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रविवार, 2 अक्टूबर 2022

हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा — डॉ. महीपाल सिंह राठौड़

जिन ध्वनि चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार विनिमय करता है, उनकी समष्टि को भाषा कहते हैं।¹ 'भाषा' शज्द संस्कृत की 'भाष' धातु से बना है जिसका अर्थ है- बोलना अथवा कहना।² भाषा मानव जाति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अविष्कार और उसकी सबसे बहुमूल्य सज्यजि है। मानव के विकास के साथ-साथ भाषा का भी विकास हुआ है। जो समाज जितना ही अधिक सज्य एवं प्रगतिशील होगा, उसकी भाषा उतनी ही अधिक सज्यन्न होगी।³


हिन्दी शब्द का प्रयोग हिन्द या भारत से सज्बन्धित किसी भी व्यक्ति वस्तु तथा यहाँ बोली जाने वाली भाषाओं के लिए हो सकता है। किन्तु इस व्यापक अर्थ में इस शब्द का प्रयोग अब प्रचलित नहीं है।⁴

प्राचीन अर्थ से प्रस्तुत अर्थ तक आते-आते इस शब्द ने कई शताब्दियों की लज्बी यात्रा की है। ऋग्वेद में सिन्ध और 'सप्त सिन्धवः शज्द नदी और सात नदियों के अर्थ में कई बार मिलता है। सज्भवतः याजकों के साथ इन दोनों शब्दों ने भारत से ईरान यात्रा की। जिसका उल्लेख ईरानियों की प्राचीन धार्मिक पुस्तक 'आवेस्ता' में मिलता है। मध्यकालीन ईरानी काल में विषेषण प्रत्यय 'ईक' जोड़कर हिन्द + इक = ' हिन्दीक' फिर हिन्दी शज्द बना। कालान्तर में अंतिम व्यंजन का लोप हो गया और हिन्दी शज्द हिन्द के विशेषण के रूप में प्रचलित हो गया। इस प्रकार हिन्दी शब्द का मूलरूप हिन्द है।⁵


हमारी भाषा का उद्गम संस्कृत पालि प्राकृत व अपभ्रंश से होते हुए ( 1500 ई. पूर्व से 1000 ई.) तक आधुनिक आर्य भाषाओं से शौरसेनी मागधी व अर्द्धमागधी से हुआ है।⁶ हिन्दी में भारतीय आर्य भाषा से विकसित 46 ध्वनियाँ है जिनमें 11 स्वर तथा 33 व्यंजन हैं।

देश की आजादी के संघर्ष के साथ ही साथ हिन्दी भाषा को एक राज्पर्क भाषा और राष्ट्र भाषा के रूप में मान्यता मिलने लगी।


सन् 1910 में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, राजर्षि पुरुषोजम दास टंडन प्रभृति विद्वानों ने हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास को दृष्टिगत रखते हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की।⁷ सन् 1918 में हिन्दी साहित्य सज्मेलन का आठवां अधिवेशन इंदौर में संपन्न हुआ। अधिवेशन में महात्मा गाँधी ने राष्ट्रभाषा की स्पष्ट व्याज्या की और हिन्दीतर क्षेत्र में उसके प्रचार पर बल दिया 'हिन्दी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। गाँधी प्रांतीय भाषाओं के विकास के समर्थक रहे ।⁸

अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है लेकिन वह राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती।⁹ गांधीजी ने अपने 18 वर्षीय पुत्र देवदास को मद्रास में हिंदी के प्रचार के लिए भेजा।¹⁰ स्वयं गांधी जी ने प्रेमचंद से आग्रह किया था कि वे अपनी पत्रिका ‘हंस’ के माध्यम से हिन्दुस्तानी भाषा को बढ़ावा दें।

