दाड़म सूखे आंगणे — डॉ. महीपाल सिंह राठौड़
होली उत्साह और उमंग का त्यौहार है चाँदनी रातें, खेतों में पकती फसलें, नये कोंपल पत्तों के बीच वातावरण में घुलती मादकता । गाँव ढाणियों में बजते चंग और कहीं कहीं गाँव के चौगान में लूरें लेती महिलाएँ। राजस्थान में कृषक व श्रमिक वर्ग की महिलाएँ होली के अवसर पर अपनी मुखर अभिव्यक्ति इन लूरों के माध्यम से ही करती हैं। लूर नृत्य गीत हैं जिनमें दो दलों में बँटी महिलाएँ कदम बढ़ाती, पीछे हटाती, चक्राकार होती घूमर लेती हुई नाचती गाती है। ये श्रमिक वर्ग की महिलाओं के स्वेद कण हैं जो लोक जीवन में निथर कर आते हैं। होली का इंतजार तो सभी को है इसीलिए होली आने से पहले होली का स्वागत छोटी छोटी बालिकाएँ इस लोक गीत में करती हैं - ‘होळी आई रे फूलों की झोळी/झरमटियों के ल्यौ’ होली आयी हैं फूलों की झोली भरकर झुरमुट खेलने चलें
लूर लेने वाली बालिका अपनी माँ से कहती है कि माँ पीली पीली चने की दाल कितनी सुंदर लगती है उसी तरह लूर भी — माय पीळी पीळी दाळ चिणा की ओ माय लूर बाजेली
लू लेते-लेते जब रात चढ़ जाती हैं और घर के दूसरे लोग सो रहे होते हैं। चाँद चढ़कर शिखर पर आ गया है और कृतिका नक्षत्र अब अस्त होने को चलें हैं। बाई अब घर चलो, माँ तुम्हें मारेगी, बाबा गाली देंगे बड़े भैय्या डाँटेंगे पर छोटा भाई कहता है मेरी बहिन को गाली मत दो वह परदेशी है आज नहीं तो कल उड़ जायेगी -
चाँद चढ्यौ गिगनार किरत्यां ढळ रही ये जी ढळ रही यै / बाईसा घरां पधार मायड़ मारे ला जी मारे ला / बाबोसा दे ला गाळ बडोड़ो बीरो बरजे ला जी बरजे ला/मत दयौ बाई ने गाळ बाई म्हारी परदेसण जी परदेसण
लूरों में नारी ने अपने मन की वे बातें भी कही है जिन्हें वह साधारणतया व्यक्त नहीं कर सकती। पुरुष प्रधान समाज, जातीय बंधन, गाँव के ठाकुर और पंच लेकिन होली के अवसर पर उसे छूट है उसी अवसर का लाभ लेकर वह नारी चेतना व स्वातंत्र्य की बात करती है।
जायसी ने 'पद्मावत' के नागमती वियोग वर्णन में जो उपमा दी है वही उपमा इस लूर में है रस से भरी अनार आँगन में सूख रही है। और प्रिया सूख रही अपने पिता के घर क्योंकि उसका पीव परदेश में है -
दाड़म सूखे आंगणे रस दाड़म के माय / गोरी सूखे बाप के परदेस्यां की नार
हमारे यहाँ बाल विवाह की प्रथा रही है — एक युवती यौवन की पीड़ा को इस माध्यम से लूर में व्यक्त करती है- कपड़ा हो तो में उसके पैबंद लगा लूं परंतु उफनती हुई छाती का यौवन किस में रखूं मेरा गौना शीघ्र कर दो-
उफणती छतियां रो जोबन का में राखू ओ कर दो मुकलाव
व्याकरण की दृष्टि से तो रुपया में 'र' छोटा व रूप में बड़ा है परंतु व्यवहार में इसका उल्टा है ! रुपयों के लालच में पिता अपनी कन्या को उसकी उम्र से दुगुने उम्र के वर के साथ भी व्याहते आये हैं। बेटी बेजुबान है बोल नहीं सकती पति परमेश्वर है पर इस लोभ में वह भाँवरे दिलवाने वाले पंडित व लोभी पिता दोनों को आड़े हाथों लेती है
