-->

रविवार, 2 अक्टूबर 2022

राजस्थान के लोक पर्व और त्यौहार – डॉ. महीपाल सिंह राठौड़

 राजस्थान के लोक पर्व और त्यौहार – डॉ. महीपाल सिंह राठौड़



त्यौहार हर्ष और उल्लास को व्यक्त करते हैं। भौगोलिक दृष्टिकोण से राजस्थान भारत वर्ष का सबसे बड़ा राज्य हैं। जहाँ मारवाड़, मेवाड़, ढूंढाड़, हाड़ौती, मालवी, मेवाती और ब्रज क्षेत्र अपनी आंचलिक विशिष्टताएँ लिये हुए हैं।


भारतीय संस्कृति में पौराणिक कथाओं, तीर्थाटन, व्रत, उत्सव और पर्वों की जो प्रणाली परम्परा गत चली आ रही हैं उसी से लोक संस्कृति का सम्पादन हुआ है। इस प्रशस्त प्रणाली ने भारतीय जीवन, भारतीय संस्कृति और भारत देश को प्राणवान एवं जागृत बनाये रखने में बड़ा योग दिया हैं।¹ जन जीवन में संजीवनी शक्ति संचार हेतु विभिन्न उत्सव मनाये जाते हैं इन उत्सवों के पृष्ठाधार लोक विश्वास ही हैं।²

त्यौहारों का सम्बंध ऋतुओं से जुड़ा हुआ हैं और हमारे पर्व और त्यौहार भी उसी क्रम का अनुसरण करते हुए आते हैं। लू के थपेड़े और लम्बी ग्रीष्म ऋतु के पश्चात् जब आकाश में पहली बिजली चमकती दिखाई देती है तो ‘सुरंगी रूत आयी म्हारे देस’ के सम्बोधन से वर्षा का स्वागत किया जाता है। पावस ऋतु के आगमन से धरती पर उल्लास छा जाता है। खेत जुतते हैं किसान, हल और बैल सभी काम पर लग जाते हैं। खेतों में, बागों में, हरियाली छाने लगती है और ऐसे ही समय में पहला त्यौहार आता है तीज ‘आयी ये आयी मां पेले सावण री तीज' बागों में झूले पड़ते हैं सुहागिनें व कन्याएँ जहाँ बन ठन कर श्रृंगारकर गीत गाती हुई झूले झूलती हैं। अन्य अवसरों पर पत्नी अपने पति का नाम नहीं लेती लेकिन तीज पर झूला झूलते समय वह किसी बहाने नाम ले पाती हैं। सगाई हुई नवयुवती के पहली तीज पर उसके ससुराल वाले वस्त्राभूषण 'सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री' और 'घेवर' मिठाई 'सिंझारा' रूप में लेकर आते हैं। शादी के पश्चात् पहली श्रावणी तीज पर बेटी को पीहर लाया जाता हैं। जब तीज पर भाई उसे लेने नहीं आता तो भाई की बाट जोहते जोहते उसकी प्रतीक्षा का बांध टूट जाता है।


तीज तिवारा मां बावड़ी

और सहेल्यां मां पीवरिये ने जाय

म्हें तो तरसूं में मां सासरे

अर्थात् 

श्रावण माह लगा हैं। तीज त्यौहार आये हैं मेरी और सहेलियाँ मां पीहर को जा रही मैं तो ससुराल में ही तरस रही हूँ।

