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शनिवार, 1 अक्टूबर 2022

साहित्य में वर्णित किसान — डॉ. महीपाल सिंह राठौड़

 साहित्य में वर्णित किसान — डॉ. महीपाल सिंह राठौड़ 


कृषि हमारा मुख्य कार्य रहा है और इस कार्य को करने वाला किसान भी सदियों से हल बैल और अब आधुनिक संसाधन लेकर खेत की जुताई करता रहा है। वह अन्न का उत्पादन करता है। अनुपजाऊ व ऊबड़ खाबड़ भूमि को अपने परिश्रम से उपजाऊ समतल और सुरम्य बनाता है। यह कार्य विश्व के सभी देशों में होता रहा है, लेकिन उस किसान का वर्णन इतिहास ग्रंथों और रचनाकारों के यहाँ नगण्य मिलता है क्योंकि वह खेत में कार्यशील रहता है, कर्मवीर हैं। प्रस्तुत शोध पत्र में वेदों से लेकर आधुनिक रचनाकारों की कलम में कृषि और कृषि कार्य करने वाले किसान और उसके परिवार / सदस्य व पशुधन का जो वर्णन मिलता है उसका वर्णन प्रस्तुत करने का प्रयास किया जायेगा। ऋग्वेद में कृषि कार्य करने वाले किसान का वर्णन किया गया है। 

यून ऊ षु नविष्ठया वृष्ण: पावकाँ अभि सोभरे गिरा।

गाय गा इव चर्कृषत।¹


अर्थात् - हे सोभरि ऋषे ! जिस प्रकार कृषक कृषि कार्य करते समय अपने वृषभों को रिझाने के लिए गीत गाते हैं, उसी प्रकार आप उन शक्तिशाली पवित्र तथा नव ( युवक ) वीर मरुतों के लिए नवीन स्तोत्रों का पाठ करें।


इसी प्रकार संस्कृत साहित्य में कृषक का वर्णन मिलता है जहाँ उसके दुर्भाग्य को रेखांकित किया गया है


कृषीवल :

बीजच्छलेन

स्वयौवनं क्षेत्रे निक्षिपति

तथापि 

तस्य-कोष्ठागार

सन्ति वञ्चनायुक्ता निराशाः।।²



अर्थात् कृषक बीज के व्याज से अपने यौवन को सींचता है तथापि उसके कोठागार में रहती है वंचनायुक्त निराशायें।

वाल्मीकि रामायण में हेमन्त ऋतु वर्णन में रबी की फसल का वर्णन मिलता है

नीहारपरुषो लोकः पृथिवी सस्यमालिनी।

जलान्यनुपभोग्यानि सुभगो हव्यवाहनः।।

अर्थात् - इस ऋतु में अधिक ठण्डक या पाले के कारण लोगों का शरीर रूखा हो जाता है। पृथ्वी पर रबी की खेती लहलहाने लगती है। जल अधिक शीतल होने के कारण पीने के योग्य नहीं रहता और आग बड़ी प्रिय लगती है । कवि ने आगे वर्णन किया है

बाष्पच्छन्नान्यरण्यानि यवगोधूमवन्ति च । शोभन्तेऽभ्युदिते सूर्ये नदद्भिः कौच्चसारसैः।।

अर्थात्  जौ और गेहूँ के खेतों से युक्त ये बहुसंख्यक बन भाप से ढँके हुए हैं तथा कौच्च और सारस इनमें कळख कर रहे हैं। सूर्योदय काल में इन वनों की बड़ी शोभा हो रही है।

लोकं सुवृष्टया परितोषयित्वा नदीस्तटाकानि च पूरयित्वा ।

निष्पन्नसस्यां वसुधां च कृत्वा त्यक्त्वा नभस्तोयधराः प्रणष्टाः ।।³

 अर्थात् - अच्छी वर्षा से लोगों को संतुष्ट करके, नदियों और तालाबों को पानी से भरकर तथा भूतल को परिपक्व धान की खेती से सम्पन्न करके बादल आकाश छोड़कर अदृश्य हो गये ।

महाकवि कालिदास ने ईख के खेत का वर्णन किया है –

इक्षुच्छायानिषादिन्यस्तस्य गोप्तुर्गुणोदयम्

आकुमार कथोद्धात शालिगोप्यो जगुर्यशः ।।⁴ 

अर्थात् - ईख की छाया में बैठी हुई साठी आदि धान की रखवाली करने वाली किसानों की स्त्रियों ने रक्षा करने वाले उन रघु महाराज के शूरता उदारता आदि गुणों से प्रकट हुए बालकों तक से तारीफ किये गये यश का गान किया। महाकवि माघ ने दूध दूहती हुई गाय का वर्णन किया है

