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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2022

मीरां पदावली में मीरां का जीवन और परिवेश – डॉ. महीपालसिंह राठौड़

मीरां पदावली में मीरां का जीवन और परिवेश – डॉ. महीपालसिंह राठौड़


जोधपुर के संस्थापक राव जोधा के प्रतापी पुत्र वरसिंह और दूदा ने विक्रम सम्वत (1547-48) मेड़ता में स्वायत्त शासन की स्थापना की। उन्होंने अपने बाहुबल लगन व दूरदर्शिता से उजड़े मेड़ता की पुनर्स्थापना कर उसे छोटे सुन्दर नगर के रूप में विकसित कर दिया था।¹

राव दूदा के पुत्र वीरमदेव और रत्नसिंह थे जिन्होंने महाराणा सांगा के साथ बाबर से लड़े गये युद्ध में भाग लिया। वीरमदेव के रण कौशल से ही राणा सांगा युद्ध में तीर लगने पर सकुशल शत्रु के घेरे से बाहर आ सके थे। डिंगल कवि ने कहा है ‘रांणों सांग कुशल घर आवे यो है वीरमदे तणो प्रताप’ मीरां के पिता रत्नसिंह खानवा के युद्ध में काम आ गये। अकबर ने जब चित्तौड़ के किले पर छ महीने घेरा डाल कर उसे विजित करने की ठानी तो उस किले से राणा उदयसिंह को उदयपुर की तरफ जयमल ने सुरक्षित भेजा और चित्तौड़ के किले का दायित्व स्वयं ने सम्भाला। जिस चित्तौड़ के किले पर भारत वर्ष का प्रत्येक नागरिक गर्व करता है उस किले की चाबियाँ लेने के लिए अकबर ने टोडरमल को जयमल के पास दूत बना कर भेजा और कहा कि तुम युद्ध से हट जाओ मैं तुम्हें चाहो जितनी जागीर और सम्मान दूंगा तब जयमल ने कहा कि यह किला हमारा है और जब तक जीवित हूँ असुर इस किले में प्रवेश नहीं कर सकेंगे।

यही हुआ अकबर के बंदूक के निशाने से गोली लगने पर जयमल घायल हुए परंन्तु युद्ध करने की इच्छा प्रकट की। कल्ला राठौड़ ने जयमल को अपने कंधों पर बैठाया और दोनों हाथों से चलती तलवारें (दो जयमल की और दो ही कल्ला राठौड़ की) यानी अकबर चार हाथों से चलती तलवारें देखकर अचम्भित रह गया कि यही च्यारभुजा नाथ है।² इन्हीं वीरों की गजारूढ प्रतिमाएँ अकबर ने दुर्ग के दरवाजे के बाहर संगमरमर की लगवायी थी। जिसका वर्णन फ्रांसिसी इतिहासकार बर्नियर ने भी किया है मीरां के जीवन में चित्तौड़ में जौहर और शाका हुआ। जोधपुर के ईर्ष्यालु शासक मालदेव ने मेड़ते पर अपना अधिकार कर लिया। मीरां इन्हीं जयमल की चचेरी बहिन थी।

मीरां के पिता रत्नसिंह और जयमल के पिता वीरमदेव सगे भाई थे। राव दूदा परम वैष्णव भक्त थे। मेड़ता में जहाँ च्यारभुजा नाथ का मंदिर बना है। उस मूर्ति को मीरां दूध पिलाती थी और जयमल वहाँ मंदिर में बैठ कर सवा पहर तक माला जपते थे। माला जपते वक्त उनके पास नंगी तलवार रहती थी माला जपने के दौरान उन्हें कोई संदेश तक नहीं दे सकता था। जिस खंभे के पास बैठकर माला जपते थे वह मेड़ता के चार भुजा मंदिर में अब भी लाल कपड़े से ढंका हुआ है।

जीव दया और प्राणी मात्र के प्रति दया भाव रखने वाले विश्नोई सम्प्रदाय के संस्थापक जांभोजी ने राव दूदा को आशीर्वाद दिया था।

मीरां अपने समय की रूपवती लावण्यमती युवती थी। जिनका विवाह महाराणा सांगा के पुत्र कुंवर भोजराज से हुआ। मीरां की शादी में महाराणा स्वयं मेड़ता आये थे हिन्दवां सूरज जिसके नेतृत्व में भारतवर्ष के राजाओं ने बाबर से खानवा में युद्ध लड़ा।