तीज के एक लोक गीत में नवविवाहिता अपने प्रियतम की अनुपस्थिति से उदास हैं

'औरा का पिवजी घरां अ बसत है

म्हारा बसै छै परदेस 

औरा की तीज सुंरगी होसी

 म्हारे घर रहसी रंग काचो'³

अर्थात

औरों के प्रिय तो घर पर ही हैं

और मेरे प्रिय तो परदेश में है

औरों की तीज तो सुरंगी होगी

और मेरे घर रंग कच्चा रहेगा

प्रिय के बिना सब सूना-सूना हैं।


मीरा ने भी श्रावणी तीज का वर्णन अपने पदों में किया हैं -

 सावण आवण कह गया रे बाला करि गया कोल अनेक

गिणतां गिणतां घसि गई सजनी आँगळियां री रेख⁴

अर्थात श्रावण में सभी प्रिया अपने प्रिय के साथ है परन्तु गिरधर मीरा से जो 'कोल' (वचन) करके गये कि शीघ्र लौटूंगा अभी तक लौटकर आये नहीं हैं।

लोकोक्ति भी है ‘तीज तिंवारा बा’वड़ी ले डूबी गणगौर’ राजस्थान में तीज से त्यौहारों की झड़ी लग जाती हैं। चारों ओर प्रसन्नता का वातावरण बन जाता है जो वर्ष भर चलता है।

    भाई बहिन के प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाता हैं। जिसे राखी पून्यू या राखड़ी कहते हैं। इस दिन बहिनें अपने भाइयों के राखी बांधकर उनकी कुशलता की कामना करती हैं।

लोक में भाद्रपद को बड़े महीने के रूप में माना जाता है इस माह के कृष्ण पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है मन्दिरों में विशेष उत्सव रहता है हाथी लिए घोड़े लिए और लिए पालकी जै कन्हैया लाल की से वातावरण गूंज उठता हैं। प्रसाद के रूप में पंजीरी प्राप्त होती हैं। शुक्ल पक्ष में द्वितीया को लोक देवता रामदेवजी की बाबा की बीज, 'देव जी की छठ, नवमी को लोक देवता पाबूजी व गोगाजी की नवमी, दसमी को तेजाजी व चानणी चवदस (शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को सभी देवी देवताओं भोमियाजी और झूझारों की पूजा अर्चना की जाती हैं ) राजस्थान में इस माह में लोक देवी देवताओं की पूजा सर्वाधिक होती है। इस दौरान जैन मतावलम्बी पर्यूषण पर्व मनाते हैं। फिर श्राद्ध पक्ष लग जाता है जो नवरात्रा आने पर पुनः संजीवनी का संचार होता हैं। नवरात्रा की स्थापना के दिन खड़ग पूजा की जाती है। नौ दिन पूजा अर्चना चलती है। होमाष्टमी को हवन पूजन के पश्चात् दशमी को दशहरा मनाया जाता है। राजस्थान में राजाओं का राज रहा है। विभिन्न रियासतों दशहरा मुख्य पर्व था। रावण का वध और राम की विजय जन मानस में विजयोल्लास की भावना को प्रकट करती हैं। इस दिन शस्त्र पूजा व शमी वृक्ष (खेजड़ी) की पूजा की जाती है। लीलटांस पक्षी के दर्शन शुभ माने जाते हैं। वर्तमान में राजस्थान का कोटा दशहरा मेला राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाता हैं। लोक गीत है ‘कोई दसरावा को मुजरों दिवाळ्यां घर की करज्यो जी ढोला।’ दशहरा उत्सव पर सैनिकों को राजा के यहाँ उपस्थित होने जाना पड़ता था लेकिन दीपावली पर उनके आगमन की प्रतीक्षा रहती थी। अच्छी वर्षा होने पर खरीफ की फसल पकने लगती हैं। दीपावली पर नया अनाज आता हैं। एक कहावत भी प्रचलित हे 'दसा दसरावों बीसां दिवाळी' इसी प्रकार 'दीवाळी का दीया दीख्या काचर बोर मतीरा मीठा' दीपावली से पूर्व घरों में रंग रोशन होने लगता हैं। नये वस्त्र आभूषण लोग खरीदते हैं। धनतेरस को कोई न कोई नया बर्तन या वाहन लाते हैं लक्ष्मीपूजन में ईख व मूंज की छिणगा निकाली हुई पन्नी पूजा में रखते हैं।

