राजस्थान की घुम्मकड़ जातियों में गाडोलिया लुहारों का महत्वपूर्ण स्थान है। चितौड़ पर जब मुसलमानों का अधिकार हो गया1 तो गाडोलिया लुहारों ने प्रण लिया कि जब तक इस दुर्ग पर राणा का अधिकार नहीं होगा तब तक हम घर बनाकर नहीं रहेंगे और चितौड़ में अपना पैर नहीं रखेंगे सदियां बीत गयी, राज बदल गए परंतु वे लोग अभी भी अपने प्रण को निभाते नजर आ जाते हैं। परम्परागत मूल्यों के निर्वहन में ऐसी कौम दुर्लभ ही मिलेगी जो अपने घर परिवार को अभी भी बैलगाड़ी पर लादे हुए चल रहे हैं।
राजस्थानी शब्द कोश में गाडोलिया लुहारों का अर्थ इस प्रकार किया गया है-
गाडोलिया - सं. स्त्री - लुहारों की एक जाति विशेष। इसके व्यक्ति प्रायः अपना सब घर बार एक गाड़ी पर ही स्थापित कर एक स्थान से दूसरे स्थान को घूमते रहते हैं और एक स्थान पर टिक कर नहीं रहते।²
अपने परिवार सहित बैल गाड़ियों में घर बसाकर गाँव-गाँव फिरने वाले लोहार गाडूल्या-लुवार (सं. गाड्डुक लोहकार) कहा हैं।3
जीम ळंकवसपं स्नींत ंतम ादवूद वित जीमपत ेमतअपबमे ें पतवदेउपजी4
‘क्रिसन रूकमणी री वेली में’ महाकवि पृथ्वीराज राठौड़ ने लोहार के आरणि का वर्णन किया है-
रुकमइयऊ पेखि तपत आरणि रणि
पेखि रुकमणी - जळ प्रसन
तणु लोहार वाम कर निय तणु
माहवि किउ साँडसी मन5
अर्थ - श्री कृष्ण ने अपने मन को संड़सी बना लिया और अपने शरीर को लुहार का बांया हाथ (जिससे वह सँडसी को पकड़ता है) जैसे लुहार के बाँये हाथ में पकड़ी हुई सँडसी अहरन पर रखते समय तप्त लोहे के सम्पर्क से जल उठती है और पास में रखे शीतल जल में डाल देने से शीतल हो जाती है, वैसे ही श्री कृष्ण के शरीर में स्थित उनका मन युद्ध भूमि से रूक्मकुमार को देखकर जल उठता था पर निकट बैठी रूक्मिणी को देखकर प्रसन्न शीतल हो जाता था।
गाडिया लुहारों की इस आन बान पर एक प्राचीन राजस्थानी दूहा मिलता है
धर पण माता - भोम हित,
त्याग जगत सुखसार।
अमिट जगायी जोत तैं,
धिन धिन वीर लुहार।6
इनकी कुछ जातिगत विशेषताएँ हैं जिनका हमें अध्ययन करना चाहिए इनकी प्रमुख पाँच आन इन प्रकार है-
- चितौड़ में लौटकर नहीं आयेंगे
- कुए से पानी निकालने के लिए रस्सी नहीं रखेंगे
- स्थाई घर बनाकर नहीं रहेंगे
- गाड़ी में खाट रखेंगे तो उल्टी रखेंगे
- रात को दीपक नहीं जलायेंगे
मुगलों के अत्याचार से दुःखी होकर अपनी जन्म भूमि मेवाड़ से पलायन करने की वजह से मुस्लिम के प्रति इनके मन में शंका रहती है इसलिए इन्होंने अपनी आपसी व्यवहार के लिए एक सांकेतिक भाषा को विकसित कर लिया जिसमें भिन्न-भिन्न भाषाओं और बोलियों के शब्दों का साम्मिश्रण है मारवाड़ी, गुजराती, हरियाणवी, पंजाबी, खड़ी बोली के शब्द इनकी भाषा में आये हैं। कबीर की भाषा भी सधुक्कड़ी है और बंजारों की भाषा में भी कई शब्द हैं। इनकी भाषा का अध्ययन होना चाहिए।
ये हिन्दू समाज का अभिन्न अंग है और पौराणिक देवी-देवताओं के साथ-साथ लोक देवी-देवताओं को विशेष तौर पर मानते हैं- लोक देवता रामदेवजी, पाबूजी, गोगाजी, भैंरूजी माता जी की पूजा अर्चना करते हैं। वहीं कबीर की वाणियों से भी विशेष रूप से प्रभावित हैं और जीवन के कठिन संघर्ष में भी आध्यात्मिक जीवन मूल्यों के प्रति इनका विशेष झुकाव है-
इनके गीतों को चार प्रमुख प्रकारों में विभक्त कर सकते हैं-
- साकी - दो-दो पंक्तियों की रोचक कड़ियाँ
- सीठने - श्रृंगार विषयक गीत
- धार्मिक गीत - देवी देवताओं, कबीर व दादू पंथ से प्रभावित गीत व भजन
- अन्य गीत
साकी का उदाहरण
अे जी सोळह बरस री बिंदणी अर ग्यारह बरस रो बींद।