अमीर खुसरो ईरान से हिन्दुस्तान आये थे ने खड़ी बोली हिन्दी में रचनाएँ की बादशाह अकबर व जहाँगीर भी हिन्दी को बढ़ावा देते थे। अज्दुर रहीम खान खाना, सिखों के दसवें गुरू गोविन्दसिंह ने भी हिन्दी में कविता की । ब्रहम समाज के प्रचारक केशवचंद सेन ने भी हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रचारित करने की बात कही। आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती गुजराती थे परंतु 'सत्यार्थ प्रकाश' ग्रंथ जो रचा वह हिन्दी गद्य का अच्छा उदाहरण है, महात्मा गांधी स्वयं गुजराती थे परंतु राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रबल समर्थक रहे। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर बंगाली कवि थे परंतु उन्होंने भी प्रांतीय भाषाओं के महत्व को स्वीकार करते हुए 'भाषाओं के हार की मध्य मणि हिन्दी भारत भारती होकर विराजती रहे' की कामना की। तमिल के महान कवि सुब्रहमण्यम भारती ने 1906 में 'इंडिया' नामक पत्रिका में हिन्दी पेज पर स्तंभ लिखते हुए दक्षिणवासियों को हिन्दी सीखने का परामर्श दिया था। अंग्रेजो ने कलकजा में जब फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की तो उन्होंने भी सज्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी गद्य को महत्व दिया। महान् स्वतंत्रता सेनानी सुभाषचन्द्र बोस ने अपनी आजाद हिन्द फौज में क्रमाड देने के लिए हिन्दी को अपनाया था।¹¹

इन हस्तियों पर हिन्दी कौन थोप सकता था? परंतु उन्होंने हिन्दुस्तान की धड़कन को पहचाना और उस भाषा को महत्त्व दिया जो आम जन की भाषा थी। स्वाधीनता संग्राम में भी हिन्दी ने राष्ट्रीय एकता का कार्य किया और आजादी की अलख जगाई | हिन्दी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ इसके लिए संविधान सभा ने प्रारूप तैयार किया। 14 सितंबर 1949 को तीन बजे संविधान सभा में हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकारने हेतु समझौते के प्रयास शुरू हुए और पाँच बजे के लगभग कुछ सहमति हुई। छह बजे को सभी पहलुओं पर विचार विमर्ष कर मुंशी आयंगर फार्मुला कुछ सुधारों के साथ स्वीकार करते हुए हिन्दी को राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित किया गया। राजभाषा हिन्दी का स्वरूप निर्धारित करने के लिए एक प्रारूप समिति रूपायित हुई जिसमें एन गोपाल स्वामी आयंगर एक सदस्य थे।


14 सितंबर, 1949 को भारतीय संविधान समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि भारत की राजभाषा हिन्दी होगी। इसलिए प्रतिवर्ष 14 सितंबर अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है लेकिन वह राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती । गाँधी को हिन्दी दिवस मनाया जाता है।¹² राजभाषा के रूप में स्वीकृति के दौरान जी ने अपने 18 वर्षीय पुत्र देवदास को मद्रास में हिन्दी प्रचार के लिए भेजा।" सर्वाधिक बहस अंकों पर हुई तब डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कहा कि ये अंक स्वयं गांधीजी ने प्रेमचंद से आग्रह किया था कि वे अपनी पत्रिका 'हंस' के असल में हिन्दुस्तान की देन है जो सदियों पहले हमने दुनिया को दिये थे, उनको अपनाकर हम अपनी चीज वापस ले रहे हैं।¹³ संविधान सभा के अध्यक्ष ने भाव विभोर होकर कहा था कि आज पहली बार संविधान में एक भाषा स्वीकार कर रहे हैं।¹⁴ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 120 (भाग 5), अनुच्छेद 210 ( भाग 6) और अनुच्छेद 343-351 ( भाग 17 ) में संघ की राजभाषा शब्द ग्रहण कर लेने चाहिए। नीति का विस्तार से उल्लेख किया गया है।¹⁵

