धरम जाता धरा पलटता त्रिया पड़ता ताव।
अे तीनूं दिन त्याग रा कुण रंक कुण राव।।
अर्थात्- बलपूर्वक धर्म परिवर्तन करवाये जाने पर या अपनी मातृभूमि पर दुश्मन का अधिकार होने पर या किसी अबला की इज्जत पर आँच आने पर ये तीनों ही दिन उत्सर्ग के हैं इसमें क्या रंक और क्या राजा!
मरणा नुं मंगळ गिणे
समर चढे़ मुख नूर
यु़द्ध में लड़ते-लड़ते मरने को जो उत्सव सदृश मानते हों और युद्ध क्षेत्र में प्रयाण करने पर जिनके मुख पर नूर आता हो ऐसे वीर जन मानस के लिए वंदनीय हुए हैं।
आम जन के संकट को जिन्होंने अपना माना और अपने प्राण न्यौछावर कर संकट से उबार दिया वे आज भी जन मानस में पूज्य हैं।
कुंवर आयुवान सिंह ने दोहे में वर्णन किया हैं-
केसर निपजै नह अठै
नह हीरा निकलंत।
सिर कटियां खग झालणा
इण धरती उपजन्त।।¹
अर्थात्-ः राजस्थान में न तो केसर उत्पन्न होती है और न ही हीरे निकलते हैं परंतु यहाँ ऐसे वीर पैदा होते हैं जो सर कट जाने पर भी तलवार से शत्रु का सामना करते हैं।
दो-दो मेळा नित भरै
पूजै दो-दो ठौड़।
सिर कटियो जिण ठौड़ पर
धड़ झूंझी जिण ठौड़।।²
अर्थात्-ः ऐसे वीरों की याद में एक ही दिन में दो-दो स्थानों पर मेले लगते हैं एक तो वह स्थान जहाँ सर कट कर गिरा और दूसरा वह स्थान जहाँ सर कटने के उपरान्त भी धड़ झूंझती हुई धराशायी हुई राजस्थान में वीरों की परम्परा रहीं हैं। लेकिन यह ऐसी वीर प्रसू भूमि है जहाँ सर कट जाने पर भी धड़ से झूंझते रहे हैं और इसके उदाहरण एक नहीं अनेक है। इतिहास ग्रंथों, शिलालेखों, स्थानकों व लोक कंठ में रमे लोकगीत इसके प्रमाण हैं।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में आल्हा और ऊदल का वर्णन करते हुए लिखा है ‘जनता के कंठ में जगनिक के संगीत की वीरदर्पपूर्ण प्रतिध्वनि अनेक बल खाती हुई अब तक चली आ रही हैं।’
गांवों में जाकर देखिए तो मेघगर्जन के बीच में किसी अल्हैत के ढ़ोल के गंभीर घोष के साथ यह हुंकार सुनाई देगी-
बारह बरिस लै कूकर जीऐं,
औ तेरह लै जिऐं सियार।
बरिस अठारह छत्री जीऐं,
आगे जीवन को धिक्कार।। 3
राजस्थानी भाषा साहित्य और संस्कृति में झुंझारजी, भोमियाजी, मामोजी शब्दों का विशेष महत्व है। यहाँ के लोक मानस में इनका महत्व लोक देवता और ग्राम देवता के रूप में माना जाता है, राजस्थानी शब्द कोश में इन शब्दों का अर्थ इस प्रकार दिया गया है।
- झुंझार, झुझारि -देखो ‘जूंझार’
- जूंझार - देखो जूंझार
- जूंझार - वि. (सं. युद्धकार)
- परोपकार के लिए युद्ध में वीर गति प्राप्त करने वाला।
- पीर
- शक्तिशाली
- वीर योद्धा।⁴
- मांमौजी- पु.