प्रीत्या नियुक्तांल्लिहती स्तनन्धयान्निगृह्य परीमुभयने जानुनोः ।

वर्धिष्णुधारा ध्वनि रोहिगाः पयश्चिरं निदध्यौ दुहतः स गोदहुः ।।⁵

अर्थ – (बाएँ पैर में) बाँधे गये बछड़ों को स्नेह से चाटती हुई गायों से दोनों घुटनों से दुहने के वर्तन को दबाकर बढ़ते हुए धारा के शब्द के साथ-साथ, दूध को दूहते हुए गाय दूहनेवालों को उन श्रीकृष्ण भगवान ने देर तक अच्छी तरह देखा ।

12वीं सदी की कवयित्री विज्जका ने धान कूटती स्त्रियों का सुंदर वर्णन किया हैं -

विलासमसृणोल्लसन्मुसललोलदोः कन्दली

परस्परपरिस्खलद्वलयनिः स्वनोद्बन्धुराः।

लसन्ति कलहुकृतिप्रसभकम्पितोरःस्थल

त्रुदगमक संकुलाः कलभगणडनी गीतयः ।।⁶

अर्थ:  स्त्रियाँ धान कूट रही हैं और साथ-साथ गाना भी गा रही हैं। मूसल उठाने और गिराने के कारण उनकी चूड़ियाँ खनक रही हैं। उनका उरः स्थल हिल रहा है। मीठी हुंकार की आवाज तथा चूड़ियों के शब्द से मिलकर उनका गाना विचित्र आनंद पैदा करता है।

प्राकृत साहित्य में तो किसान को राजा से भी श्रेष्ठ माना गाया है। ‘जय सेण कहा' में वर्णन मिलता है –

वारि हलिओ विहु भत्ता अनन्नभज्जो गुणेहि रहिओ वि।

मा सगुणो बहुभज्जो जइराया चक्कवट्टी वि।।⁷

अर्थात् अनेक पत्नी वाले सर्वगुण सम्पन्न चक्रवर्ती राजा की अपेक्षा गुणविहीन एक पत्नीवाला किसान कहीं श्रेष्ठ है। अपभ्रंश साहित्य में भी किसान की सम्पन्नता का वर्णन है —

च्यारि बइल्ला धेनु दुइ, मिट्ठा बुल्ली नारि ।

काहुँ मुंज कुडवियाहँ गयवर बज्झइ वारि।।⁸

अर्थात् - जिसके घर चार बैल, दो गायें और मीठा बोलने वाली स्त्री हो, उस कुटुम्बी (किसान) को अपने घर पर हाथी बाँधने की क्या जरूरत हैं।

प्रसिद्ध प्रेमाख्यान ‘ढोला मारू रा दूहा’ में नायिका नायक से कह रही है कि अन्न पक गया है तुम आकर उसका भोग लगाओ।

ढाढी एक सँदेसड़उ, ढोलइ लगि लइ जाइ । 

कण पाकड, करसण हुअउ, भोग लियउ घरि आइ ।। ⁹

अर्थ - हे ढाढी एक संदेसा ढोला तक ले जाओ खेती हो गई, अन्न पक गया, तुम घर आकर अपना भोग लो।

इसी तरह जब अन्नकण पककर गिरने लगे हैं पृथ्वी जल के कारण शीतल हो गई है तो वह प्रियतम को अपने साथ ही रहने का आग्रह करती है

 मेहबूठाँ अन बहळ, थळ ताढा जळ रेस

करसण पाका कण खिरा, तद कउ वलण करेस।। ¹⁰

 मेह बरसने से अन्न बहुत हो गया है। पृथ्वी जल के कारण शीतल हो गई है। खेती पक गई। अन्नकण पककर गिरने लगे बताओ ऐसे समय में कौन गमन करेगा। हिंदी साहित्य के आदिकाल में अब्दुल रहमान ने संदेशरासक में व चंद बरदाई ने पृथ्वीराजरासों में किसान वर्ग और अमीर वर्ग के खान-पान के अंतर का वर्णन किया है।

सन्देशरासक

जइ बहुलदुद्ध संगीलिया य उल्ललइ तंदुला खीरी।

ता कणकुक्कस साहिआ रब्बडिया मा दडब्बढउ ।।

अर्थ - यदि प्रचुर दूध मिलाकर (बड़े घरों में) तन्दुल खीर बनाया जाता है तो गरीब लोग क्या कण मिलाकर मट्टे की रबड़ी न डभकाएँ ?) पृथ्वीराजरासो