राठौड़ों की अन्य शाखाएँ जैसे राव जोधा से जोधा, ऊदा से उदावत, कूंपा से कुम्पावत हुई लेकिन राव दूदा के वंशज स्थान विशेष से पहचाने जाने लगे मेड़ता से मेड़तिया। मेड़तियों को युद्ध क्षेत्र में रण कौशल के लिए जाना जाता है। मारवाड़ में रिंया, कुचामण और मेवाड़ में बदनोर और घाणेराव ऐसी जागीरें थी जहाँ से दोनों ही राज्यों को युद्ध क्षेत्रों में योद्धा मिलते रहे।

कर्नल टॉड ने भी मेड़तियों को ठतंअमेज वि जीम इतंअम3 की संज्ञा दी है।

मीरां के जीवन चरित्र और पदावली पर टिपप्णी करने से पूर्व उनकी उज्ज्वल वंश परम्परा का ज्ञान होना चाहिए इसके अभाव में केवल मनगढ़न्त बातों पर की गई टिप्पणियां उचित नहीं है।

मीरां मेड़ता अंचल में जन्मी और मेवाड़ में ब्याही गई दोनों ही अंचलों में भाषागत दृष्टि से साम्यता है। मीरां का मेड़ता से लगाव ज्यादा रहा। विवाह उपरांत भी वे मेड़ता आती रही। इस आलेख में मीरां पदावली में वर्णित पदों के आधार पर ही मीरां के जीवन चरित्र और उनके सामाजिक परिवेश और आंचलिकता को खोजने का प्रयास किया जायेगा-

मीरां बाई के पदों में अपूर्व भाव-विह्वलता और आत्म समर्पण का भाव है। उनके माधुर्य ने हिन्दी भाषी क्षेत्र के बाहर के भी सहृदयों को आकृष्ट और प्रभावित किया है।⁴ मीरां की लोकप्रियता का कारण है ऐसी भाषा का प्रयोग जो लोक जीवन में रची बसी थी।⁵

वीरवर जयमल मीरां के चचेरे भाई थे उसने अपने पद में वर्णित किया है-

जैमल के घरि जनम लियो है, राणाँ नै परणाई⁶

मीरां का सांसारिक जीवन से मोह नहीं था इसलिए उसने राजसी वैभव को अंगीकार ही नहीं किया-

राणोंजी मेवाड़ों म्हारै दाय न आवै।

गिरधर म्हारै मन भाया, भोलि माय।।⁷

राजस्थान में ‘रावल़ा’ शब्द से अभिप्राय है राजपूतों का परिवार या ठिकाना, मीरां के स्वामी तो गिरधर गोपाल है इसलिए उसे रावल़ा बिड़द (विरूद) ही अच्छा लगता है

रावल़ों बिड़द मोहि रूड़ो लागे पीड़ित पराये प्राण⁸

राणा जी के ऊँचे महल, और गवाक्ष हैं और मीरां बाई की ‘साल’ (साधारण कमरा) फिर भी वह उसी में संतुष्ट है⁹

मीरां को अपने भक्ति के मार्ग पर चलने पर कई विपदाओं से सामना करना पड़ा विष का प्याला, साँप सब कुछ दिये गये लेकिन दृढ़ विश्वास को कोई नहीं डिगा सका-

तन की मैं आस कबहुँ नहिं कीनी।

ज्यूं रण मांही सूरो।।¹⁰

वह अपने प्रियतम कृष्ण को भी वीरोचित्त वेशभूषा में देखना चाहती है। वे घोडे पर जीन कस कर, बखतर से सुसज्जित होकर आवें -

म्हारे घर आवो जी राम रसिया घुड़ला जीन करावो (मन) मोहन, बखतर खासा कसिया-¹¹

जिन जातियों में पर्दा प्रथा थी उनमें रास्ते में जब कोई बड़ा बुजुर्ग दीख जाता तो वो रास्ते में घूमकर घूंघट निकाल लेती पर्दा का प्रभाव मीरां पर भी है वह कहती है-

सांकड़ली सेरयाँ मैं म्हांनै साधूजन मिलिया।

क्यूंकर फिरूं अपूठी।।¹²

मीरां ने कृष्ण को राजसी सम्बोधनों से ही सम्बोधित किया है-

अम्मा ए म्हारा प्याराजी ने घणी ए खम्मा’¹³

राजपूत संस्कृति में महिलाएँ सम्बोधन के रूप में ‘खम्मा घणी’ शब्द का प्रयोग करती हैं।