- परोपकार में वीरगति प्राप्त करने वाला व्यक्ति।
- मामा। ⁵
भोमियाजी-सं. पु. - गाय, ब्राह्मण, धर्म, गाय और भूमि की रक्षार्थ एवं परोपकार के लिए युद्ध करता हुआ वीर गति को प्राप्त वीर, जिसकी बाद में पूजा की जाती हैं।⁶
जुझार - वि. (हि. जुज्ह $आर (प्रत्यय)
- लड़ाका । वीर
- युद्ध । लड़ाई।⁷
जुझार - वि (हि. जुज्झ$आर (प्रत्यय) ) योद्धा। लड़ाका पु. युद्ध । लड़ाई। ⁸
ज्ीम भ्ंदनउंद चवस ;चवतजमद्धए पे ं ेचवज थ्वत मअमत ेंबतमकप पद जीम ीपेजवतल वि बीपजवतए ूमतम पजे पउउवतजंस कममिदकमते श्रंपउंसस ंदक च्ंजजंए उमज जीमपत कमंजीण् ज्ीमतम पे ं ेउंसस बमदवजंची जव जीम उमउवतल वि जीम वितउमतए ूपसम ं ेंबतपपिबपंस श्रनरींतए वद ूपबी पे ेबनसचजनतमक जीम मिपिहल वि ं ूंततपवत वद ीवतेम इंबा संदबब पद ींींींदकण्⁹⁹
श्रीनदरींत दृ जीम ेचपतपज वि ेवउम वदम ूव कपमे अपवसमदज कमंजीण् ।सेव नेमक वित जीम पबवद तमचतमेमदजपदह जीम ेचपतपज चंहमण् ¹⁰
ठीवउपलं दृ । विसा ीमतव ूव ेंबतपपिबमे ीपे सपमि वित जीम चतवजमबजपवद वि बवूण् 11
कबीर ने भी जूझने को सराहा है जिसका वर्णन ‘सूरातन को अंग’ में हमें मिलता है-
कबीर सोई सूरिवां मन सौ माड़ै जूझ।
पंच पियादै पकरि कै दूरि करै सब दूजि।।
सूरा सोइ सराहिए लडै़ धनी कै हेत।
पुरिजा पुरिजा होइ परै तऊ न छाडै खेत।। ¹²
‘पदमावत’ में राजा बादशाह युद्ध खण्ड में जायसी ने ‘जुझार’ का वर्णन इस प्रकार किया है-
कोपि जुझार दुहूँ दिसि मेले।
औ हस्ती हस्तिन्ह कहँ पेले।।¹³
अर्थात्-ः दोनों ओर से जुझार सैनिक क्रोध करके आपस में मिले और हाथियों को दबाने लगे।
इसी प्रकार गोरा बादल युद्ध यात्रा खण्ड में भी जुझार का वर्णन किया है-
बादलि राय मोर तूँ बारा।
का जानसि कस होइ जुझारा।।¹⁴
अर्थात्-ः मेरे बादल राय, तू अभी बालक है। तू क्या जाने युद्ध करने वाले वीर बाँकुडे़ कैसे होते हैं।
जुझारा- विशेष रूप से युद्ध करने वाला सूरमा। सं. युद्धकारढजुज्झआरढ जुझार। यों तो युद्ध भूमि में सभी योद्धा लड़ते हैं किन्तु ‘जुझार’ पद विशेष सूरमा या रण बाँकुरे योद्धाओं के लिए प्रयुक्त होता था। मध्यकाल की परम्परा में इस प्रकार के वीर को सहस्रभट सामन्त या सहस्रवीर कहते थे। वह अकेला ही हजार आदमियों से युद्ध करने की शक्ति रखता था।¹⁵
जौं जिउ ऊपर खरग सँभारा ।
मरनिहार सो सहसन्हि मारा।।
अर्थात्-ः जब कोई योद्धा अपने जी का मोह छोड़कर तलवार संभालता है तो मरते हुए भी वह हजारों को मार जाता है। ¹⁶
‘‘युद्ध में झूंझ कर लड़ने वाले ऐसे बलिदानी वीरों को यहाँ झुंझारजी, भोमियाजी और कहीं-कहीं मामौजी के नाम से सम्बोधित किया जाता है। राजस्थान के गांव-गांव में ऐसे वीरों या झुंझारों की देवलियाँ (प्रतिमायें) खड़ी हैं। वे लोगों के विघ्नों व कष्टों का निवारण करते हैं, लोगों की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं मनौतियां चढ़ाते हैं। उनकी कीर्ति-यश सदैव-सदैव अमर रहेगा।’’¹⁷