दीपावली का एक लोक गीत देखिए

'म्हारी माता रे घी भर दिवलो

कुण संजोवे अ मांय

संजोवे ओ म्हारी बहु सोवन के अमर चूड़े सुहाग ओ माय'

अर्थात:- 

मेरी माता घी से भरा दीपक

कौन संजो रहा है

संजो रही मेरी बहू सोवन दे 

अमर चूड़ा सुहाग रहे।


दीपावली को घर-घर दीपक जलाये जाते हैं भगवान श्री राम भी इसी दिन 14 वर्ष का वनवास पूर्ण कर अयोध्या लौटे सी घी में सिका हुआ गेहूँ का दलिया और गुड़ से बना) वर्णन किया है - मुख्य मिष्ठान्न होता हैं। लोग पटाखे छोड़ते हैं और मीठा जीमण करते हैं। दूसरे दिन रामा श्यामा होते हैं। सब लोग एक दूसरे के घर जाकर तैयार की खुशी मनाते हैं। सुपर इलायची की मनुहार की जाती है। सुबह ही गायों के सींग हिरमच से रंग दिए जाते हैं। घर के द्वार पर गोबर का गोवर्धन बनाया जाता है। जा गोर्वधन पूजा की जाती है। पूजा में बिलोने का झेरना, नेतरा, दीपक, लापसी, काचरे, बोर व मतीरा रखकर ले जाते हैं और पशुओं को उस गोरधन के ऊपर से निकालते हैं ताकि वर्षभर पशु बीमार ना हो। दिवाली के बाद भैया दूज (भातृ द्वितीया) मनाई जाती है। प्रस्तुत लोकगीत में भाई-बहन के प्रेम की अपूर्व झलक दिखाई पड़ती है —


'ऊबा तो रे वो बीरा बड़ तळे

पूछो म्हारे मनड़े री बात

काई करे छे बीरा मावड़ी

काई करे गांवां रा लोग'

अर्थात 

हे भैया बरगद के पेड़ नीचे जरा रूकना

मैं अपने मन की बात पूछना चाहती हूँ

भैया माँ क्या कर रही है?

गांव के लोग क्या कर रहे हैं?


लोक में कार्तिक मास की पूजा अर्चना चलती हैं कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली और कार्तिक पूर्णिमा को पुष्कर राजस्थान में मेला भरता हैं।

श्रीमद् भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है

मासानां मार्गशीर्षोइहमृनूनां कुसुमाकर :⁵

अर्थात्:- महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में बसन्त हूँ।


माघमाह में वसंत ऋतु का आगमन होता है। जहाँ प्रकृति नवीन होकर हर शाख, डाल और पत्ता नया होता है। वायु अपनी शीतलता को छोड़कर प्रफुल्लता की ओर बढती है।

वसंत पंचमी को राजस्थान में 'बिस्त पांचे' कहा जाता है इस दिन खेतों से गेहूँ की बालियाँ लाकर उनकी पूजा अर्चना की जाती हैं जिसे 'बिस्त बधाणा' कहते हैं। यानि वसंत का स्वागत !

होली स्वच्छंद आनन्दोत्सव है।⁶ खेतों में रबी की फसल पक कर आने वाली होती हैं। लहलहाती फसल जब पक कर तैयार हो जाये तो किसान मयूर की तरह नाच उठता है। होली का डांड रूपते ही चंग और डफकी आवाज सुनाई देने लगती है पहले यह महीने भर तक चलता था जो अब कुछ दिवसों में सिमट गया हैं। होली के अवसर पर पुरुष वर्ग गैर रमते हैं फाग खेलते हैं। ठाकुर जी के मंदिरों में फूलडोल के उत्सव मनाये जाते हैं। महिलाएँ लूरें लेती हैं। नागमती के वियोग खंड में भीजायसी ने भी होली का वर्णन किया है।

'फाग करहि सब चाँचरि जोरी

मोहिं जिय लाइ दीन्हि जसि होरी "

