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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2022

छायावाद शब्द शिल्पी : सुमित्रानंदन पंत – डॉ. महीपाल सिंह राठौड़


हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्ति आंदोलन के बाद सबसे महत्वपूर्ण काव्य आंदोलन छायावाद है।¹ जो दो महायुद्धों के बीच² रचा गया और जिसका सम्बन्ध भारतीय स्वाधीनता आंदोलन से है। भारतेन्दु हरिष्चन्द्र के जमाने में ‘हिंदी नई चाल में ढली,’ द्विवेदी युग में हिंदी गद्य का निर्माण हुआ और द्विवेदी युग की इतिवृत्तत्मकता व खड़ी बोली के खड़े पक्ष को तोड़कर सरस व मधुर बनाने का कार्य छायावादी कवियों ने किया।

प्रयोगवादी, प्रगतिवादी, नई कविता व समकालीन कविता का कोई भी कवि पंत, प्रसाद और निराला के समकक्ष नहीं ठहरता।³

निराला ने जहाँ ‘जागो फिर एक बार,’ ‘राम की शक्ति पूजा,’ ‘सरोज स्मृति’ जैसी काव्य रचनाएँ वहीं प्रसाद ने नैराष्य के दौर में भारतीय इतिहास के उज्ज्वल पृष्ठों को हमारे सम्मुख रखकर प्रेरणा दी ‘कामायनी’ जैसा महाकाव्य रचा। आधुनिक युग की मीरां महादेवी वर्मा ने घनीभूत पीड़ा को व्यक्त किया तो पंत ने खड़ी बोली को भाषाई संस्कार दिए।

तुम  वहन कर सको जन मन में 

मेरे विचार वाणी मेरी, 

चाहिए तुम्हें क्या अलंका’

पंत का जन्म 20 मई, 1900 को अल्मोड़ा जिले के कसौनी गाँव में हुआ। जन्म से ही मातृत्व सुख से वंचित रहे परंतु प्रकृति ने उन्हें अपनी गोद में खिलाया इसीलिए पंत को ‘प्रकृति का चितेरा’ कहा जाता है।

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, 

तोड़ प्रकृति से भी माया

बाले ! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझादू लोचन? प्रसाद जब ब्रजभाषा का प्रयोग कर रहे थे तब पंत ने इन्हीं छोटे-छोटे कोमल शब्दों से खड़ी बोली को मृदु बनाया।⁶

पंत की साहित्य साधना का अधिकांष समय इलाहाबाद में व्यतीत हुआ उन्होंने इलाहाबाद की माटी में वह सुगंध घोली जिससे इलाहाबाद साहित्यिक सुगंध से भर गया।⁷

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ‘काव्य में प्राकृतिक दृष्य’ निबंध में वर्णन करते हुए लिखते हैं कि यदि किसी को अपने देष से सचमुच प्रेम है तो उसे अपने देष के मनुष्य, पषु, पक्षी लता, गुल्म पेड़, पत्तों, वन, पर्वत नदी, निर्झर आदि सबसे प्रेम होगा, वह सबको चाह भरी दृष्टि से देखेगा।⁸

पंत के प्रकृति प्रेम को हम इस दृष्टिकोण से भी देख सकते हैं। हृदय की मुक्तावस्था के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती है उसे ही तो कविता कहते हैं।⁹

प्रसाद ने छायावाद पर अपने विचार प्रकट करते हुए लिखा है कि ‘कविता के क्षेत्र में पौराणिक युग की किसी घटना अथवा देष विदेष की सुंदरी के बाह्य वर्णन से भिन्न जब वेदना के आधार पर स्वानुभूतिमयी अभिव्यक्ति होने लगी, तब हिंदी में उसे छायावाद के नाम से अभिहित किया गया।¹⁰