मध्यकाल में किसान और मजदूर वर्ग का मुख्य धन पशु ही थे, कई बार लुटेरे गायों को ले जाते तो संघर्ष होना तय था ऐसे में जो वीर गायों को आतताइयों से छुड़़ाते वक्त युद्ध करते सर कट जाने पर भी धड़ से जूंझते रहते उन्हें ‘झूंझार’ कहते हैं। वे बिना मस्तक तब तक तलवार चलाते रहते जब तक उन पर गुळी (नील) का छींटा नहीं दे दिया जाता।
हो सकता है ये बातें हमें मान्य न हो परंतु इतिहास ग्रंथों में इनका उल्लेख मिलता है एक ही वीर को दो-दो स्थानों पर पूजा जाता है एक वह स्थान जहाँ शीश कटा और दूसरा वह स्थान जहाँ धड़ गिरा। जुझारों से सम्बधिंत बातों, इतिहास प्रसिद्ध घटनाओं व लोक प्रचलित लोक कथाओं गाथाओं का अध्ययन करने पर हम निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इनके कथा तंतु एक दूसरे से मिले हुए हैं।
कथा के निर्माण में ये अभिप्राय ही मूल कारण माने गए हैं। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ही ‘मोटिफ’ के लिए कथानक रूढि का प्रथम प्रयोग किया है।¹⁸
झुंझारों या भोमियों की इतिहास में उल्लेखित व लोक में प्रचलित कथाओं का अध्ययन करने पर हम एक मोटिफ डवजपि प्दकमग बना सकते हैं जिसमें उनके अध्ययन में हमें सहायता मिलती हैं।
- लुटेरों द्वारा गायों को घेर कर ले जाना।
- पीछे बछड़ों का भूख से व्याकुल होना।
- गाँव के किसी व्यक्ति द्वारा वीर को सूचना मिलना
- गायों को छुड़ाकर लाने के लिए वीर का जाना
- रास्ते में अपशकुन होना
- गायों को ले जाने वाले लुटेरों को ललकारना
- अकेले ही या समूह में युद्ध करना
- किसी काणे बछड़़े का पीछे रह जाना
- युद्ध में गायों को उन लुटेरों से छुड़ा लेना
- वीर का लुटेरों से युद्ध करते वक्त सर कट जाना
- सर कट जाने पर भी धड़ से युद्ध करना
- लड़ते लड़ते सर कटा उस स्थल से धड़ का दूर चला जाना
- नील (गुळी) का छींटा देने पर धड़ का गिरना
- पत्नी हो तो उसका सती होना
- गांव वालों को परचा देना
- परचा देने पर वहाँ थान बनाना
- जन्म तिथि या प्राणोत्सर्ग तिथि पर जागरण/प्रसादी का आयोजन होना
- कुछ झुंझार जी ने केवल सात्विक भोग लगना
- कुछ के खाजरू और मदिरा का चढ़ना
- असाध्य बीमारी का फेरी से इलाज होना
- उनके थान के सामने पर वाहन या सड़क गुजरने पर वहाँ से वाहन का हॉर्न
- बजाकर गुजरना अन्यथा दुर्घटना होने का खतरा बना रहना या गाड़ी का पंचर हो जाना
- किसी समान्य आदमी द्वारा पूजा आरंभ करना और बाद में धनवान हो जाना।
- किसी कार्य को करने से पूर्व उसमें भोमिया जी का हिस्सा तय करना और कार्य सफल होने पर उनके चढ़ाना और न चढ़ाने पर अनिष्ट हो जाना
- रात को किसी को स्वप्न में दिखाई देना और पूजा का आदेश देना
- सड़क/भवन/रेल्वे लाईन का उनके थान पर बना देने पर उस
- सड़क/भवन या रेल्वे लाईन का टूट जाना/ उखड़ जाना या दुर्घटना होना