अर्थात

 सब चाँचर जोड़कर फाग मना रहे हैं 

मेरे जी में जैसे किसी ने होली की आग लगा दी हैं।

 कुछ होरियों व लूरों के उदाहरण देखिए


होळी आई ये फूला की झोली झुरमटियों क ल्यौ

कुणखेले य केसरियों बालो झुरमटियों के ल्यौ।

अर्थात्

होली आई है फूलों की जोड़ी लेकर झूरमठ खेलने चलें ।

यह कौन खेल रहा से केसरिया बाला झुरमुट खेलने चलें।


'खेलौ नी खेलौ गंगश्याम मों संग होरी खेलौ 

अर्थात:- खेलो नी खेलो गंगश्याम मेरे संग होरी खेलो।

कोटा का गजानंद थारा सेल त्यारी कर ले रै सेल त्यारी कर ले झगड़े में चाला रै रावण मारियौ⁸

अर्थात:- कोटा के गजानंद आपका भाला तैयार कर लो रावण को मारने चलें। इसी प्रकार सन् सतावन के स्वाधीनता संग्राम की साख भरती यह होरी

आछो गोरा हट जा

 राज भरतपुर को रे गोरा हट जा

तूं मत जाणी रे गोरा लड़े रे बेटो जाट को ओ कंवर लड़े 

रै राजा दशरथ को गोरा हट जा

अर्थात्

गोरा ( अंग्रेज) हमारे रास्ते से हट जाओ यह राज भरतपुर का है। गोरा हट जाओ तुम मत समझना कि यह जाट का बेटा लड़ रहा, यह कुंवर लड़ रहा है राजा दशरथ का गोरा हट जा ! आउवा और आसोप के ठिकानेदारों ने अंग्रेजों से टक्कर ली इसलिए जनता उन्हें मोतियाँ की माला पहना कर इन लोक गीतों के माध्यम से आज भी अभिनंदन करती हैं।

‘आउवा ने आसोप धणियां मोतियां री माळा ओ

बारे नांकी कूंचिया तोडावीं ताळा ओ झल्ले आउवो’


जहाँ होली मंगळायी (होलिका दहन) जाती हैं उस स्थान पर पहले खेजड़ी की टहनी काट कर रोप दी जाती हैं दिन में होली छापी जाती है। होली का दहन के मुहूर्त अनुसार होली का दहन होता हैं। चंग की थाप पर होरियाँ और फागण गाते गैरियों के दल घुंघरू बांधकर नाचते हैं। होलिका दहन के दौरान उसकी पूजाकर अग्नि प्रज्वलित की जाती हैं जलती होली में से उस टहनी को खींच कर बाहर निकालते हैं वह टहनी प्रह्लाद का प्रतीक हैं जलती होली में लोग अपने घरों से लाये गोबर के 'बड़कुल्ये 'डालते हैं। गेहूँ की बालियों के झूमके को थोड़ा झुलसा लेते हैं। होली की लपटें जिस दिशा में जाती हैं उधर जमाना माना जाता हैं। रामा श्यामा के दिन आकाश में कहीं बादल दिखना अच्छे जमाने का लक्षण माना जाता है। गैर लेकर चंग बजाते हुए टोलियों में लोग एक दूसरे के घर जाते है और मनुहार के रूप में सुपारी इलायची, मिठाई का प्रयोग करते है और एक दूसरे पर गुलाल अबीर डालते हैं। फागुन में महिलाएँ ' फागणियाँ ओढनी विशेष रूप से ओढ़ती हैं। एक लोक गीत भी प्रचलित है

'फगण आयो फागणियों रंगा दे रसिया'