अनुच्छेद 351


हिन्दी भाषा के विकास के लिए निर्देश दिया गया है कि "हिन्दी भाषा की प्रसार वृद्धि करना, उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सब तजवों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके तथा उसकी आत्मीयता में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी और अष्टम अनुसूची में उल्लिखित अन्य भारतीय भाषाओं के रूप शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए तथा जहाँ तक आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द भंडार के लिए मुज्यतः संस्कृत से तथा गौणत: अन्य भाषाओं से शज्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करना संघ का कर्तव्य होगा।¹⁶


जिस भाषा को राष्ट्र के अधिक से अधिक लोग लिख पढ़ समझ तथा बोल सकते हैं वही भाषा राष्ट्र की आत्मा को अभिव्यक्ति प्रदान करती है उसे 'राष्ट्रभाषा' कहते हैं और वह समस्त राष्ट्र की वाणी के रूप में महजा प्राप्त करती हैं। सन् 1917 में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने राष्ट्र भाषा के रूप में अपने विचार व्यक्त किये और कहा कि हिन्दी या हिन्दुस्तानी में वे सब गुण हैं। राष्ट्रभाषा देश की अपनी भाषा हो सकती है विदेशी भाषा नहीं।

हमारे संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को राष्ट्रीय दर्जा दिया गया है - जिनमें असमिया, उड़िया, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, पंजाबी, बगला, मराठी, मलयालम, संस्कृत, सिन्धी, हिन्दी, नेपाली, मणिपुरी, कोंकणी, मैथिली, डोगरी, बोड़ा और संथाली है ।¹⁷ संसद में प्रयुक्त होने वाली भाषा के बारे में अनुच्छेद 120 में यह प्रावधान है कि संसद में सदस्यों द्वारा हिन्दी अथवा अंग्रेजी भाषा प्रयुक्त होगी। और यदि इनमें वह अपनी अभिव्यक्ति नहीं कर पाता है तो सभापति या अध्यक्ष की अनुमति से अपनी मातृभाषा पाव रोटी (पुर्तगाली + हिन्दी ) व रेल गाड़ी (अंग्रेजी + हिन्दी ) आदि 122 में भी सदन को संबोधित कर सकता है। संसद में अंग्रेजी के प्रयोग का विकल्प भारत के संविधान के प्रारंभ होने के पंद्रह वर्षों की कालावधि यानी 26 जनवरी 1965 तक ही था परन्तु वह आज तक प्रयोग में आ रही है।


भारत के राष्ट्रपति ने 7 जून 1955 को राजभाषा आयोग की नियुक्ति की। हिंदोस्तानिका डच भाषा में सन् 1698 में लिखा । इसी तरह हिन्दी साहित्य का 1957 में संसदीय राजभाषा समिति का गठन किया व 1963 में राजभाषा पहला इतिहास फ्रांसीसी विद्वान् गासद तासी नामक विद्वान् ने सन् 1839 में अधिनियम पारित कर सरकार ने राजभाषा के सज्बन्ध में तुष्टिकरण की नीति अपनाई फ्रेंच भाषा में लिखा। सरकारी प्रयोजनों में हिन्दी का प्रयोग बढ़ाने के लिए राजभाषा संबोधन अधिनियम 1967 पारित किया गया।¹⁸

राजभाषा का दर्जा प्राप्त होने पर हिन्दी पर बड़ी जिज्मेदारी आ गई¹⁹ अब वह केवल कविता और कहानी की भाषा न होकर ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और विधि की भाषा थी इसलिए विभिन्न विचारधाराओं के बीच संतुलित मार्ग अपनाने और अखिल भारतीय स्तर पर शब्दावली निर्माण के सिद्धांतों का निर्धारण करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने 1961 में वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग जाता है। की स्थापना की²⁰ और उसे तकनीकी शब्दावली के मानकीकरण का जिज्मा सौंपा आयोग ने देश भर के वैज्ञानिकों व विषय विशेषज्ञों और भाषाविदों से विचार विमर्श करके अखिल भारतीय स्तर पर शब्दावली निर्माण के कई सिद्धांत बनाए जिनमें चार महत्वपूर्ण है