छाया-भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है। ध्वन्यात्मकता लाक्षणिकता, सौंदर्य्यमय प्रतीक-विधान तथा उपचार वक्रता के साथ स्वानुभूति की विवृत छायावाद की विषेषतायें हैं। अपने भीतर से मोती के पानी की तरह आंतर स्पर्ष करके भाव समर्पण करने वाली अभिव्यक्ति-छाया कांतिमयी होती है।11

आलोचकों ने छायावाद को विलायती चीजों का मुरब्बा भी कहा है।¹²

आचार्य शुक्ल ने गुप्त जी के प्रतिभा की सबसे बड़ी विषेषता बताते हुए रेखांकित किया है कि कालानुसरण की क्षमता अर्थात् उŸारोŸार बदलती हुई भावनाओं और काव्य प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति¹³ वही बात पंत पर भी लागू होती है। पंत ने लोक जीवन के वास्तविक शीत और ताप से अपने हृदय को बचाते हुए ‘वाद’ की लपेट से अपनी वाणी को मुक्त कर लिया और जगत् की विस्तृत अर्थभूमि पर स्वाभाविक स्वच्छंदता के साथ विचरने का साहस दिखाया।¹⁴ सन् 1938 में पंत ने जब ‘रूपाभ’ में कल्पना के आकाष से यथार्थ की धरती पर उतरने की घोषणा की तब औचारिक रूप से छायावाद की मृत्यु हो गयी, दस वर्ष बाद ‘स्वर्ण किरण’ और ‘स्वर्ण धूलि’ में जब उनकी काव्य धारा ‘ग्राम्या’ से विपरीत दषा में प्रवाहित हुई, तब छायावाद को नया जीवन मिला। अकेले पन्त जी की रचनाएँ सन् 37 के पहले के पन्त प्रसाद-निराला-महादेवी के सम्मिलित कृतित्व से आकार में विराट और गुरुत्व में विषद है। इधर अकेला ‘लोकायतन’ उधर ‘पल्लव’ ‘गुंजन’ ‘वाणी’ आदि सब एक साथ चढा दीजिए पासंग बराबर नहीं ठहरता।¹⁵

पंत शब्दों की आत्मा पहचानते थे उन्होंने भाव के अनुरूप नाद माधुर्य की योजना बनाई।¹⁶ पंत का मानना था कि भाषा का और मुख्यतः कविता की भाषा का, प्राण राग है। राग ही के पंखों की अबाध उन्मुक्त उड़ान में लयमान होकर कविता सान्त से अनन्त मिलाती है।¹⁷

पंत का बाल मन हर चीज से सवाल पूछता है। सुबह सुबह गाती हुई चिड़िया से भी

प्रथम रष्मि का आना, रंगिणि !

तूने कैसे पहचाना?

कहाँ, कहाँ हे बाल विहंगिनि !

पाया तूने यह गाना ?18

जिसके हृदय में ज्ञान के आलोक की प्रथम किरण आई हो, वही इस तरह का प्रष्न कर सकता है।¹⁹

पंत की रंग संवेदना भी देखिए -

रूपहले सुनहले आम्र मौर

नीले-पीले औ ताम्र मौर²⁰

नाद सौंदर्य का उदाहरण ‘स्वर्ण धूलि’ की ‘सावन मेघ’ कविता में बादलों के बिम्ब में संभव हो सका है-

झमझम झमझम

मेघ बरसते हैं सावन के,

छम छम गिरती बूँदें

तरूओं से छनके²¹

पंत ने ग्राम निवासी से सीखने की बात कही है -

हमें सिखाओ ग्राम निवासी !

पष्चिम के अनुकरण मूर्त

ये नगर हमें अब लगते बासी²²

अपने गाँव और प्रांत की सीमा से बाहर निकलकर संपूर्ण देष को अपनी जन्म भूमि समझना राष्ट्रीयता का मंगलाचरण है।²³

चित्रमयी लाक्षणिक भाषा तथा रूपक का सफल प्रयोग पंत ने किया है एक उदाहरण लीजिए-

अहे निष्ठुर परिवर्तन !

अहे वासुकि सहस्रफन !

लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरंतर

छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षस्थल पर।²⁴

संध्या होने पर कवि का ध्यान केवल संध्या सुंदरी पर ही नहीं है वह यह भी देखता है-

बाँसों का झुरमुट, संध्या झुटपुट

ये नाप रहे निज घर का मग

कुछ श्रमजीवी घर डगमग डग

भारी है जीवन, भारी पग! ²⁵

यहाँ हृदय में ढलने की पूरी द्रवणषीलता है। निराला ने जहाँ ‘विधवा’ और ‘भिक्षुक’ के माध्यम से हिंदी कविता में एक नये सौंदर्य का रंग भरा वहीं पंत भी ‘दो लड़के’ कविता में बच्चों को प्यार से पुचकारते हैं जल्दी से टीले के नीचे उधर, उतर कर हैं चुन ले जाते कूड़े से निधियाँ सुंदर²⁶ रेणु के ‘मैला आंचल’ की तरह पंत भी भारत माता को ग्रामवासिनी मानते है-

भारत माता

ग्रामवासिनी !

खेतों में फैला है श्यामल

धूल भरा मैलासा आँचल²⁷

परिवर्तन प्रकृति का नियम है वे स्वीकारते हैं कि द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र,

हे स्रस्त ध्वस्त ! हे शुष्क शीर्ण !²⁸

पंत ने राष्ट्र भाषा के महत्व को पहचाना हमें भाषा नहीं, राष्ट्र-भाषा की आवष्यकता हैं; पुस्तकों की नहीं, मनुष्यों की भाषा; जिसमें हँसते-रोते खेलते-कूदते, लड़ते, गले मिलते, साँस लेते और रहते है।²⁹

धरती कितनी देती है कविता में पंत ने मानवता में ममता के दाने बोने का प्रयोग किया है-

इसमें मानवता ममता के दाने बोने हैं

जिससे उगल सके फिर धूलि सुनहरी फसलें³⁰

पंत ने केवल सुयष के लिए31 काव्य रचना नहीं कि उन्होंने खड़ी बोली हिंदी को संस्कारित कर उसे ब्रजभाषा से भी मृदु और कोमल बना दिया। गाँधी और अरविन्द के दर्षन से प्रभावित होकर साहित्य जगत को नयी दिषा दी और प्रकृति के सुंदर चित्रों का वर्णन कर इलाहाबाद की मिट्टी को 28 दिसम्बर 1977 को उर्वरा कर गए।

आधुनिक हिन्दी काव्य को व्यक्तिमत, भाषा - सामर्थ्य तथा नयी छन्द दृष्टि प्रदान कर उन्होंने खड़ी बोली की काव्य शक्ति का जो संवर्द्धन और परिष्कार किया वह स्वयं अपने में एक सुन्दर महत्वपूर्ण देन कही जा सकती है।³²