होली के रामा श्यामा (धुलेंडी) से ही गणगौर की पूजा  अर्चना आरम्भ होती है  गौरी और ईसर शिव पार्वती की पूजा है जिसमें कुवारी कन्याएँ अच्छे घर के वर के लिए व सुहागिने अपने अक्षत सुहाग की कामना के लिए पूजा अर्चना करती हैं प्रात: काल होते ही बालिकाएँ अपनी सहेलियों के साथ गीत गाती हुई बगीचें में या कुएं पर चली जाती हैं। जहाँ से जल का कलश व दूब लेकर गीत गाती हुई वे लौटती है। सजातीय सुहागिन महिलायें एक स्थान पर एकत्रित होकर गणगौर का पूजन करती हैं। दीवार परसात कुंमकुंम व काजल की बिन्दिया लगाई जाती हैं व उसी दीवार के सहारे बाजोट पर शिव व पार्वती के छाया चित्र रखे जाते है व उनके सामने जल से भरे कलश रख कर हैं दूब और पुष्प चढ़ाये जाते हैं। 'गौर ये गणगौर माता खोल किवाड़ी' गीत गाकर पूजन का आरंभ होता है और औळ खेळ नंदी जाय औ पाणी कट जासी रै' गीत गाकर कार्यक्रम सम्पूर्ण होता है। मिट्टी की कुंडी में गेहूँ बोये जोते हैं जब उग कर बड़े होते हैं तो उनको 'जुवारा 'कहा जाता हैं उस कुंडी की पूजा की जाती हैं। गणगौर का लोकगीत प्रस्तुत है -

गौरल गौरल गौरजां ये 

गौरल खोल किवाड़ 

बायर ऊबी तीजण्यां ये 

भीतर ऊबा छै राव

अर्थात:

गौरी आप कपाट खोलों बाहर तीजणियां खड़ी है और भीतर खड़े हैं राव


खेलण द्यौ गणगौर भंवर म्हांने पूजण द्यौ गणगौर हो 

जी म्हारी सहेल्यां जोवै बाट बिलाला म्हाने पूजण दयौ गणगौर।

अर्थात:- हे प्रिय आप हमें गणगौर खेलने दो हमें गणगौर पूजने दो मेरी सहेलियां जो रही बाट प्रिय हमें पूजने दो गणगौर !

'ईसर ले चाल्यौ गणगौर

म्हारे सोळा दिना रौ चावी सा 

म्है तो पूज रै रोटी खा ती सा'

अर्थात ईसर गणगौर को ले चला हमारे सोलह दिनों का उत्सव था हम तो पूजा करके भोजन करती थी।

 मीरा बाई ने भी अपने पदों में गणगौर का वर्णन किया है —

सांवलिया आज म्हारै रंगीली गणगौर छै जी'¹⁰


 चेचक महामारी के प्रकोप से बचने के लिए शीतला माता की पूजा की जाती है जिसे 'ठंडा' / बास्येड़ा कहा जाता है इस दिन चूल्हे पर बना कर कुछ नहीं खाते एक दिन पूर्व ही तैयार किया गया मेवज, चावल, दही, सांगरी केर की सब्जी, पूरिया व पपड़ियाँ खाई जाती है इस दिन प्रातः काल गाँव से बाहर किसी खेजड़े के वृक्ष नीचे स्थापित शीतला माता को पूजने जाते है और दही चावल व अन्य सामग्री चढ़ाते हैं उसी समय का यह गीत हैं।