- किसी एक को इसके कारण का पता लगना
- फिर मनौती मनाने पर या स्थान परिवर्तन करने पर सब ठीक होना और दखल नहीं देना
- आसोज और माघ माह के शुक्ल पक्ष में इनकी पूजा अर्चना होना
- भोमिया जी के भोपा में छाया आना
- छाया आने पर आखे लेना
- आखे लेकर भक्त की परेशानी को समझना और उत्तर देना
- उसका मार्गदर्शन करना
- रोगी को उनके नाम की तांती बांधना
- गाय और भैंस ब्याहने पर उसके दूध की जावणी चढ़ाना
- खेत में फसल पकने पर पहले उन्हे चढ़ाना
- विवाह आदि अवसर पर उन्हें सबसे पहले याद करना
- याद न करने पर विघ्न आना
- किसी सदस्य द्वारा उसका स्मरण करना बताना
- स्मरण करना और पुनः सब ठीक होना
- राहगीर द्वारा थान पर अफीम, बीड़ी, सिगरेट का चढ़ाना
- ऊंट या घोड़े पर सवार हो तो थान के सामने से नीचे उतर कर चलना
- विवाह आदि अवसर पर दूल्हे का घोड़ी पर सवार नहीं होना
- घोड़ी का बिना सवार गांव में आना
- गांव वालों को झुंझार होने का पता चलना
- थान के पास किसी पेड़, खेजड़ी, नीम का होना
- उसका किसी के द्वारा नहीं काटना
- काटने पर उसको क्षति होना
- थान के सामने महिलाओं द्वारा गुजरने पर जूते खोलकर हाथ में लेना व घुंघट निकालकर चलना
- नव वर वधू का उनके थान पर जात देना
- रातिजगा देना
- लड़का होने पर जात देना
- साफा बंधा हुआ पुरुष हो तो थान पर धोक लगाते समय सम्मान में सर से साफा
- उतार कर भोमिया जी के थान पर मूर्ति के आगे रखना और फिर पहनना।
झुंझार जी के उनकी जन्म तिथि या निर्वाण दिवस पर रात को रातिजगा या जागरण दिया जाता हैं। जहाँ रात भर दीपक जलाकर महिलाएँ, कलावंत ढोल पर या हारमोनियम व ढोलक पर उनके गीत गाते हैं जिनमें उनका संक्षिप्त जीवन चरित होता हैं। वैसे भोमिया जी या झुंझार जी का गाया जाने वाला लोकगीत जो कलावंत द्वारा गाया जाता है वह करीब-करीब एक जैसा ही है। जिसमें युद्ध विषयक वर्णन मिलता हैं।
चढ़ावा भोमिया जी के सफेद रंग की ध्वजा चढ़ती है। नारियल, गोटा, मिश्री, गुड़, बताशे, लापसी, चूरमा, खीर पुआ आदि कहीं कहीं अफीम शराब और बकरे भी चढ़ते हैं
डिंगल गीत में झूंझारों का वर्णन इस प्रकार मिलता हैं।
देवा दातारां जुजारां च्यारां वेदां अवतारां दसा।
धारा हरा बाहु गरां रूप सरा धाम।। 19
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धड़ पड़ीयांं लड़ीयो खग धारां।
चित सोह जाय विमाण चडियो।।
सारै साथ किया मिल सुरजा पुरजा पुरजा हुय पड़ीयो ।
पड़ीयो पछे धेन ली पेलां ऊभां पगां न दीधी ऐक।। 20
जुंझार जी के लोक गीत
थांरा भाभोसा कागद मेहलिया
सेवन हिळयो हांकण घरे आवो ओ जुंझारजी
झगड़े किण विध जूंझिया
थांरी माताजी कागद मेहलिया
थे थाळ अे अरोगण घरे आवो ओ जुंझार जी
तरवार्यां कि करण जूंझिया²¹
अर्थ-ः हे जुझार जी आप तलवार के बल पर दुश्मन से कैसे जूझे आपकी माँ याद कर रही है
आप घर पधारो!