संदर्भ सूची

  1. छायावाद के बाद : त्रिपाठी विश्वनाथ ‘आजकल’ : स्वर्ण जयंती अंक, 1994 प्रकाश विभाग सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पृ. 4
  2. कुम्हार डॉ. छोटाराम : छायावाद में यथार्थ तत्व : राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर सन् 1994, पृ.69
  3. छायावाद के बाद : त्रिपाठी विष्वनाथ : आजकल स्वर्ण जयंती अंक, प्रकाषन विभाग सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, सन् 1994, पृ. 4
  4. सिंह रामवीर : आधुनिक काव्य संग्रह, विष्विद्यालय प्रकाषन वाराणसी षष्ठ संस्करण : 2013 ई. 
  5. पृ. 99
  6. पंत सुमित्रानंदन : पल्लव इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग प्रथमा वृत, पृ. 44
  7. सिंह नामवर : छायावाद राजमकल प्रकाशन आठवीं, आवृत 2007, पृ. 112
  8. अग्रवाल प्रदीप ‘कलम के सिपाही’ स्वराज संस्थान संचालनालय, संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेष शासन भोपाल 10वें विष्व हिन्दी सम्मेलन पर प्रकाषित कलैण्डर से
  9. शुक्ल आचार्य रामचंद्र : ‘काव्य में प्राकृतिक दृष्य’ ‘चिंतामणि’ द्वितीय भाग, नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी संवत् 2041, वि. पृ. 33
  10. शुक्ल आचार्य रामचन्द्र : ‘कविता क्या है?’ ‘चिन्तामणि’ पहला भाग इंडियन प्रेस (पब्लिकेशंस) प्राइवेट लिमिटेड, इलाहाबाद, सन् 1989 ई, पृ. 97
  11. ‘काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध : प्रसाद जय शंकर लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद प्र.सं. 2000, पृ. 78
  12. काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध : प्रसाद जयषंकर लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्र.सं. सन् 2000, पृ. 81
  13. सिंह बच्चन : आधुनिक हिन्दी आलोचना के बीच शब्द वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, द्वितीय संस्करण सन् 1994, पृ. 43
  14. सिंह बच्चन : आधुनिक हिन्दी आलोचना के बीच शब्द वाणी प्रकाषन, नयी दिल्ली, द्वितीय संस्करण सन् 1994, पृ. 43
  15. शुक्ल आचार्य रामचंद्र : हिंदी साहित्य का इतिहास नागरीप्रचारिणी सभा, काषी संवत् 2056 वि., पृ. 383 व 385
  16. शर्मा रामविलास : नयी कविता और अस्तित्ववाद राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, छठी आवृति 2014, पृ. 67
  17. सिंह रामवीर : आधुनिक काव्य संग्रह विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी सन् 2013 ई., पृ.355
  18. पंत : पल्लव इंडियन प्रेस लिमिटेड प्रयाग, प्रथमा वृत, पृ. 20
  19. पंत सुमित्रानंदन ग्रंथावली खण्ड एक राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, द्वितीय संस्करण, सन् 1980, पृ. 113
  20. सिंह नामवर : छायावाद राजकमल प्रकाशन, दिल्ली आठवीं, आवृत 2007 पृ. 32
  21. ठाकुर डॉ. खगेन्द्र प्रसाद, छायावादी काव्य भाषा का विवेचनात्मक अनुषीलन, परिमल प्रकाशन, इलाहाबाद सन् 1978 ई., पृ. 248
  22. शर्मा डॉ. हरिचरण : छायावाद के आधार - स्तम्भ : राजस्थान प्रकाशन जयपुर, प्रथम संस्करण 1 जनवरी, 2001, पृ. 276
  23. पंत सुमित्रानंदन ग्रंथावली खण्ड : छह राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, द्वि.सं. 1980 पृ. 529
  24. सिंह नामवर : छायावाद राजकमल प्रकाशन, आठवीं आवृत्ति 2007 पृ. 77
  25. शुक्ल आचार्य रामचन्द्र : हिंदी साहित्य का इतिहास नागरीप्रचारिणी सभा, काषी संवत् 2056 वि 
  26. पृ. 379
  27. वही पृ. 383
  28. वही पृ. 385
  29. सिंह रामवीर : आधुनिक काव्य संग्रह, वही पृ.102
  30. पंत सुमित्रानंदन ग्रंथावली खण्ड : दो राजकमल प्रकाषन, नयी दिल्ली, द्वि.सं. 1980 पृ. 7
  31. पंत सुमित्रानंदन : पल्लव (भूमिका) वही पृ. 14
  32. सिंह रामवीर : आधुनिक काव्य संग्रह, वही पृ. 106
  33. दिनकर : पन्त, प्रसाद और मैथिलीषरण केदारनाथ सिंह, उदयाचल, राष्ट्रकवि दिनकर पथ, राजेन्द्र नगर पटना पुनरावृत्ति, 1989 ई, पृ. 105
  34. वर्मा धीरेन्द्र : प्र.सं. हिन्दी साहित्य कोष भाग 2, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी द्वि सं. 1986 ई. पृ. 641


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