अे ने भावे खेलणो अर इने आवै नींद।।
पीळा रो कांई ओढणो, ओढो कसूमल रंग।
घर रो थारो गेलसफो, थे चालो म्हारे संग।।
राम खुदाई जी बावडी लिछमण काढै धार।
जळ भोडळ को बेवड़ो, सीता बणी पिणियार।।
सीठने का उदाहरण
प्रेम गीत
नायिका अपने प्रेमी पथिक (राईका रेबारी) को बुला रही है कि किसी बहाने तुम मेरे से मिलने आओ-
म्हारा बाड़ा में निमड़ली गुटका रे मुसलिये आव
गुटका र मुसलिये आव राईका रेबारी
म्हे रांदी छे तरकारी खावा रे मुसलिये आव
खावा रे मुसले आव राई का रेबारी
हूं हूती छी माचा पे तू आवे कोनी आज
तूं आवे कोनी आज राई का रेबारी
धार्मिक गीत का उदाहरण
लोक देवता रामदेवजी को सम्बोधित कर गाया जाने वाला गीत
खरची तो टूटी बाबा सांस भारी
खोलो खजानो बाबा करो तियारी
देवरां में आया बाबा दरसण पाया
दरसण पाया बां’का हरिगुण गाया
कबीर पंथ व दादू पंथ का विशेष प्रभाव इन पर पड़ा इन धार्मिक गीतों/भजनों में परस्पर ज्ञान व भक्ति के आगे सभी मनुष्यों की समानता पर बल दिया है -
चतुराई चूल्हे पड़ी, भट्टि पड़िया आचार।
तुळसी हरि के सुमरण बिना चारो बरण चमार।।
गुरु करे तो अेसा करै जैसे रूई कपास।
जीवतड़ा तो तन ढके, मरता चालै साथ।।
अेक डाळी पे दो पंछी बैठा, अेक गुरु अेक चेला।
किया गुरु बिना पंख लगाये, उड़ जाये हंस अकेला।।
गीतों में वर्णित उपमाएँ, इनके गीतों की उपमाएँ सहज व सरल है
गाय जैसी सीधी माँ, बैल जैसा भाई, हंस जैसी आत्मा, कौवे जैसा चालाक शत्रु, प्रेम संदेशक के रूप में तोता, मोर जैसा सजा धजा दूल्हा, लोहार की भट्टी की तरह धधकता हुआ हृदय, चम्पा की शाखाओं जैसे कोमल हाथ, मूंगफली जैसी नायिका की अंगुलियाँ आदि।
सन् 1955 में पंडित नेहरू ने चितौड़ में अखिल भारतीय गाडोलिया लोहारों का सम्मेलन आयोजित कर स्थाई रूप से बस जाने का आग्रह किया तब इसकी प्रतिक्रिया इन गीतों में इस प्रकार व्यक्त हुई-
उदाहरण -
चितौड़ देस का जिकर करूं भूमलिया ना बसना चाहे रे
भूमलिया तो कह पंडत ने हम ना बसना चाहे रे
खेती प्यारी करो हळ कुआ करो तुम बन के रखो मजबूत रे
चलो चलो चितौड़ देस ने आजादी दरबार में
हाथ जोड़कर अरज करूं म्हें जनम गुजारे गाडे में⁷
अपनी आन के पक्के गाडोलिया लुहारों की भाषा, संस्कृति पर मूलभूत शोधकार्य की आवश्यकता है जिससे यायावर समाज की संस्कृति संरक्षित हो सके व समाज के दूसरे वर्गों को भी उनके जीवन मूल्य व सांस्कृतिक विशिष्टताओं की जानकारी मिल सके।
संदर्भ -
- मरदुम शुमारी राज मारवाड़ सन् 1891 ई, जैन ब्रदर्स रातानाड़ा जोधपुर सन् 1997 पृ.463
- राजस्थानी सबद कोश प्रथम खण्ड द्वितीय परिवर्द्धित संस्करण सम्पादक सीताराम लाल़स राजस्थानी शोध संस्थान चौपासनी शिक्षा समिति जोधपुर, सन् 1988 ई. पृ.888
- राजस्थानी लोक जीवन शब्दावली : ब्रजमोहन जावलिया साहित्य अकादेमी नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2001 ई. पृ. 408
- त्ंरेंजींद ।द वतंस भ्पेजवतल ब्वदअमतेंजपवदे ूपजी ज्ञवउंस ज्ञवजींतपश् रू त्नेजवउ ठींतनबीं चमदहनपद ठववो प्दकपं 2003ए च्ंहम 55
- क्रिसन-रूकमणी री वेलि राठौड़ पृथ्वीराज री कही संपादक नरोत्तमदास स्वामी, राजस्थानी ग्रन्थागार जोधपुर तृ सं. सन् 2009, पृ. 69 व 185
- राजस्थानी दूहा विहार स्व. नरोत्तमदास स्वामी, राजस्थानी साहित्य संस्थान जोधपुर प्रथम संस्करण 2002 पृ. 6
- गाडुल्या लोहार घुम्मकड़ों के लोक गीत एक विश्लेषण - डॉ. सत्यपाल रूहेला मरूभारती अंक 17/3 पृ.50 से 59
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