  1. अंतरराष्ट्रीय शब्दों के प्रचलित अंग्रेजी रूपों को अपना लिया जाये। किलोमीटर, मीटर, रेडियो पेट्रोल, प्लेटफार्म कार, सिग्नल आदि ।
  2. हिन्दी पर्यायों का चुनाव करते समय ऐसे सभी शब्दों को ग्रहण कर लेना चाहिए जो प्रचलन में हो रकम, कुर्की, मुआवजा आदि । 
  3. अपनी भाषा में शब्द न हो तो अन्य भारतीय भाषाओं से तकनीकी शब्द ग्रहण कर लेने चाहिए।
  4. यदि इन युक्तियों से पारिभाषिक शब्द उपलब्ध न हो तो संस्कृत को आधार मानकर शब्दों का निर्माण करना चाहिए।

वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा प्रकाशित पारिभाषिक शब्द संग्रहों को मुज्य आधार मानना चाहिए। आयोग ने 40 से अधिक पारिभाषिक कोश तैयार किये हैं जिसमें विभिन्न विषयों के 5 लाख से अधिक शब्दों का निर्माण हुआ है। वृहत् पारिभाषिक शब्द संग्रह (मानविकी) - दो खंडों में उपलज्ध है। जिसमें लगभग 1 लाख शब्द हैं। पारिभाषिक शब्दावली को देखें तो पायेंगे कि हिन्दी के कई शब्द अंग्रेजी शब्दों से ज्यादा सज्प्रेषणीय है उदाहरणार्थ

शरीर रचना - Anatomy, स्तनधारी Mammal, अस्थिरोग विज्ञान - Orthopedics, त्वचा रोग विज्ञान- Dermatology, नेत्ररोग Opthalmology, रक्तस्राव Haemorrhage²¹


हिन्दी का शब्द भण्डार तत्सम, तद्भव, देशज व विदेशी शब्दों से समृद्ध है। कुछ विदेशी भाषाओं के शब्द तो हमारे बीच रच बस गये हैं- उनके उदाहरण देखिये–

पश्तो का आचार व अखरोट तुर्की के कुर्ता और चोगा। अरबी फारसी के पजामा, कमीज और साफा | पुर्तगाली का अन्नास, अलमारी, आलपिन व काजू । अंग्रेजी के मास्टर, स्कूल, कॉलेज, जार्जेट व अफसर फ्रांसीसी के कारतूस व कूपन इच के तुरूप स्पेनी के अल्पाका रूसी के जार, वोदका चीनी के चाय, चीकू, लीची व जापानी के रिक्शा ।


इसी तरह भारतीय भाषाओं के शब्द जो अखिल भारतीय स्तर पर मान्य हुए हैं द्रविड़ के इडली डोसा | मराठी का श्रीखंड गुजराती का हड़ताल। बंगाली के रसगुल्ला, संदेश व चमचम पंजाबी के छोले। अब हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके है।

कुछ शब्द देशी व विदेशी के मिश्रण से बने है जैसे

पावरोटी (पुर्तगाली + हिन्दी) रेलगाड़ी (अंग्रेजी + हिन्दी)²²

शब्दों का आदान-प्रदान हमारे मेल-जोल को बढ़ाकर आत्मीयता प्रगट करता है। विदेशी विद्वानों ने हिन्दी पर महत्वपूर्ण कार्य किया है हिन्दी का पहला व्याकरण ग्रंथ 'जॉन जोशुवा कंटलर ने 'ग्रामाटिका हिन्दोस्तानिका’ डच भाषा में सन 1698 में लिखा। इसी तरह हिंदी साहित्य का पहला इतिहास फ्रांसीसी विद्वान गार्साद तासी नामक विद्वान ने सन् 1839 में फ्रेंच भाषा में लिखा।

जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने 'भारत भाषा सर्वेक्षण 1897 ई. में पूरा किया। जो भारतीय भाषाओं के अध्ययन का महत्वपूर्ण आधार है।

रूस ने हिन्दी को विश्व में सर्वाधिक प्रतिष्ठा दी। रूसी विद्वान अलेक्सेई पेत्रोविच बरान्निकोव व उनके परिवार ने कर्मठता से हिन्दी की सेवा की है। हिन्दी फिल्मों और गानों ने भी हिन्दी को प्रचारित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है रूस में राजकपूर का गाना 'मेरा जूता है जापानी' बड़े शौक से बजाया जाता है।

चीन के पेइचिंग विश्वविद्यालय में 1949 से हिन्दी का अध्ययन व शोध जारी है। वहाँ के प्रो ल्यू आन ऊ ने प्रेमचंद पर महत्वपूर्ण शोध किया है।

जापान के ज्यूया दोई ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी भाषा और साहित्य का अध्ययन किया। ज्यूया दोई ने प्रेमचंद कृत 'गोदान' का जापानी में अनुवाद किया जिसकी पाँच लाख से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी है।

     पोलिश के विद्वान युल्यूष पानोवस्की ने 'रेणु' के 'मैला आंचल का अनुवाद पोलिश में किया है। इंग्लैण्ड के डॉ. मैकग्रेगर ने नंददास की 'रास पंचाध्यायी' तथा भ्रमर गीत का अंग्रेजी अनुवाद 'द राउंड डांस ऑफ कृष्णा एड उद्धव मैसेज' शीर्षक से प्रकाशित किया है।²³


           भारतीय संसद के अधिनियम से स्थापित महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में कार्य कर रहा है। विश्व हिन्दी सचिवालय 2008 से मॉरीशस मैं कार्यरत है। इसी प्रकार हिन्दी का पहला शोध कार्य ' तुलसी का धर्म दर्शन' सन् 1918 में जे. आर. कारपेन्टर ने लंदन विश्वविद्यालय से किया था हिन्दी के पहले और कवि इकबाल के शब्दों में 'हिन्दी हैं हम, वतन है हिंदोस्ता हमारा' 134 प्रोफेसर जॉन गिल क्राइस्ट बने और विश्वविद्यालय स्तर का हिन्दी अध्यापन सन् 1919 में कलकजा विश्वविद्यालय में आरंभ हुआ। हिन्दी में सर्वप्रथम एम. ए. बंगाली सज्जन नलिनी मोहन सन्याल ने सन् 1919 में किया।

      भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'हिन्दी नई चाल में ढली को एक महत्वपूर्ण घटना मानते हुए 'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल माना ' महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' का सज्यादन कर हिन्दी गद्य का निर्माण किया जिसे निराला और मैथिली शरण गुप्त जैसे कवि भी स्वीकारते हैं। महामना मदनमोहन मालवीय ने हिन्दी को कचहरी की भाषा के रूप में मान्यता दिलवायी। इसी प्रकार शारदा चरण मित्र बंगाली होते हुए भी देवनागरी लिपि के प्रचारक रहे। माधव राव सप्रे मराठी थे परंतु हिन्दी और देवनागरी लिपि के समर्थक रहे।²⁴

हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है इसका विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है। देवनागरी लिपि विश्व की वैज्ञानिक लिपि है। इसमें जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखते हैं और जैसा लिखते हैं वैसा ही पढ़ते हैं जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। उदाहरण द्रष्टव्य है–

वहाँ एक ही क ध्वनि चार तरह से लिखी जाती है। कैट | CAT) सी से, कोरस (Chorus) सी एच से, काइट ( Crime ) के से और कोरम (Quorum) ज्यू-यू से। यही नहीं उसी सी (C) का प्रयोग कहीं लिए भी होता है जैसे सेन्चुरी ( Century) में, जबकि सन (Sun) में स के लिए - (S) का प्रयोग है फिर वही सी एच च से मिलती-जुलती ध्वनि लिखी जाती है जैसे चान्स (Chance) में या उसी से श ध्वनि भी लिखी जाती है।²⁵