चंवरी में बैठाय बामण आछो धूंओ करियो रे/मांया आगे बैठने पछतावो करियो रे / बूढो परणायो / बाबलियो मड़ा लोभी रे / बूढो परणायो
बूढ़े पति के साथ भाँवरे तो ले लिए पर अब उसकी स्थिति हास्यास्पद है नई दुल्हन और बूढा पति सुहाग रात मनाना तो दूर वह महल में चढ़ते हुए पर हाथ रख रहा है और हर जीने पर साँस फूल रही है।
बूढलियो बर म्हैल चढे / ओ गोडा दे दे हाथ / अ म्हे म्हारा बाबाजी ने इंया कयौ / ओ जोड़ी रो वर जोई
लूर में वह स्पष्ट कह रही है बाबा मेरी जोड़ी का वर देखना, शायद एक नवयौवना के लिए सबसे ऊपर उठकर वही कामना है। जोड़ी का वर और वह जिम्मेदारी पिता की है कि रुपयों या प्रतिष्ठा के प्रलोभन में नहीं आये । अनमेल विवाह जिसमें पत्नी मदमाते यौवन में और पति नादान बालक है ससुराल आये हुए उसे काफी दिन हो गये परंतु उसे अपनी बात कहने का, मंशा पूर्ण करने का अवसर नहीं मिला वह निराश होकर पीहर जा रही है पीहर जाते उसने पलंग को खड़ा कर दिया और सास को जवाब दिया कि मुझे छोटा पति ब्याह दिया वह तो महीने भर में सिर्फ एक बार मिलने आया।
पीवर जाती ढोलियो ऊभौ कीदो रे / पाछी घिरती सासू ने जवाब दीन्हो रे नैनो परणायो / वहा रे नैनो परणायो/ महीनां में अकारु आयो रे नैनो परणायो।
संयुक्त परिवार गाँवों में टूटते हुए नजर आते हैं देवरानी जेठानी के विवाद में वह पति को घर से अलग होकर सामने वाली हवेली लेने का कहती है जिस तरह आज फ्लैट लेने का आग्रह बन पड़ा है।
चूल्हे के पास बैठा जेठ ताने मार देता है यह बात नयी दुल्हन को नहीं सुहाती वह पति से कहती है कि ऐसा क्या है हम भी मेहनत करके खा रहे हैं जेठानी कोई मुफ्त में नहीं खिला रही —
चूल्हे कनै बैठो जेठ आवळ कावळ बोले वो / ओड़ो कांई जेठाणी पड़िये ने पाळे वो क न्यारा हो ज्यावौ / वा वा न्यारा हो ज्यावौ सामली हवेली ले लो वो क न्यारा हो ज्यावौ
सौत आने से ननद और भावज का प्रेम तो बढ़ गया पर सौत फूटी आँख नहीं सुहाती ! ननद ने जो मेंहदी लगायी वह तो सुंदर बूटीदार है और सौत ने लगायी वह बड़े - बड़े धब्बेनुमा है क्योंकि उसने जलते कलेजे से मेरे हाथों में मेंहदी लगाई है —
नैनी नैनी म्हेंदी म्हारी नणदल बाई दीनी ओ / मोटोड़ा पचेटा म्हारी सौत दीनां वो क बळते काळजियै / वा वा बळते काळजियै हाथां री मेंहदी काळी पड़गी ओ / बळते काळजियै
सौदा लेने के लिए आज भी ग्रामीणों को शहर में आना होता है तो पुराने जमाने में तो शहर आना और भी बड़ी बात थी। ऐसे में शहर में हड़ताल हो जाने पर उसका असर कितना व्यापक पड़ता एक प्रसूता को प्रसव के पश्चात खाने को अजवाइन नहीं मिली। सहेलियाँ उससे पूछती है कि तुम्हारा रंग काला कैसे पड़ गया ? तो वह कहती है.