पय सक्करी सुभत्तौ एकत्तौ कनय राय भोयंसी

कर कंसी गुज्जरीय, रब्बरियं नैव जीवंति । ।¹¹ 

अर्थ - यदि दूध-शक्कर और भात मिलाकर (बड़े घरों की लड़कियाँ राजभोग बनाती है तो (गरीब) गूजरी क्या कण- भूसीवाली रबड़ी (मट्ठे की) से जीवन-निर्वाह न करें ?)

सूर की दृष्टि में किसान 'बापुरो' है

जो कर देता है- ऐसा माई ! एक कोद को हेतु

जैसे बसन कुसुँभ संग मिलि के नेकु चटकपुनि सेत ।

जैसे करनि किसान बापुरो नौ नौ बाहैं देत ।¹²


तुलसी ने युग की पीड़ा को पहचाना और युगीन यथार्थ का वर्णन कवितावली में किया है

खेती न किसानको, भिखारीको न भीख, बलि,

बनिकको बनिज, न चाकरको चाकरी

जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस, 

कहै एक एकन सों, कहाँ जाई, का करी?¹³


इसी प्रकार तुलसी को इस बात का भी ज्ञान था कि केल को काटने पर ही फल देगा और ऊसर भूमि में बीज बोने पर वह नहीं उगेगा। दोनों ही संदर्भों का नीतिगत वर्णन किया है —


काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।¹⁴ 

चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे पर केला तो काटने पर ही फलता अर्थ है ।


ऊसर बीज बएँ फल जथा।।¹⁵

अर्थात् - ऊसर में बीज बोने से कोई लाभ नहीं होता है (अर्थात् सब व्यर्थ जाता हैं ।)


रीतिकाल में किसान की दशा कैसी रही होगी हम समकालीन परिस्थितियों के अध्ययन से पता लगा सकते हैं। कवियों की वाणी इस दिशा में मौन है परंतु आधुनिक काल के भारतेंदु युग में किसानों के शोषण पर बालमुकुन्द गुप्त की 'कृषक क्रन्दन कविता मिलती है जिसमें किसान की दशा का मार्मिक वर्णन है


जिनके कारण सब सुख पावे, जिनका बोया सब जग खावे

हाय ! हाय ! उनके बालक नित भूखों के मारे चिल्लाएँ ।। 

काल सर्प की सी फुफकारें, लुएँ भयानक चलती हैं। 

धरती की सातों परतें, जिसमें तवा सी जलती है। तभी खुले मैदानों में, वे कठिन किसानी करते हैं

जब अनाज उत्पन्न होय, सब तब उठा ले जाय लगान ।¹⁶


प्रयोगवादी कवि केदारनाथ अग्रवाल ने किसानों का वर्णन किया है


आसमान की ओढनी ओढे

धानी पहने फसल घंघरिया

राधा बन कर धरती नाची

नाचे हँसमुख कृषक संवरिया ¹⁷


भवानीप्रसाद मिश्र ने किसानों का वर्णन किया है जिसमें भोर होते ही वे हल बैल लेकर खेत जोतने चले जाते हैं —

जोतना है खेत हल के साथ निकले

बीज बोना है कि दल के साथ निकले

सुबह की ठंडी हवा कपड़े नहीं हैं,

पैर रखते हैं कहीं पड़ते कहीं हैं। ¹⁸

कवि नागार्जुन ने अपने खेत में हल चलाने का वर्णन किया है—

अपने खेत में हल चला रहा हूँ

इन दिनों बुआई चल रही है

इर्द गिर्द की घटनाएँ ही

मेरे लिए बीज जुटाती हैं

हां, बीज में घुन लगा हो तो

अंकुर कैसे निकलेंगे। ¹⁹

इसलिए बाबा नागार्जुन को स्वस्थ बीज की चिंता है।

प्रेमचंद ने गोदान में होरी के माध्यम से किसान की दशा का वर्णन किया है मैंने नहीं जाना जेठ की लू कैसी होती है और माघ की वर्षा कैसी होती है। इस देह को चीरकर देखों, इसमें कितना प्राण रह गया है कितना जखमों से चूर कितना ठोकरों से कुचला हुआ ! उससे पूछो, कभी तूने विश्राम के दर्शन किए, कभी तू छाँह में बैठा ? उस पर यह अपमान ! और वह अब भी जीता है, कायर लोभी, अधम उसका सारा विश्वास जो अगाध होकर स्थूल और अन्धा हो गया था मानो टूक-टूक उड़ गया है। ²⁰

‘पूस की रात’ में मुन्नी हल्कू से कहती है 'मैं कहती हूँ, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते हे ? मर-मर काम करो, उपज हो तो बाकी दे दो.....

बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ है।²¹

भारतीय किसान की यही स्थिति है। हमारे यहाँ कृषि कार्य करना भी कुछ जातियों के जिम्मे रहा है 'कलम का सिपाही में अमृतराय लिखते हैं खेती किसानी कुर्मियों का काम है कायस्थों की शान में इससे बट्टा लगता है।²²

     वहीं देश की आजादी के पश्चात् आये अन्न के संकट को किसान ने दूर किया और सीमा पर आये संकट को जवान ने लाल बहादुर शास्त्री का नारा था 'जय जवान जय किसान और भारत अन्न का उत्पादक बना। फणीश्वरनाथ रेणु ने 'मैला आंचल' में किसान का वर्णन इस प्रकार किया है —

"गाय-बैल, बाछाबाछी और भैंस के पाड़ा की बिक्री धड़ा धड़ हो रही है। दूने सूद पर भी रुपया कर्ज लेकर जमीन मिल जाए तो फायदा है। पाट का भाव पंद्रह रुपया हैं, ऊपर पचास भी जा सकता है। सौ भी हो सकता है। धान सोने के भाव बिक रहा है। जिसके पास जमीन नहीं, वह आदमी नहीं जानवर है। जानवर घास खाता है, लेकिन आदमी तो घास खाकर नहीं रह सकता।²³

लोक ने श्रम का स्वागत किया है वह उत्साह के साथ कार्य सम्पादित करता है अभाव है पर संदर्भ भी मेरी दृष्टि में श्रम गीतों में दो प्रसंगों के गीत सर्वाधिक सुहावने हैं। दोनों ही भोर होने से पहले के हैं दिन की शुरुआत से पूर्व प्रकृति अपने सम्पूर्ण मोहक स्वरूप, ऋषियों मुनियों में भी अतीव प्रिय है- ब्रह्ममुहूर्त का समय। उस समय गृहिणी उठते ही ईश्वर के स्मरण के साथ परिवार के पोषण हेतु घट्टी मांडती है, अनाज पीसती है । घट्टी की धरण धरण आवाज के साथ गाये जाने वाले कृष्णराधिका के हरजस गीतों का मर्म अद्भुत है। प्रेम और करूणा से छल-छला कर भरा हुआ है। इन घट्टी के गीतों में स्त्री जीवन का दर्द भी शब्द पा गया है।


मोटी मक्की से सांवरा पीसणी, सासू घड़ियां जोखे जो राम।

पीस्यौ पीस्यो बाजरो, मक्की पीसी न जावै ओ राम।। ²⁴

अर्थ - मोटी मक्की का सांवरा पीसना सासू ने धडि (पाँच कि.ग्रा.) तौल दी

पीसा पीसा बाजरा मक्की पीसी नहीं जाती ओ राम

     गोण्ड जन जाति के लोक गीतों में फसल बोना उसकी निराई-गुड़ाई करना एक उत्सव सदृश है। वहाँ के गीतों में इसके उत्साह को देखिए—

हाय बैल रेंगय चलैय आर

काँधा म जुआड़ी, बैला रेंगम चलीरे

आगू आगू बैला चलेय पाछू ले जोतैया

कांधा मा नांदा बैयनारी पाछले निदेया

बैला रेंग चलो आर काँधा...... रे

तता तता नागर जोतैय तात कलेवा खाय

दोना दोना पेज पीवैय पकरी भाजी खाय

बैला रंगय चलो आर काँधा ..... रे।²⁵

अर्थ: किसान अपने बैलों को बड़े प्यार से कहता है- तुम धीरे-धीरे चलो पीछे-पीछे महिलाएँ खेत की बिदाई के लिए जाती है। दोपहर हो गई है। गरम-गरम भोजन और दोना-दोना पेज पीते हैं और पकरी की भाजी खाते हैं।

धरती तोरे अंचरा मा बीज ला बिखेरन

कि सुआ हो...........

रख ले वे लजिया हमार कि सुआ हो

आये...........!