कृष्ण मीरां के लिए बन्ना है।

बनाजी थाँरी अँखियाँ कामणगारी हो बनाजी।।¹⁴

अपने प्रियतम की बोली उसे मीठी लगती है।

थारी बोली लागे म्हांने मीठी 

हो म्हारा सांवरिया।।¹⁵

राण का देश भी कैसा है-

राणांजी थारो देसड़लो रंग रूड़ो

थांरे मुलक में भक्ति नहीं छै

लोग बसे सब कूड़ो¹⁶

आपके देश में भक्ति नहीं है और झूठे लोग बसते हैं।

मीरां को भक्ति के मार्ग पर चलने पर कई कष्ट सहने पड़े लेकिन वह अडिग थी। तुलसी पर भी यही संकट आया तो उन्होंने भी कहा कि ‘धूत कहे अवधूत कहे’ यहाँ मीरां भी कहती है कि ‘मैं’न तो चोरी कर रही हूँ न किसी का जीव सताती हूँ और न ही कोई बुरा कर्म कर रही हूँ इस पुण्य के मार्ग पर चलते हुए भी कोई विरोध करे तो करने दो यह संसार यूं ही झक मारेगा।’

चोरी करां न मारगी नहिं मैं करूं अकाज।

पुन्न कै मारग चालतां, झक मारो संसार।।¹⁷

मीरां जब व्यथित होती है तो कह उठती है -

राणा जी का देस में कोई, जल पीबा को दोस।¹⁸

मीरां ने देशाटन किया, मथुरा वृन्दावन, द्वारका, काशी सब जगह घूम आयी काशी का संस्मरण उनका अच्छा नहीं रहा -

कासी कौ लोग बड़ो बिसवासी

 मुख में राम बगल में फांसी, 

आधी कासी मैं बांमण बाणियाँ 

आधी कासी बसे सन्यासी।¹⁹

काशी के लोग बड़े विश्वासी बनते हैं पर वो है नहीं ! मुँह में राम बगल में फाँसी रखते हैं।

मीरां भक्ति के रंग में रंग गई जिस तरह अफीमची जब अफीम का नशा कर लेता है तो उसे फिर दूसरे नशे अच्छे नहीं लगते-

यो तो अमल म्हारो कबहु न उतरै 

कोट करो न उपाय।²⁰

मीरां के ससुराल चित्तौड़ के आस-पास अब भी अफीम की भरपूर खेती होती है और मध्यकाल में युद्ध में जाने से पूर्व कसूंबा पीकर ही योद्धा युद्ध में जाते थे मीरां ने भी इसी का वर्णन किया है।

या तन की कूंडी करूं मन पोसत भेऊं।

ग्यांन गलणीयां हाथि ले इम्रतरस पीऊं।।²¹

जिस तरह सोने के जंग नहीं लग सकता उसी तरह मीरां के चरित पर भी कोई दाग नहीं लग सकता-

निन्दा म्हारो भलांई करो नै सोनै काट न लागै।²²

जिस तरह हाथी की सवारी को लाख कुत्ते भोंके पर कोई फर्क नहीं पड़ता उसी प्रकार मीरां भी अपने ध्यान में मग्न है-

हस्ती की असवारी पाछै लाख कुतिया भुसी।²³

मीरां अपनी सखी को कहती है कि मेरा कन्हैय्या कलेजे की कोर है-

सखी मेरो कानूड़ो कलेजे कोर।।²⁴

मीरां राज राणी है, राजकुमारी भी इसलिए उनके यहाँ दास-दासी नौकर चाकर सब हैं-

दासी हजार खवास कंचन ले झारी।²⁵

वहीं दास-दासियों के षड़यंत्र भी बड़े विचित्र होते थे मीरां उनसे भी परेशान थी।

मथुरा नगर की चतुरा गौलन।²⁶

अर्थात् कुब्जा ने कृष्ण को भरमा रखा है।

मीरां को जातिगत विशेषताओं की जानकारी थी जिसका उन्होंने बड़ी बारीकी से वर्णन किया है।

संतों के साथ बैठना, मंदिर जाना, जब पीहर और ससुराल वालों को अच्छा नहीं लगा तो मीरां ने तय किया कि अब मुझे कहीं नहीं रहना है -