शूरां शीश पड़्या रे धड़ आथड़े
शूरां रगतां रा विचारे खोखाळ
शूरा ओ रण में जूंझियो²²
अर्थ-ः दुश्मन से लड़ते हुए शूरवीर का शीश कट गया और धड़ जूझ रहा है शूरा रण में जूझे
गायां रा गवाळा कान्हा हिमाड़े में कूके रै
मंडळा कान्हजी
गांव री पिणहार्यां बरजे बारो बा कान्हा कह्यौ मान 23
बछडे़ भूखे हैं और मां बिन रंभा रहे हैं। गायों के ग्वाले रो रहे हैं। मंडला (गांव का नाम) कान्हजी गांव की पणिहारियाँ आपको मना कर रही है कान्हा हमारा कहा मान पर कान्हा कहा नहीं मानता वह गायों को छुड़ाने जाता है और आतताइयों से संघर्ष करते हुए जुझार हो जाता हैं।
भोमिया री पूतळी गाळे में पूजे रे
रण में जुंझियौ
गायां री बाहर जूनी चढ़ियो रे
रण में जुंझियौ²⁴
अर्थात्-ः रण क्षेत्र में काम आये भोमिया जी की पूतली को लोग पूजते हैं। गायों की बाहर चढ़ा और गायों को दुश्मन से छुड़ा लाया।
केसर घोड़ी काळमी पाबूजी थांनै सोवे वो
हां रे पाबू परणीजै
पेलड़े फेरे में पाबू चंवरी दोळौ फिरियो है
दूजोड़े फेरे पाबू चंवरी दोळे फिरियो है
तीजोड़े फेरे पाबू साळू काटे रे पाबू भालाळौ²⁵
पाबूजी ने देवल देवी को गायों की रक्षार्थ वचन दिये उनको पूरा किया तीसरे भांवरे में तो वे चवंरी में से भांवरे लेते हुए तलवार से अपने गठ जोड़े को काटा और केसर काळवी पर सवार होकर जिंदराव को जा ललकारा।
गीत
जुंझार जी अंग मोड़ो घुड़ला चढ़ौ
जुंझार जी घोड़ो तो सोवे नौलखो लालां जड़ी लगाम ओ
जुंझार जी अंग मोड़ो घुड़लां चढ़ौ
जुंझार जी बागौ तो सोवे केसर्यां ऊपर पचरंग पाग सा
धणी रे लुळ लुळ लागूंलां पांय ओ
जुंझार जी ²⁶
मेड़ता अंचल में विवाहादि या अन्य त्योहार व मांगलिक उत्सव पर जुंझार जी का सबसे पहले स्मरण किया जाता हैं। यह गीत लोक कलाकार हारमोनियम और ढोलक पर गाते है इसमें वर्णन हैं।
जुझार जी आप तैयार होकर घोड़े पर सवार हो जाओ आपको नौ लखा घोड़ा सुन्दर लगता हैं। आपको केसरिया रंग की वेशभूषा और ऊपर पचरंग पाग शोभा दे रही हैं।
हे मेरे मालिक आपके झुक झुक कर पा लागूं ओ जुंझार जी
लोक देवता जुझार भारतीय संस्कृति के प्रतिपालक रहे हैं उन्होंने जीवन मूल्यों के लिए अपना जीवन का सर्वस्व न्यौछावर कर आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किये इनकी परम्परा से अवगत होकर हम भारतीय संस्कृति पर गर्व कर सकते हैं। इन चरितों का इतिहास ग्रन्थों में उल्लेख नहीं के बराबर मिलता हैं। हमें इस क्षेत्र में शोध व अध्ययन की आवश्यकता हैं ताकि हमारे गौरवमयी इतिहास को जान सकें।