अर्थ: हे धरती माता ! आपके चरणों में हमने बीज बो दिया है, हमारी लाज रखना और हम अच्छी फसल होने की कामना करती हैं ताकि आने वाला समय सुहावना हो ।


रामवृक्ष बेनीपुरी ने मेरे सपने में वर्णन किया है —

जब हम नई खेती करेंगे नई पुरी बसायेंगे। ऐसी खेती, जिसमें फूल होंगे, कलियाँ होगी- जिन पर तितलियाँ तैरेंगी, और भौरे गूंजेगे। ²⁶



संदर्भ :


  1. ऋग्वेद संहिता, सम्पादक वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, ब्रह्मवर्चस् शान्तिकुन्ज, हरिद्वार (उत्तरांचल), षष्ठम आकृति, संवत् 2061, सूक्त 20 पृष्ठ 56
  2. श्रीधरदासकृत - सदुक्तिकर्णामृत, हिन्दी अनुवाद - राधावल्लभ त्रिपाठी, साहित्य अकादेमी नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2007 
  3. श्रीमवाल्मीकीय रामायण, प्रथम भाग, गीता प्रेस गोरखपुर, चतुर्थ संस्करण, सं. 2040 पृ. 528, 29 व 763
  4. महाकवि कालिदास विरचित रघुवंश महाकाव्यम् चतुर्थ सर्ग पं. हरगोविन्द शास्त्री चौखम्बा पब्लिकेशन्स नई दिल्ली, वि.सं. 2059 श्लोक 20 पृ.109
  5. महाकवि श्री माघ प्रणीत शिशुपालवध, व्याख्याकार श्री पण्डित हरगोविन्द शास्त्री, चौखम्बा विद्याभवन वाराणसी, पुनर्मुद्रित संस्करण 2015, पृ. 537
  6. हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास, षोडश भाग हिन्दी का लोक साहित्य, सम्पादक- महापंडित राहुल सांकृत्यायन डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, सं. 2017 वि. पृ. 20-21
  7. प्राकृत साहित्य का इतिहास : डॉ. जगदीश चन्द्र जैन, चौखम्बा विद्याभवन वाराणसी, द्वितीय संस्करण 1985, पृ. 385
  8. हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग नामवरसिंह, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, सन् 1997, पृ. 302
  9. ढोला मारू रा दूहा – नरोत्तमदास स्वामी, राजस्थानी ग्रंथागार, संशोधित द्वितीय संस्करण 2001, पृ. 103 
  10. ढोला मारू रा दूहा वही पृ. 125
  11. हिन्दी साहित्य का आदिकाल - हजारी प्रसाद द्विवेदी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, सन् 2000, पृ. 94
  12. भ्रमरगीत सार, सं. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, सं. 2049 पृ. 118
  13. कवितावली : तुलसीदास, गीता प्रेस गोरखपुर, सत्ताबनवाँ सं. 2073, संस्करण पृ. 116
  14. श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास विरचित रामचरितमानस गीता प्रेस गोरखपुर, सं. 2058, तिरसठवां संस्करण, पृ. 662
  15. वही पृ. 662
  16. हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास द्वितीय खण्ड गणपतिचन्द्र गुप्त, लोक भारती प्रकाशन इलाहाबाद, सन् 1994, पृ. 35 
  17. आधुनिक काव्य संग्रह, सं. रामवीरसिंह, विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी, सन् 1994, पृ. 251, 257
  18. आधुनिक काव्य संग्रह, वही पृ. 257
  19. नागार्जुन, सं.- मैनेजर पांडेय, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, चौथी आवृत्ति, सन् 2017 पृ. 147
  20. लूर सं. डॉ. जयपाल सिंह राठौड़, श्रम-लोकगीत विशेषांक ( अंक 15-16 ) प्रकाशन दिसम्बर 2015, पृ. 6
  21.  गोदान – मुंशी प्रेमचंद, साहित्यागार, जयपुर, सन् 1991, पृ. 398
  22. कहानी एकादशी, सं. - विजयलक्ष्मी पूस की रात, प्रगति संस्थान दिल्ली, सन् 2017, पृ. 33
  23. प्रेमचंद कलम का सिपाही अमृतराय हंस प्रकाशन इलाहाबाद, सन् 1992, पृ. 5
  24. मैला आंचल फणीश्वरनाथ रेणु राजकमल पेपर बैक्स सन् 1996, पृ. 175
  25. 'लूर' वही पृ. 37
  26. प्रगति वार्ता, मासिक पत्रिका, संपादक सच्चिदानन्द, फरवरी 2012, मुख पृष्ठ

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