड हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, सन् 1993 ई. पृ. 386
- Rajasthan An Oral History Conversation with komal kothari Rusotam Bharucha Penguin Books 2003 पृ. 345
- कालूनाथ कालबेलिया उम्र-73 निवासी चौपासनी गाँव जोधपुर से प्राप्त जानकारी अनुसार
- ‘लूर’ पत्रिका ‘कालबेलिया विशेषांक’ सं. डॉ. जयपाल सिंह राठौड़ वर्ष 9 अंक 17-18 जनवरी दिसम्बर 2011 गोपालबाड़ी चौपासनी जोधपुर पृ. 18 से 185
- मड़ई 2015 सं. डॉ. कालीचरण यादव ‘अण्डमान तथा निकोबार की जनजातियाँ (जीवन, भाषा और परम्पराएँ)’ डॉ व्यास मणि त्रिपाठी का आलेख पृ. 208
- सम्मेलन - पत्रिका लोक-संस्कृति विशेषांक भाग 39 संख्या -23 सम्पादक रामनाथ ‘सुमन’, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग इलाहाबाद पृ. 233
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