हमै कांई करसाँ ओ हालरिया’ रा बाप,

माताजी चमकिया देस में

गाड़ी जोतू ओ हालरिया री माय,

थाँरे जाऔ बाप रे

गाडी जोती ओ हालरिया रा बाप,

अ गधो पिलाणियो देवी सीतळा

शीतलाष्टमी से संध्या को कन्याएँ  ‘घुड़ला’ घुमाती हैं। घुड़ला एक छोटा सा छिद्रों वाला मिट्टी का घड़ा होता हैं जिसमें दीपक जलता रहता हैं। उस को सिर पर रखकर बालिकाएँ परिचित लोगों के यहाँ (बाजारमें) गीत गाती हुई आती हैं। घुड़ला एक ऐतिहासिक स्मृति का प्रतीक हैं। सम्वत् 1548 वि. चैत्रशुक्ल 9. तृतीया के दिन गौरी पूजन को गई 140 कन्याओं को अजमेर का सूबेदार मल्लूखाँ अपहरण कर ले गया था।¹¹ जोधपुर नरेश राव सातल ने युद्ध कर उन कन्याओं को छुड़ा लिया। युद्ध में घुड़लाखाँ तीरों से छेद कर मारा गया। उसका कटा हुआ सर इन तीजणियों को मिला। वे इसी को प्रतीक रूप में सर पर यह घड़ा लेकर घूमती हैं और गाती हैं


घुड़ला घूमला जी घूमैला घुड़लै रे बांध्या सूत घुडला घूमैला जी घूमैला सवागण बारे आव घुड़ली घूमैला जी घूमैला

म्हारी तेल बळ घी घाल घुड़लौ घूमैला जी घूमैला

मोत्यां रा आखा ल्याव घुड़लौ घूमैला जी घूमैला 


जीवन में जहाँ रिक्तता आती है वहाँ त्यौहार और पर्व आशा और उमंग भरते है ये हमारी संस्कृति के संवाहक है हमारी पीढ़ियों को संस्कारित करने व सामाजिक समरसता के निर्माण में अपना योगदान देते हैं। लोक साहित्य विदों का मानना है कि 'हिंदी साहित्य के निर्माण में लोक साहित्य ने आधारशिला का कार्य किया हैं। हिंदी साहित्य के इतिहासकारों का यह धर्म है कि वे लोक साहित्य के परिप्रक्ष ( पस्पैक्टिव) में हिंदी साहित्य के अनुशीलन तथा शोध का प्रयास करें।¹²


सन्दर्भ सूची:


  1. महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज का आलेख, सम्मेलन पत्रिका 'लोक संस्कृति विशेषांक' भाग 39 संख्या हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग पृ. 22-23
  2. लोक साहित्य विज्ञान डॉ सत्येन्द्र राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर सन् 2006 पृ. 462
  3. राजस्थानी लोकगीत भाग 1 संपादक गंगाप्रसाद कमठान साहित्य संस्थान राजस्थान विश्व विद्यापीठ उदयपुर पृ. 24
  4. मीरां बृहत्त पदावली भाग : 1 हरिनारायण पुरोहित, राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर सन् 1984 पद सं. 218
  5. श्रीमद्भगवदगीता दशमोऽध्याय: श्लोक 35 गीता प्रेस गोरखपुर सं. 2073 पृ. 136
  6. सदा आनन्द रहे एहि द्वारे आँगन का पंछी और बनजारा मन विद्यानिवास मिश्र संस्करण 2002 वाणी प्रकाशन नयी दिल्ली पृ. 92
  7. पद्मावत (मलिक जायसी कृत महाकाव्य) व्याख्याकार वासुदेवशरण अग्रवाल साहित्य सदन, तलैया, झाँसी द्वारा प्रकाशित संस्करण 2002 पू. 351-52
  8. राजस्थान का होरी एवं लूर साहित्य : डॉ जयपाल सिंह राठौड़ सुधन प्रकाशन जोधपुर सन् 2002 पृ. 23
  9. गणगौर के लोक गीत महीपाल सिंह राठौड़ सुधन प्रकाशन जोधपुर सन् 1998 पृ. 17
  10. मीरा बृहत पदावली भाग : 1 हरिनारायण पुरोहित, राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर सन् 1984 पद से 549
  11. मातृ भूमि का मान : डॉ. गोविन्द सिंह राठौड़ सुधन प्रकाशन जोधपुर सन् 2015 पृ. 19
  12. हिंदी साहित्य का वृहत् इतिहास षोडश भाग सं. राहुल सांकृत्यायन, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय नागरी प्रचारिणी सभा काशी सं. 2017 वि. पृ. 15


एक टिप्पणी भेजें