साथणियां बूझे ये बाई / तूं काळी कीकर पड़गी अ / जोधाणा जेड़ा सेर में हड़ताल हुयगी रे / अजमो मिलियो नी
अजवाइन खाने को मिल जाती तो रंग भी गोरा हो जाता।
जीवन की रंगशाला में एक महिला को कितनी भूमिकाएँ निभानी होती है। दुविधा में है एक तरफ तो नन्हा सा बच्चा है दूसरी तरफ पीव दोनों की आकांक्षाओं पर एक साथ खरा उतरना दोनों को संतुष्ट करना है
गीगा घड़ी ये क सोज्या / परण्यौ रिसायौ / आजू सूत्यौ गीगलौ/ बाजू सूत्यौ पीव / इण दोन्या के बीच में / म्हारो नाजुक सो जीव ।
प्रिया अपने प्रिय से तंबाकू का नशा छोड़ने का कहती है-
तारां तो छायी राज री रात / किरत्यां तो छाय माळिया जी राज / फुलड़ा तो छायी थारी सेज / सेज्यां में छायी गोरड़ी जी / म्है थान बरजां गौरी रा स्याम / तंबाकू पीबो छोडदयौ जी
नशे का प्रचलन समाज में बढ़ने लगा और नगरीय सभ्यता के साथ वे लोग भी इसको अपनाने लगे जो कभी कोसों दूर थे सेठानी ने जब शराब पी ली तो लूर में उसका वर्णन आ ही गया —
सेठा थांरी सेठाणी इन्याव काम कीदो रे / कांसी वाळी बाटकी में दारू पीदो रे वगड़ी सेठाणी
जयपुर की लंबी चौड़ी सड़के और बाजार सभी के आकर्षण का केन्द्र रहा है। वहाँ मनचले भी मिल जाते हैं उसे बंदर की उपमा दी गयी है -
जैपर का बजार में बूढ्यौ बंदर जाय / हाथ में अंतर की सीसी झाला देतो जाय
लूरों ने ठाकुर साहब को भी नहीं बख्शा है- एक गाँव के ठाकुर के पास घोड़ी तो दूसरा साधन विहिन है उसी का वर्णन देखिए-
सर वाळा ठाकरसा रे भंवर घोड़ी चढवा ने / सरेचां रे ठाकरसा रे गधी चढवा ने वळिया कानां री
उत्तरदायी लोगों ने जब अपने कर्तव्य से विमुख होकर आँखें मूंद ली तो लूर में वर्णित हो गयी लोग अपनी परम्परा और मर्यादा भूल गए —
आधे माथै पोतियों अधखेला बांधे रे विलपर विगड़ियो / विलपर वाळा राजा राली ओढी रे विलपर विडियो
जातीय संघर्ष और श्रम का मूल्य निर्धारण भी लूरों में देखने को मिलेगा। बिना परिश्रम समाज में कोई महत्व नहीं आखिर कृषक वर्ग जमींदार की पत्नी पर प्रश्न चिह्न लगा ही देता है —
अणदी अेक टका की रांगड़ी खूणे बैठी खाय / अणदी अ लाख रिप्यां की जाटणी खेत कमाबा जाय
शासन व्यवस्था में बदलाव के साथ ही वोटों की राजनीति सक्रिय हो गयी। सत्ता प्राप्ति के लिए सभी कुछ करना जायज मान लिया गया है। प्रत्याशी गाँव-गाँव वोट माँगते घूम रहे हैं। सर ( गाँव का नाम ) के चौधरियों से वोट माँग रहे कि वो हमें दो हार जीत तो दूर है वह रुपयों से बर्बाद हो गया। यह हमारी वोटों की राजनीति पर करारा व्यंग्य है —
कांगरेस रो कानुड़ो मोटर लिया फरे रे / सर वाळा चोधरियां सूं मांगे रे वोट म्हांने दो / रुपियां सूं बरबाद गारे वोट म्हाने दो
पश्चात्य लोकवार्ता विद प्रो. किटरिज का मत है कि शिक्षा इस मौखिक साहित्य की मित्र नहीं होती और यही हो रहा है आज जातीय पंचायतें इनके गायन पर रोक लगा रही है क्योंकि लूरें पिछड़ पन की प्रतीक मानी जाती है।
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