लगभग 176 विदेशी विश्वविद्यालयों में हिन्दी का अध्ययन अध्यापन होता है।

‘हिन्दी शब्द सागर’ के ग्यारह भागों में लगभग दो करोड़ ग्यारह लाख पचास हजार शज्द उपलब्ध हैं²⁶ तकनीकी शब्दावली आयोग निदेशालय ने लगभग चार लाख अंग्रेजी के तकनीकी शब्दों के हिन्दी समानार्थी प्रकाशित कर दिए हैं। संस्कृत की 2000 धातुएँ अनेक तकनीकी शब्दों के निर्माण में सहायक सिद्ध हुई है।²⁷ सन् 2008 से भारत सरकार ने सरकारी कार्यालयों में सूचनाओं । मिसिल दस्तावेजों के लिए युनिकोड फॉन्ट को मानक रूप में स्वीकार कर अच्छी पहल की है।²⁸

प्रसिद्ध वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन भी जब विज्ञान विषयक चर्चा में अधिक रम जाते थे तो अंग्रेजी छोड़कर अपनी मातृभाषा जर्मन में बोलने लगते थे।²⁹

सभी दक्षिण भारतीय हिन्दी विरोधी नहीं है, दक्षिण भारत के मोटूरि सत्यनारायण, एम. सुब्रमण्यम, वासुदेवन पिल्ले व नावड़ा जी ने हिन्दी प्रचार प्रसार का जो कार्य किया वह स्तुत्य है।³⁰ विशाखापट्टनम के समुद्र तट के किनारे सड़क के सहारे सहारे लगाई गई साहित्यकारों की मूर्तियाँ उनके प्रति आदर भाव प्रकट करती नजर आती है।³¹

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का भी मत था कि 'सभी भारतवासियों का यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वे हिन्दी को अपनी भाषा के रूप में अपनाएँ।³²

 महादेवी वर्मा ने ठीक ही कहा कि हिन्दी अपना भविष्य किसी से दान में नहीं चाहती, हिन्दी का भविष्य तो उसकी गति का स्वाभाविक परिणाम होना चाहिए। डॉ. कुंअर बेचैन के शब्दों में मधु प्यार की भाषा हिन्दी / मनुहार की भाषा

हिन्दी / सारी दुनिया कहती है है प्यार की भाषा हिन्दी।³³


संदर्भ सूची:


  • 1. हिन्दी साहित्य कोश भाग 1 सं. धीरेन्द्र वर्मा ज्ञानमण्डल लिमिटेड वाराणसी सन् 1985 पृ.463
  • 2. प्रयोजनमूलक हिन्दी सिद्धांत और प्रयोग डॉ. दंगल झाल्टे वाणी प्रकाशन नयी दिल्ली सन् 2002 पृ. 15
  • 3. हिन्दी व्याकरण तथा रचना रमापति शुज्ल विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी सन् 1977 पृ. 4
  • 4 हिन्दी साहित्य कोश भाग 1 से धीरेन्द्र वर्मा ज्ञानमण्डल लिमिटेड वाराणसी सन् 1985 पृ. 967 
  • 5. वही, पृ. 968
  • 6. हिन्दी भाषा और नागरी लिपि डॉ. भोलानाथ तिवारी लोक भारती प्रकाशन इलाहाबाद सन् 1994 पू. 16
  • 7. राष्ट्रभाषा हिन्दी और महात्मा गांधी बालशौरि रेड्डी का लेख राजभाषा हिन्दी प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार सन् 2002. पृ. 25
  • 8. राष्ट्रभाषा पर विचार: चंद्रबली पांडेय नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी संवत् 2041 पृ. 112-114
  • 9. हिन्दी हम सबकी संपादक डॉ. श्याम सिंह शशि प्रकाशन विभाग सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार दिसम्बर 2009 पृ. 24 
  • 10. राष्ट्रभाषा हिन्दी और महात्मा गांधी बालशौरि रेड्डी का लेख राजभाषा हिन्दी प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार सन् 2002, पृ. 27
  • 11. राजभाषा हिन्दी देवनागरी लिपि और सामासिक प्रकृति राजकुमार सैनी का लेख राजभाषा हिन्दी प्रकाशन विभाग सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार सन् 2002 पृ. 54 से 57
  • 12. प्रयोजनमूलक हिन्दी डॉ. पी. लता लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद सन् 2015 पृ.43
  • 13. वही, पृ. 43
  • 14. राजभाषा नीति और कार्यान्वयन सवैधानिक और सांविधिक प्रावधान, कृष्ण कुमार गोवर का लेख राजभाषा हिन्दी : प्रकाशन विभाग सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार सन् 2002 पृ. 63
  • 15. वही, पृ.63
  • 16. राजभाषा के रूप में हिन्दी की विकास यात्रा महेन्द्र सिंह राणा का लेख गवेषणा अंक 105 जुलाई - दिसम्बर, 2015 केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा, पृ. 48
  • 17. प्रयोजनमूलक हिन्दी डॉ. पी. लता लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद सन् 2015. पृ. 271
  • 18 प्रयोजनमूलक हिन्दी डॉ. पी. लता लोक भारती प्रकाशन इलाहाबाद सन् पृ. 62
  • 19. अनुवाद विविध अनुप्रयोग एवं चुनौतिया, मीता शर्मा का लेख स्मारिका 10 या विश्व हिन्दी सम्मेलन भोपाल 10-12 सितंबर 2015, पृ. 191
  • 20. पारिभाषिक शब्दावली और अनुवाद की समस्याएँ सूरजभान सिंह का लेख राजभाषा हिन्दी प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार सन् 2002, पृ. 103
  • 21. वही, पृ. 98 
  • 22. हिन्दी भाषा और नागरी लिपि: डॉ. भोलानाथ तिवारी लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद सन् 1994 पृ. 50-581 
  • 23. विश्व में हिन्दी अध्ययन और अध्यापन की स्थिति विमलेश कांति वर्मा का लेख राजभाषा हिन्दी प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार सन् 2002 पृ. 245-75 
  • 24. हिन्दी के निर्माताः कुमुद शर्मा भारतीय ज्ञानपीठ सन् 2006 पृ. 96
  • 25. ईक्षा (भारतीय भाषा साहित्य संगम, भोजपुर आरा (बिहार) की पत्रिका सं.डॉ. परशुरामसिंह अंक 14 वर्ष 2016 पृ. 55.
  • 26. राजभाषा के रूप में हिन्दी की विकास यात्रा महेन्द्र सिंह राणा का लेख गवेषणा पृ. 53. 
  • 27. यही पृ. 53
  • 28. इंडिक लिपियों में अंतर्निहित समानता विजय कुमार मल्होत्रा का लेख, गगनांचल वर्ष 38, अंक 4-5 जुलाई अक्टूबर 2015, पृ. 143
  • 29. ज्ञान विज्ञान और रोजगार की भाषा के रूप में हिन्दी पवन जैन का लेख गगनांचल वही पृ. 184 
  • 30. हिन्दी कल आज और कल प्रो. एम ज्ञानम का लेख गगनांचल व्ही, पृ. 121
  • 31. महत्वपूर्ण प्रचारक एवं प्रसारक आचार्य बालगड्डा लक्ष्मीप्रसाद का लेख गगनांचल वही, पृ. 124 
  • 32. 10 वां विश्व हिन्दी सज्मेलन, 10-2 सित. 2015 भोपाल स्मारिका पृ. 83 
  • 33. है प्यार की भाषा हिन्दी डॉ. कुंअर बेचैन की कविता- गगनांचल, वही पृ.28
  •   34. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास बच्चनसिंह राधाकृष्ण प्रकाशन नई दिल्ली सन् 2005, पृ.17


 

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