रथड़ा बहल जुताइया जी ऊँटा कसिया भार

डावो छोड़ो मेड़तों जी, पेलां पोषर जाय।²⁷

एक अन्य पद में वर्णन मिलता है-

टांडा मीरां लादिया रे, बेगी दीना जाण।

कुल़को तारण अस्तरी रे, 

चलो है पुष्कर न्हाण।।²⁸

टांडा बनजारों का होता है जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर अपना सामान लेकर चलते हैं मीरां को भी इस संसार में स्थायित्व नजर नहीं आया।

लेकिन वह परम्परा को कायम रखना चाहती है वह ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहती जिससे उसका पीहर और ससुराल को नीचा देखना पड़े-

बिड़द छांडू तो लाजै मेड़तौ।

लाजै राणूं सिरदार (साथ)।।²⁹

मीरां महलों से उतरी और ऊँटों पर अपने सामान को लादा-

मीरां महलां से ऊतर्या जी, ऊँटा कसिया भार।

डावो छोड़्यो मेड़तो कोई सूदा द्वारका जाय।।³⁰

वह द्वारका पहुँचती है मीरां ने अपने पद में द्वारका का वर्णन इस प्रकार किया है।

बारे कोस की खाड़ी पड़त है 

मल्लाह बड़ा है कठोर।³¹

मीरां ने मेड़ता और चित्तौड़ को लजाया नहीं अपितु उसे तार दिया-

त्यारूं दूदाजी रो मेड़तो, 

कोई चोथी गढ चीतोड़।³²

धन्य है मीरां और धन्य है वह मेड़ता धन्य है वह राठौड़ वंश जिसमें मीरां ने जन्म लिया-

धन मीरां धनि मेड़तौ धनि राठोड़ौ राज।³³

मीरां को कृष्ण प्रिय लगते हैं जिनको यह विभिन्न सम्बोधनों से अभिव्यक्ति करती है-

यदुवर लागत है मोहिं प्यारो।³⁴

कृष्ण मीरां का कहा बुरा भी तो नहीं मानेंगे इसीलिए वह कहती है-

मीरां को कह्यों बुरो न मानो, 

आखिर जात अहीर।³⁵

सुर नर और मुनि सभी को मोहने वाले हैं- ठाकुर-जदुनाथ।³⁶

और वे ही कृष्ण जब मीरां का कहना नहीं करते, बुलाने पर नहीं आते तो वह उनकी जातिगत विशेषता को उद्घाटित करती है - 

         अजहुँ न आयो कँवर नंद को, 

क्यांरी लागी चाट।

छाँड गयो मझधार साँवरों 

                 ‌‌ बिना अकल को जाट।।³⁷                             

और मेरी पड़ौसन सुन-वह जलते हुए मैं पूला दे गया।

सुण-सुण रे मेरी पाड़ पड़ोसन।

जलती में पूलो दे गयो रे।।³⁸

और मीरां कृष्ण से नाराज होकर कहती है-

हम नहिं चले तुमारे घरन को 

तुम हो बहुत लबारी।।39

तुम बातूनी बहुत हो तुम्हारे घर कौन चले !

पपीहा पीव की वाणी बोलकर जब पीव की याद दिलाता है और कहना नहीं मानता तो मीरां ने उसके लिए दण्ड की व्यवस्था की है यह सामंतवाद की विशेषता थी कि जहाँ अच्छे कार्य करने पर प्रोत्साहन हाथों हाथ मिलता वहीं आज्ञा न मानने पर हाथों हाथ दण्ड का विधान भी।

पपीहा रे पीव की बानी न बोलि

सुनि पावेगी बिरहनि राल़ैली पाँखाँ मरोड़ि।

 चोंच कटाऊँ पपीया रे, ऊपर काल़ो रे लोंण।⁴⁰

मीरां का मानना है कि भजन करने से तेज में अभिवृद्धि होगी-

भजन कियां सूं तेज बधैला,

 जैसे (ऊग्यौ) सूरज भान।⁴¹

और हरि के भजन बिन जो दिन खोये - धिक मनषा जनम जमारा।।⁴²

‘‘वस्तुतः मीरां के पद और जीवन भारतीय ही नहीं अपितु करोड़ों कृष्ण भक्तों और हजारों गोप-ग्वालिनों की अन्तरात्मा के स्वर है। उनमें शब्द चमत्कार नहीं भक्तों की आत्मा का संगीत है।⁴³