सन्दर्भः-
- हठीलो राजस्थान : कुँवर आयुवान सिंह
- आयुवान सिंह स्मृति संस्थान जयपुर सन् 1989 पृ. 9
- वही पृ. 29
- हिंदी साहित्य का इतिहासः आचार्य रामचंद्र शुक्ल, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी संवत् 2056 वि. पृ. 29
- राजस्थानी-हिंदी संक्षिप्त शब्दकोश सं. पद्मश्री सीताराम लालस राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर (राज.) सन् 1986 पृ. 479
- वही पृ. 362, 502
- राजस्थानी सबद कोस तृतीय खण्ड सं. सीताराम लालस चौपासनी शिक्षा समिति जोधपुर प्रथम संस्करण पृ. 3453
- संक्षिप्त हिंदी शब्दसागरः रामचंद्र वर्मा सं. 2051 वि. नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी पृ. 362
- मानक हिंदी कोश दूसरा खण्ड सं. रामचंद्र वर्मा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सन् 1992 ई. पृ. 376
- ।ददंसे ंदक ।दजपुनपजपमे वि त्ंरेंजींद इल श्रंउमे ज्वक अवसण्. प्प्प् डवजपसंस ठंदंतेपकें क्मसीप त्मचतपदज 1987 च्ंहम 1015
- त्ंरेंजींद ंद वतंस भ्पेजवतल बवदअमतेंजपवदे ूपजी ज्ञवउंस ज्ञवजींतप त्नेजवउ ठींतनबींण् च्मदहनपद ठववो 2003 चंहमण् 345
- वही पृ. 342
- कबीर आधुनिक संदर्भ में -डॉ राजदेव सिंह लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद सन् 1997 पृ. 165
- पदमावत मलिक मुहम्मद जायसी कृत महाकाव्य व्याख्याकार वासुदेव शरण अग्रवाल साहित्य सदन तलैया झांसी, संस्करण 2002 पृ. 549
- वही पृ. 667
- वही पृ. 668
- वही पृ. 680
- भारतीय संस्कृति के प्रतिपालक : डॉ. गोविन्द सिंह राठौड़ ‘सुधन प्रकाशन जोधपुर सन् 2016 पृ. 11
- लोक कथा विज्ञान : श्रीचन्द्र जैन मंगल प्रकाशन जयपुर सन् 1991 पृ. 64
- डिंगल गीत सं. 20 साहित्य संस्थान राजस्थान विश्व विद्यापीठ उदयपुर पृ. 181 हस्तलिखित सामग्री से (अप्रकाशित)
- डिंगल गीत सं. 7 साहित्य संस्थान राजस्थान विश्व विद्यापीठ उदयपुर पृ. 44 हस्तलिखित सामग्री से (अप्रकाशित)
- राजस्थानी लोकगीत भाग 2 सं. शिव सिंह चोयल, साहित्य - संस्थान राजस्थान विश्वविद्यापीठ उदयपुर पृ. 9
- राजस्थानी लोकगीत भाग 6 सम्पादक मोहनलाल व्यास शास्त्री साहित्य संस्थान राजस्थान विश्व विद्यापीठ उदयपुर पृ.38
- राजस्थान का होरी एवं लूर साहित्य : डॉ. जयपाल सिंह राठौड़ सुधन प्रकाशन जोधपुर सन् 2002 पृ. 29,
- वहीं पृ. 89
- वहीं पृ. 41
- मेड़ता अंचल के रजवाड़ी गीत : जयपाल सिंह राठौड़ पृ. 8 (निजी संग्रह से)
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