मीरा बाई का नाम भारत के प्रधान भक्तों में है और उनके पदों में प्रेम की तल्लीनता समान रूप से पाई जाती है।⁴⁴

‘मीरां की वाणी में उपदेश नहीं है परन्तु स्वकथन में इतना विराट भाव है कि हम सभी उसमें समाहित हो जाते हैं।’⁴⁵

संदर्भ :

1. ‘मातृभूमि का मान’ (कहानी संग्रह) : डॉ. गोविन्द सिंह राठौड़ सुधन प्रकाशन, जोधपुर प्र.सं. 2015 में ‘तीजणियों की रक्षार्थ बलिदान’ कहानी, पृ. 9

2. मेड़तिया राठौड़ों का राजनीतिक और सामाजिक इतिहास : डॉ. हुकमसिंह भाटी, प्रकाशक नारायण सिंह चावंडिया, हिम्मत नगर, गुजरात प्र. सं. 2014, पृ. 79

3. ।ददंसे ंदक ।दजपुनपजपमे वि त्ंरेंजींदए टवसण् 1ए श्रंउमे ज्वकए ॅपससपंउ ब्तववाए च्ंहम 380ण्

4. हिन्दी साहित्य : उद्भव और विकास : आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी राजकमल प्रकाशन, प्रा.लि., सन 1992, पृ. 112

5. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास : बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि., सन 2005, पृ. 135

6. मीरां बृहत्पदावली भाग-1 सं. हरिनारायण पुरोहित, राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर संस्करण 2006 पद सं. 517 पृ. 255

7. वही, पद सं. 522 पृ. सं. 258

8. वही, पद सं. 544 पृ. सं. 270

9. वही, पद सं. 86 पृ. सं. 43

10. वही, पद सं. 506 पृ. सं. 248

11. वही, पद सं. 410 पृ. सं. 194

12. वही, पद सं. 513 पृ. सं. 253

13. वही, पद सं. 620 पृ. 313

14. वही, पद सं. 312 पृ. सं. 149

15. वही, पद सं. 221 पृ. सं. 106

16. वही, पद सं. 506 पृ. सं. 248

17. वही, पद सं. 423 पृ. सं. 201

18. वही, पद सं. 86 पृ. सं. 43

19. वही, पद सं. 564 पृ. सं. 281

20. वही, पद सं. 239 पृ. सं. 493

21. वही, पद सं. 460 पृ. सं. 222

22. वही, पद सं. 260 पृ. सं. 125

23. वही, पद सं. 584 पृ. सं. 292

24. वही, पद सं. 595 पृ. सं. 292

25. वही, पद सं. 158 पृ. सं. 73

26. वही, पद सं. 23 पृ. सं. 314

27. वही, पद सं. 417 पृ. सं. 198

28. वही, पद सं. 416 पृ. सं. 197

29. वही, पद सं. 498 पृ. सं. 241

30. वही, पद सं. 471 पृ. सं. 227

31. वही पद सं. 572 पृ. सं. 285

32. वही, पद सं. 471 पृ. सं. 227

33. वही, पद सं. 521 पृ. सं. 258

34. वही, पद सं. 488 पृ. सं. 236

35. वही, पद सं. 485 पृ. सं. 234

36. वही, पद सं. 451 पृ. सं. 217

37. वही, पद सं. 53 पृ. सं. 27

38. वही, पद सं. 438 पृ. सं. 211

39. वही, पद सं. 250 पृ. सं. 120

40. वही, पद सं. 282 पृ. सं. 135

41. वही, पद सं. 361 पृ. सं. 171

42. वही, पद सं. 486 पृ. सं. 235

43. लूर मीरां विशेषांक पर इतिहासविद सौभाग्यसिंह शेखावत की प्रतिक्रिया, लोक देवता तेजाजी विशेषांक सं. डॉ. जयपालसिंह राठौड़, पृ. 179

44. हिन्दी साहित्य का इतिहास - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी छठा संस्करण सं. 2007 पृ. 185

45. लूर : मीरां विशेषांक वर्ष 1, अंक 2 जुलाई-दिसम्बर 2003, सम्पादक : डॉ. जयपालसिंह राठौड़, पृ. 12


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